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Books - स्वर्ग नरक की स्वचालित प्रक्रिया

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भाग्यवाद की भ्रान्त धारणा और प्रारब्ध का यथार्थ

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सुख सुविधा हर किसी को अभीष्ट है। अनुकूल परिस्थितियां मिलतीं तो अधिक उपार्जन सम्भव हो सकता था। दूसरे सहयोग करते—आवश्यक साधन उपलब्ध होते तो सम्पन्नता और सफलता की कमी न रहती। किन्तु प्रयत्न करने पर भी अनुकूलता मिल नहीं पाती। अभीष्ट सफलता पीछे हटती और दूर भागती जाती है तो निराशा से मन खिन्न रहने लगता है। दूसरे लोग अपनी ही योग्यता के थे—अपने जितना ही प्रयत्न करते थे—पर उन्हें उपयुक्त सफलताएं मिल गईं और वैसे साधन एवं अवसर न मिलने के कारण अपना प्रगति पथ अवरुद्ध ही बना रहा। परिस्थितियां अनुकूल हुई ही नहीं, अवसर मिले ही नहीं—साधन जुटे ही नहीं—सहयोग रहा ही नहीं फिर एकाकी प्रयत्न से भी क्या बनता। हाथ मलते हुए—दुर्भाग्य का रोना रोते हुए—मन मसोस कर बैठा रहना पड़ा। समुन्नत परिस्थिति प्राप्त करने के स्वप्न धरे के धरे रह गये।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में प्रायः मनुष्य का अपने कौशल और पुरुषार्थ की कमी का दोष ही प्रधान होता है। सूक्ति है कि—असफलता मिलने पर यही सोचना चाहिये कि उसे प्राप्त करने के लिए जितने प्रयत्न की आवश्यकता थी उसमें कमी रही। अगली बार दूने उत्साह और साहस के लिए नया प्रयत्न करना चाहिये और बार-बार असफलताएं आने पर भी पुरुषार्थ तब तक जारी रखना चाहिए जब तक कि सफलता सामने ही आकर खड़ी न हो जाय। यह उत्साहवर्धक परामर्श जनसाधारण को पुरुषार्थ की शक्ति और भविष्य की आशा के प्रति आस्थावान बनाये रहने की दृष्टि से उपयुक्त और आवश्यक हैं। ऐसे कथनों का समर्थन ही किया जाना चाहिए। अनवरत श्रम, अथक पुरुषार्थ और अडिग साहस और अविचल धैर्य की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही उत्तम है। लोक शिक्षण की दृष्टि से पुरुषार्थ परायणता का ही समर्थन किया जाना चाहिए। नीतिकारों का यह प्रयत्न भी रहा है। इस प्रकार के प्रतिपादनों की उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत हो ही नहीं सकते।

किन्तु तात्विक दृष्टि से गम्भीरतापूर्वक जब तथ्यों पर विचार करते हैं तो एक दूसरा पक्ष भी उभर कर आता है। वह यह कि कितने ही लोगों के सामने ऐसे अप्रत्याशित संकट आ खड़े होते हैं जिनके लिए उन्हें किसी भी प्रकार दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उसने ऐसा कोई काम नहीं किया था जिससे वह मुसीबत सिर पर टूट पड़ती। दुर्घटनाएं कौन न्यौत बुलाते हैं। अनाचारियों के आक्रमण से होने वाली क्षति में किसका क्या दोष होता है। चोर, उचक्के जिस ढंग से हाथ साफ करते हैं उसमें सामान्य सजगता की कमी नहीं वरन् कुटिलता के कुचक्र ही प्रधान होते हैं। प्रकृति प्रकोपों की तरह कई बार परिस्थितियां अकारण ही इतनी प्रतिकूल हो जाती हैं कि उनमें अपना दोष क्या रहा होगा? अपनी किस भूल ने यह विपत्ति की होगी? ऐसा बहुत खोजने पर भी कुछ हाथ नहीं लगता और भाग्य का खेल कह कर किसी प्रकार जी हलका करना पड़ता है।

