सही और सशक्त तीर्थयात्रा
आज भी संस्कृति की सीता का अपने ढंग का अपहरण दुष्ट दशानन ने कर लिया है। त्रेता में ऐसी ही घटना घटित होने पर, सुग्रीव ने नेतृत्व में वानरों का समुदाय अपना घर-बार छोड़ कर, उस खोज-प्रयोजन के लिए लम्बी और कष्ट-साध्य यात्रा पर निकल पड़ा था। लक्ष्मण को शक्ति लगने पर प्राण-संकट जैसी स्थिति आ गयी थी। वैद्य ने संजीवनी बूटी लाने को कहा। वह कठिन काम हनुमान के अतिरिक्त और किसी के बल-बूते का न था। वे गये और बूटी की सही पहचान न होने पर पर्वत को ही उखाड़ लाये। आज भी हमें युग सृजन के काम आ सकने वाले प्राणवान अग्रदूतों की आवश्यकता है। उन्हें घर-घर खोजने के लिए परिव्राजकों के रूप में प्रवास पर निकल पड़ने के अतिरिक्त कोई चारा है नहीं।