ऐसे ही अवसाद कई बार प्रगति प्रयासों के असफल होने के सम्बन्ध में भी सामने आते रहते हैं। उसी योग्यता के—उसी मार्ग पर चलने वाले—उसी उपाय का अवलम्बन करने वाले दूसरे लोग बाजी पर बाजी जीतते, सफलता पर सफलता पाते चले जाते हैं। पर पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ किये गये अपने प्रयत्न बहुत ही स्वल्प परिणाम दें पाते हैं। कई बार तो बुरी तरह निराशा ही हाथ लगती है। यदि अपनी ही भूल से ऐसा हुआ तो वह भूल क्या थी? यदि थी तो क्या वह जान-बूझ कर की गई? इन प्रश्नों पर बहुत ढूंढ़ खोज करने पर भी कुछ ऐसे तथ्य हाथ नहीं लगते, जिन्हें असफलता का कारण ठहराया जाय, भूल माना जाय, और भविष्य में उसे सुधारने का प्रयत्न किया जाय। अनेक बार मनुष्य स्वयं बिल्कुल निर्दोष होता है। परिस्थितियां ही कुछ ऐसी विचित्र बन जाती हैं कि सब कुछ किया कराया मिट्टी हो जाता है। अति वृष्टि, पाला, टिड्डी, कीड़े आदि के कारण किसान का तत्परतापूर्वक किया गया श्रम जब निरर्थक चला जाता है तो उसकी समझ में नहीं आता कि उससे कहां क्या भूल हुई? और वैसी भूल भविष्य में न होने पाये, इसके लिए वह भविष्य में क्या सावधानी बरते? ऐसे ही अगणित प्रसंग सामने आते रहते हैं जिनसे पुरुषार्थ की सर्व समर्थता के पक्ष में प्रस्तुत किये गये प्रतिपादनों की यथार्थता के सम्बन्ध में सन्देह होने लगता है।

इन्हीं आशंकाओं के मध्य भाग्यवाद का जन्म होता है। कहां जाता है—‘‘मनुष्य नियति के हाथ की कठपुतली है। भाग्य टलता नहीं। विधि का विधान अकाट्य है। जो होनी है सो होकर रहती है।’’ इसी प्रकार के और भी बहुत से कथन तब कहे जाते हैं जब प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। कोई अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़े होते हैं। अथवा सफलता मिलते-मिलते अपना रुख बदलती और बिजली की तरह आशा की चमक दिखा कर कहीं से कहीं चली जाती है। ऐसा ही तब भी कहा जाता है जब अन्धे के हाथ बटेर लगती है। कितनों को ही ऐसी सफलतायें हाथ लग जाती हैं जिसके लिए उनके पुरुषार्थ को श्रेय किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता। पूर्वजों की बड़ी सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिल जाय तो इसमें प्राप्तिकर्ता का श्रेय क्या है? लाटरी खुल जाने जैसी सफलताओं में किस कौशल या पौरुष को सराहा जाय? तेजी-मन्दी के चक्र में कई व्यापारी देखते-देखते दिवालिया होते और देखते-देखते लखपती होते देखे जाते हैं। उसमें किसको मूर्ख किसको बुद्धिमान कहा जाय? नदी की बाढ़ आती है। किसी का खेत काट कर उसकी आजीविका को उदरस्थ कर जाती है। किसी के ऊपर खेत में कहीं से लाकर ऐसी उपजाऊ मिट्टी पटक दी जाती है कि वह उसकी पैदावार से देखते-देखते अमीर बन जाता है। नदी द्वारा एक की भूमि को काट ले जाना और दूसरे को समृद्धि का वरदान बरसा जाना। इसे क्या कहा जाय? इसके लिए दोष या श्रेय किसे दिया जाय? आंधी तूफान में जिसका छप्पर उजड़ गया और घर बिगड़ गया इसमें उसकी क्या भूल बताई जाय? और भविष्य में क्या सावधानी बरतने का परामर्श दिया जाय?

यह ठीक है कि यह अपवादों की श्रृंखला है। सामान्य क्रम नहीं है। फिर भी अपवाद भी सर्वथा उपेक्षणीय नहीं हैं। उनका भी कारण खोजना होगा। विशेषतया ऐसी दशा में जबकि वे अत्यधिक परिमाण में आये दिन देखने को मिलते हैं। अत्युक्ति न समझी जाय और पौरुष समर्थकों को बुरा न लगे तो नम्रतापूर्वक दबी जबान से यहां तक कहा जा सकता है कि ‘भाग्य का खेल’ प्रायः 30 प्रतिशत घटना क्रमों में काम कर रहा होता है। यों महत्ता तो कर्म निष्ठा की ही रहेगी और खुला समर्थन उसी को दिया जायगा। पर इन अप्रत्याशित परिणामों के सम्बन्ध में भी विचार तो किया जाना चाहिए।

विज्ञान कहता है कि—‘‘इस संसार में ऐसा कभी कुछ नहीं हो सकता जो प्रकृति नियम के विपरीत हो।’’ भूकम्प, बिजली गिरना, ज्वालामुखी फटना, तूफान जैसी घटनाएं सामान्य बुद्धि को आकस्मिक लगती हैं और उनके पीछे विपर्यय दीखता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं है। उनके पीछे भी प्रकृति के सूक्ष्म नियम ही काम करते हैं। यह दूसरी बात है कि उन नियमों की जानकारी सर्वसाधारण को न हो अथवा उस तरह के घटना क्रम आये दिन घटित न होने के कारण वे आश्चर्यजनक लगते हों। चमत्कार उन्हीं को कहते हैं जो दृश्य आमतौर से देखने को नहीं मिलते। जब भी विज्ञान के आविष्कार प्रथम बार हुए तो उन्हें भारी चमत्कारों के रूप में देखा गया था। रेल, टेलीफोन, बिजली, रेडियो, सिनेमा आदि पूर्व काल में अप्रचलित आविष्कार जब सामने आये तो सामान्य बुद्धि हतप्रभ रह गई और उसे जादू या भूत की करामात समझा गया। पीछे अब जब विज्ञान और आविष्कारों का सिलसिला समझ में आ गया हो तो अन्तर्ग्रह यात्रा पर निकले यानों, अणु आयुधों, लेसर किरणों जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धियों तक को साधारण बात मान लिया गया है।

जादू नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है। लोगों की आंखों की परख क्षमता को चकमा दें सकने की सफलता का नाम ही जादूगरी है। अध्यात्म क्षेत्र में सिद्धि चमत्कारों का वर्णन बहुत होता रहता है। उन्हें देखकर आश्चर्य तो किया जा सकता है, पर ऐसा नहीं माना जा सकता है कि यह आकस्मिक है। इनके पीछे प्रकृति की सामान्य नियम परम्परा का हाथ नहीं है। इसमें अव्यवस्था के लिए रंच मात्र भी गुंजाइश नहीं है। यहां ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता जिसे अप्रत्याशित असम्भव या चमत्कारी कहा जा सकेगा। जिसे हम नहीं जानते उस अविज्ञात को ही अपवाद कह सकते हैं। वस्तुतः उन अपवादों के पीछे भी प्रकृति का परिपूर्ण व्यवस्थाक्रम काम कर रहा है। आदि काल में सूर्य, बिजली, आग, वर्षा आदि आंख मिचौनी खेलने वाले तथ्यों को देवता माना जाता था। उनकी मनौती मनाई और बलि चढ़ाई जाती थी। चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण किन्हीं राक्षसों का आकस्मिक आक्रमण समझा जाता था, पर अब वह बात रही नहीं है। विज्ञान के शोध निष्कर्षों ने भली प्रकार समझा दिया है कि यहां अप्रत्याशित कुछ नहीं है। अविज्ञान को ही अपवाद कहते हैं। वस्तुतः इस सृष्टि में अन्धेरगर्दी के लिए—व्यतिक्रम के लिए—कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। अविज्ञात-अप्रत्याशित को ही अपवाद कहा जाता है। वस्तुतः यहां यथार्थवाद का ही अस्तित्व है अपवाद का अर्थ इतना ही है कि जिस आधार पर वह असामान्य घटनाक्रम उपस्थित हुआ उसकी जानकारी अपने पल्ले नहीं पड़ी है। यों अपवादों का सिलसिला चलता ही रहेगा क्योंकि सामान्य व्यवस्था की ही हमें जानकारी है और उसी को देखने समझने की आदतें भी हैं। सृष्टि के अविज्ञात नियमों के आधार पर जब भी कुछ असामान्य घटित होगा तभी उसे अपवाद कह दिया जाया करेगा। प्रकृति के रहस्य अनन्त हैं और मनुष्य की बुद्धि अत्यन्त स्वल्प। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि उसके सम्बन्ध में हम अपना दृष्टिकोण साफ कर लें। अपनी ससीमता को स्वीकार करें और असमंजस में न पड़कर तथ्यों तक पहुंचने का यथा सम्भव प्रयत्न करते रहें।

पिछले दिनों एक सस्ता तरीका अपनाया जाता रहा है कि—हर अपवाद को देव-दानवों के क्रिया-कृत्य मान कर समाधान कर लिया जाता रहा है। भाग्यवाद भी कुछ इसी प्रकार का दर्शन है जिसमें देवताओं के द्वारा भाग्य निर्माण की बात कह कर एक विचित्र प्रकार की भ्रान्ति उत्पन्न कर दी गई है। विचारशील वर्ग में अपवादों को—‘चान्स’ ‘लक’ आदि कहा जाता रहा है। उसे अप्रत्याशित अवसर मात्र ठहराया गया है। उसके लिए किसी देवता को श्रेय या दोष नहीं दिया गया है। उसमें अविज्ञात को—अपवाद को—मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विदित न होने पर उसे किसी देवता का कोप या अनुग्रह कह कर एक नया भ्रम गढ़ने की चेष्टा नहीं की गई है। यह समझदारी का चिह्न है। सर्वज्ञ होने का दावा करना मिथ्या अहंकार है। जो ज्ञान नहीं है उसे जानने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाय और धैर्य पूर्वक रहस्योद्घाटन के सूत्र खोज निकालने का प्रयत्न करते रहा जाय। इसी में बुद्धिमानी है।

भाग्य को देवताओं के साथ, ग्रह नक्षत्रों के साथ जोड़ना सर्वथा उपहासास्पद है। देवता किसी का भाग्य बुरा लिखें और किसी का भला तो उन्हें विक्षिप्त ही कहा जायगा। मनुष्य में अधिक न्यायशील और विवेकवाद होने की मान्यता अपनाकर ही तो देवताओं को श्रद्धास्पद माना गया है यदि भाग्य लेखन में किसी मर्यादा का ध्यान न रखेंगे और चाहे जिसका भाग्य भला और चाहे जिसका बुरा लिखने लगेंगे तो उनकी वह गरिमा टिकेगी ही नहीं, जिसके कारण उन्हें श्रद्धास्पद और पूजनीय ठहराया गया है। ग्रह नक्षत्रों की गणना भी ज्योतिषियों ने देवताओं के रूप में की है। इसीलिए तो वे उनकी पूजा-पत्री करते और अनुग्रह मांगते हैं। खगोलवेत्ताओं की तरह यदि वे ग्रहों को निर्जीव पदार्थ पिण्ड मानते तो उनके प्रभाव का समूची धरती या किसी भूखण्ड पर उनके किसी व्यापक प्रभाव की परिकल्पना करते और यदि अनुकूलता, प्रतिकूलता की बात सोचते तो उसका आधार इतना ही तो होता कि अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान को न्यूनाधिक करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। इसके विपरीत जब उनकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता से व्यक्ति विशेष को कष्ट मिलने की मान्यता बनाई गई और पूजा-पत्री से उनका रोष शान्त करने एवं अनुकम्पा पाने की समझी समझाई गई तो स्पष्ट है कि इन देवताओं को खगोल सम्पदा के स्थान से हटाकर देव संज्ञा देदी गई। होता भी यही रहा है। ग्रह नक्षत्रों को देव प्रतिमाओं के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता और पूजा जाता है। देववाद और भाग्यवाद की विसंगति को संगति के रूप में बिठाकर एक अनोखे बुद्धि-कौशल का ही परिचय दिया गया है। इसमें चमत्कार अवश्य है। ग्रह-नक्षत्रों का—देवताओं का न सही इस परिकल्पना को गढ़ने वाली बुद्धि को तो निश्चय ही चमत्कारी कहा जायगा। इस उद्योग को चलाने वाले और उसके चंगुल में फंसने वालों को भी अपने ढंग के चमत्कारी ही कहा जा सकता है। इतने पर भी यह प्रश्न तो यथा स्थान बना ही रहेगा कि यदि यह देवता और ग्रह नक्षत्र सचमुच ही देवता हैं तो फिर अकारण किसी को दुःख किसी को सुख देने की अव्यवस्था क्यों फैलाते हैं। अपने क्रिया-कलाप में अन्धेरगर्दी की भरमार क्यों करते हैं? उनके रोष से विपन्न हुए दुखियारों की हाय, उन पर क्यों नहीं पड़ेगी? उनके अनुग्रह से सम्पत्तिवान लोग कर्म और पुरुषार्थों को अंगूठा क्यों नहीं दिखायेंगे? फिर नया एक और प्रश्न उठ खड़ा होता है कि पूजा-पत्री के छुटपुट उपहार पाकर वे क्यों अपनी गतिविधियों को उलट देते हैं? पूजा मिलने पर वे दोष को अनुग्रह में बदल देते हैं और न मिलने पर त्रास देते ही रहते हैं। इसका क्या कारण हो सकता है? पूजा के नाम पर मिलने वाली प्रशंसा और सस्ती उपहार सामग्री मात्र से उनकी नीति और क्रिया में भारी उलट-पुलट हो जाती है? कोई पत्थर अंगूठी में पहन लेने से किस कारण कोई ग्रह नक्षत्र किसी पर अनुग्रह बरसाने लगता है? आदि ऐसे असंख्य प्रश्न हैं जो भाग्यवाद की अपवाद स्थिति को स्वीकार करते हुए भी यह समाधान नहीं होने देते कि उस सबके लिए देवताओं का लिखा विधान अथवा ग्रह नक्षत्रों का रोष अनुग्रह किस प्रकार कारण हो सकता है? यदि कोई कारण है तो उसका किस तर्क और तथ्य के आधार पर समर्थन किया जाय?

देवताओं और ग्रह नक्षत्रों के अस्तित्व और अनस्तित्व के सम्बन्ध में बुद्धिपूर्वक तर्क और तथ्यों के आधार पर बहुत कुछ कहने, सोचने और खोजने की गुंजाइश है। दैवी शक्तियों का मानव-जीवन में कोई विशेष प्रभाव हो सकता है। इसी प्रकार ग्रह नक्षत्र भी पृथ्वी के पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित कर सकते हैं। इन सम्भावनाओं पर विचार करने के लिए व्यापक शोध क्षेत्र खुला पड़ा है। किन्तु इस प्रसंग पर तो गाड़ी एक दम रुक जाती है कि देवता किसी का भाग्य विधान बिना ऐसे ही मनमर्जी से भला-बुरा लिखते चले जायं? अथवा ग्रह नक्षत्र किसी पर रोष और अनुग्रह की अकारण वर्षा करते हुए अपने को अनाचारियों की स्थिति में ला पटके। यदि वस्तुतः वे लोग ऐसे ही जैसा कि उनके बारे में मूढ मान्यताएं समझाती हैं तो फिर उनके और हम सबके लिए बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है। सृष्टि की सुव्यवस्था के सिद्धान्त का तो उसमें खुला उल्लंघन और उपहास है ही। ऐसी उपहासास्पद धारणाओं ने ही विचारशील वर्ग में भाग्यवाद के प्रति विरोध और आक्रमण की भूमिका बनाई है।

प्रारब्ध न तो अन्धविश्वास है और न अकारण

भाग्यवाद के प्रति विरोध और आक्रोश इसलिए उमड़ पड़ा कि उसके सहारे निहित स्वार्थों ने पाने-खाने के लिए ग्रह नक्षत्रों को बीच में डालकर अपना एक स्वतन्त्र व्यवसाय खड़ा कर लिया। अन्यथा वह एक स्वतन्त्र तत्वज्ञान समझा जा सकता है और उसके प्रभाव का व्यक्ति के उत्थान-पतन में क्या स्थान रहता है इस पर विचार करते हुए वह उपाय खोजा जा सकता है कि अन्य विपत्तियों की तरह उससे भी किस प्रकार जूझा जाय—किस प्रकार कठिनाइयों को सरल करने के अन्य क्षेत्रों में चलने वाले प्रयत्नों की तरह इस दिशा में भी उपाय ढूंढ़ा जाय।

भाग्य के सम्बन्ध में कितनी ही लोकोक्तियां ऐसी प्रचलित हैं जो उसके ऊपर पड़े हुए पर्दे को अनायास ही उठा देती हैं। भाग्य को विधि का या विधाता का विधान कहा जाता है। इस लोकोक्ति के शब्दार्थ पर विचार करने से भी तथ्य का आभास मिलता है। विधि कहते हैं—कानून को—विधान कहते हैं—व्यवस्था को। विधि का विधान अर्थात् कानून की व्यवस्था। विधायक निर्माणकर्त्ता को कहते हैं। विधाता अर्थात् सृष्टा। सृष्टा अर्थात् परमेश्वर। परमेश्वर की व्यवस्था अर्थात् विधि का विधान। कानून का नियम कहा जाय अथवा परमेश्वर का—बात एक ही है। उसका तात्पर्य एक ही है—भाग्य अर्थात् वह प्रतिक्रिया जो किसी सुनिश्चित नियम प्रक्रिया पर आधारित है। इस निर्णय पर पहुंच जाने से वह भ्रम जंजाल सहज ही कट जाता है जो भाग्य व्यवसायियों ने ग्रह-नक्षत्रों की आड़ में रचकर खड़ा कर दिया है और जिसमें दुर्बल मनःस्थिति के लोगों को डराने और लाभ उठाने का कुचक्र चलाया जाता है। बेचारे ग्रह नक्षत्रों को इस सामान्य सृष्टि व्यवस्था में घसीटना—उन्हें दोष या श्रेय देना सर्वथा निरर्थक है।

खगोल विद्या—अस्टोनोमी एक मान्य विज्ञान है। ग्रह नक्षत्रों की गतिविधियों की जानकारी कितनी उपयोगी है, उसे विज्ञ समाज में भली प्रकार जाना माना गया है। इसकी खोज के लिए अन्तरिक्षीय और अन्तर्ग्रही खोज खबर लाने के लिए विज्ञान क्षेत्र में कितने महंगे और कितने प्रबल प्रयास किये जा रहे हैं, यह सर्वविदित है। उससे लाभ भी है। रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन जैसे प्रत्यक्ष और कितने ही परोक्ष लाभ खगोल विद्या की जानकारियों के आधार पर मिलते जा रहे हैं। इस विज्ञान की प्रतिष्ठा रही है और रहेगी। किन्तु खगोल विद्या—अस्टोनोमी को—जब फलित वर्णन के रूप में वर्णन किया जाने लगेगा और उससे नये किस्म की भ्रान्तियां फैलाकर स्वार्थ साधन का उपक्रम खड़ा किया जायगा तो बिना समाज में उसकी भर्त्सना होती रही रहेगी।

भविष्य कथन एक अतीन्द्रिय क्षमता है। परामनोविज्ञान के आधार पर उसका समर्थन हो रहा है। किन्तु यदि जन्म कुण्डलियों को भविष्य कथन के निमित्त एक नये जंजाल के रूप में खड़ा किया जायगा तो विज्ञ समाज में उसकी प्रतिक्रिया हुए बिना नहीं रह सकती। खगोल विज्ञान की तरह भाग्य विधान को भी विशुद्ध तत्व ज्ञान के रूप में लिया जाय तो उसका उपयोग भी व्यवहार शास्त्र—कर्म प्रतिफल-व्यवस्था विज्ञान की तरह ही उपयोगी हो सकता है। उसके सहारे विपत्तियों के निराकरण और सुविधाओं के सम्वर्धन में भारी योगदान मिल सकता है।

अप्रत्याशित और आकस्मिक दुर्घटनाओं के पीछे प्रायः संचित कर्मों का, सामयिक प्रतिक्रिया का यकायक बरस पड़ना ही कारण होता है। जलाशय से भाप उठती है—सघन होकर बादल बनती है—बादल हवा के साथ इधर-उधर भ्रमण करते रहते हैं—जब वे भारी होकर घटा बनते हैं और परिस्थितियां उन्हें नीचे उतरने के लिए विवश करती हैं तो भूमि के समीप आकर बरसना आरम्भ कर देते हैं। भाप उठने के स्थान और समय की बरसने के स्थान और समय के साथ तुलना की जाय तो दोनों के बीच बहुत दूरी और विसंगति दीखती है। फिर भी जानकारों को यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होती कि एक समय का भाप उठना ही दूसरे समय का घटा बरसना है। मनुष्य के प्रारब्ध कर्म अपने परिपाक का समय बीतने पर जब विपत्ति के रूप में बरसते हैं तो उनको दुर्भाग्य या दुर्घटना का नाम दिया जाता है। मनुष्य द्वारा पहुंचाई गई हानि को तो शत्रुता, आक्रमण, अत्याचार, प्रतिशोध आदि कहा जा सकता है, पर जिसमें किसी का हाथ नहीं है जो विपत्तियां अप्रत्याशित रूप से बरसीं उन्हें वृष्टा की अव्यवस्था न मानना हो तो फिर सुनिश्चित और समाधान कारक उत्तर एक ही हो सकता है—संचित प्रारब्ध कर्मों की प्रतिक्रिया। इसी का प्राचीन ऋषि प्रणीत नाम भाग्य प्रारब्ध कर्म परिपाक आदि है। देखना यह है कि जब अन्य प्रकृति अन्याय असामान्य घटनाएं भी किसी-किसी प्रकृति नियम के अनुसार ही घटित होती हैं तो मनुष्य जीवन में ऐसे अवसर किस कारण से आते हैं जिनका उसको प्रत्यक्षतः कोई इतना बड़ा दोष दिखाई नहीं पड़ता जिसके कारण उन संकटों या अवरोधों का त्रास सहन करना पड़ता। प्रगति क्रम में जब अन्य लोग सहज स्वभाव बढ़ते चलते जाते हैं तो अमुक व्यक्ति को ही क्यों असफलताओं का मुंह ताकना पड़ता है? यह ‘‘भाग्य’’ किस कारण व्यक्ति विशेष को सताता और उसके प्रगति पथ को अवरुद्ध करके रख देता है।

तत्वदर्शियों की सनातन मान्यता एक ही रही है कि मनुष्य के संचित कर्म ही भले या बुरे भाग्य का रूप धारण करके सामने आते हैं। संचित कर्मों के कालान्तर में मिलने वाले परिपाक को ही भाग्य कहा जाता रहा है। साथ के साथ ही अधिकतर कर्मों का फल मिलता और निपटता रहता है। कुछ ही विशेष कर्म ऐसे बचते हैं जिनके फल उत्पन्न होने में समय लग जाता है। शारीरिक परिश्रम और बुद्धिकौशल के प्रतिफल प्रायः साथ के साथ ही थोड़े बहुत समय के फेर से मिलते चले जाते हैं। देर उनमें लगती है जो ‘नैतिक’ होते हैं। पाप और पुण्य ही फलित होने में देर लगाते हैं। हथेली पर सरसों उगाई जा सकती है जो बोने से दस दिन में ही उनके अंकुर छह इंच ऊंचे उग आते हैं किन्तु जिनका जीवन लम्बा हो जो चिरस्थायी हैं उनके बढ़ने और प्रौढ़ होने में देर लगती है। नारियल की गुठली बो देने पर भी एक वर्ष में अंकुर फोड़ती है और वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ती है। बरगद का वृक्ष भी देर लगाता है। जब कि अरंड का पेड़ कुछ ही महीनों में छाया और फल देने लगता है। हाथी जैसे दीर्घजीवी पशु, गिद्ध जैसे पक्षी, ह्वेल जैसे जलचर अपना बचपन बहुत दिन में पूरा करते हैं जब कि खरगोश जैसे छोटे प्राणी एक वर्ष में ही बच्चे पैदा करने लगते हैं। मक्खी, मच्छरों का बचपन और यौवन बहुत ही जल्दी आता है, पर वे मरते भी उतनी ही जल्दी हैं। शारीरिक और मानसिक परिश्रम का, आहार-विहार का, व्यवहार शिष्टाचार का प्रतिफल हाथों हाथ मिलता रहता है। उनकी उपलब्धियां सामयिक होती हैं, चिरस्थायी नहीं। स्थायित्व नैतिक कृत्यों में होता है उनके साथ भाव सम्वेदनाएं और आस्थाएं जुड़ी होती हैं। जड़ें अन्तरंग की गहराई में धंसी रहती हैं इसलिए उसके भले या बुरे प्रतिफल भी देर में मिलते हैं और लम्बी अवधि तक ठहरते हैं। इन कर्मों के फलित होने में प्रायः जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है।

अपनी दृष्टि सामयिक ही होती है। प्रत्यक्ष ही सब कुछ दीखता है। पुण्य और पाप का भला बुरा प्रतिफल तत्काल न मिलने पर अधीरता और अनास्था उत्पन्न होती है और उन स्थिति में तो एक प्रकार का अन्तर्द्वन्द ही उठ खड़ा होता है जब संचित कर्मों के प्रतिफल और आज के क्रिया-कलाप के मध्य विपरीतता दिखाई पड़ने लगे। पूर्व जन्म का पुण्य जिन दिनों फलित होकर शुभ परिणाम उत्पन्न कर रहा था, संयोग वश उन्हीं दिनों उस व्यक्ति ने नया दुष्कर्म कर डाला। देखने वालों को यह भ्रम होता है कि अभी-अभी जो दुष्कर्म किया था उसका फल इस विशेष लाभ के रूप में सामने आया। कहा जाने लगता है—‘‘कलियुग की ऐसी ही महिमा है। भला करने का बुरा और बुरा करने पर अच्छा फल मिलता है।’’ इस कथन के प्रतिपादन में उन प्रमाणों को प्रस्तुत कर दिया जाता है जिनमें अशुभ कर्त्ता को दुष्कर्म करने के दिनों में ही संचित पुण्य फल का लाभ संयोग वश मिल गया था।

ऐसे ही प्रसंग वे होते हैं जिनमें उस समय अच्छा कर्म करने के दिनों ही किसी संचित अशुभ कर्म का बुरा प्रतिफल कष्ट रूप में सामने आ गया। तब भी ऐसी ही विसंगति बिठा दी जाती है कि अच्छा करने वाले को दुःख भुगतना पड़ता है। यह समय की महिमा है। ऐसी विसंगतियां कभी-कभी ही सामने आती हैं तो भी उतने से भी सामान्य बुद्धि को असमंजस में पड़ने का अवसर मिल ही जाता है। ऐसे ही प्रसंगों को देखते हुए शास्त्रकारों ने कर्म की गति बड़ी गहन बताई है और ‘‘गहना कर्मणो गतिः’’ कहकर उसकी जटिलता का संकेत किया।

इन पेचीदगियों के होते हुए संचित कर्म और भाग्य की एकता में कोई तात्विक अन्तर नहीं है। कल का दूध आज दही के रूप में प्रस्तुत है उसे संचित कर्म और भाग्य का उदाहरण समझा जा सकता है। शास्त्रकारों ने इस तथ्य को समय-समय पर—स्थान-स्थान पर—उजागर भी किया है। भाग्य के स्थान पर बहुत बार ‘कर्म’ शब्द का भी उपयोग होता है। ‘करम में लिखा था’—‘करम रेख मिटती नहीं’—जैसी लोकोक्तियां भी हैं। ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ जैसी अर्धालियों में भले-बुरे भोगों के लिए कर्म को ही उत्तरदायी माना है।

कर्म का पूर्व रूप विचार है। विचार को—बीज और कर्म को—वृक्ष कहा गया है। जैसे विचार होते हैं वैसे ही प्रयास चल पड़ते हैं तद्नुरूप भली-बुरी परिस्थितियां सामने आ खड़ी होती हैं। यह तथ्य सर्वविदित है। पर एक पक्ष दूसरा भी है जो भाग्यवाद के पक्ष में जाता दीखता है। जैसी भवतव्यता होती है वैसे कर्म बन पड़ते हैं। कर्मों को जिस रूप में बनना है वैसे विचार उठेंगे। संचित कर्मों की प्रतिक्रिया इसी रूप में प्रकट होती है। रामायण में एक चौपाई आती है—‘‘काल दंड लै काहु न मारा। हरेउ पथय तस बुद्धि विचारा।’’ संस्कृति में एक सूक्ति है—‘‘देवता लाठी लेकर किसी को नहीं मारते जिसको दुःख देते हैं उसकी बुद्धि का अपहरण कर लेते हैं।’’ दैवी दुर्घटनाएं तो कभी कभी ही होती हैं, आसमान से टूटने वाली विपत्तियां तो कभी-कभी ही किसी-किसी पर गिरती हैं। आमतौर से मनुष्य ऐसे मार्ग से चल पड़ते हैं जहां उनके लिए विनाश प्रतीक्षा कर रहा होता है। संचित कर्मों के फलस्वरूप जो दण्ड या पुरस्कार मिलते हैं उनका पूर्व रूप अन्तःकरण के किसी भीतरी कोने में बीज रूप से पनपने लगता है और बढ़ते-बढ़ते वही विपत्ति या सम्पत्ति की परिस्थितियों के रूप में प्रकट होता है। दैवी वरदान या अभिशाप का यही रूप है। इसमें प्रत्यक्षतः तो दो दोष कर्त्ता का ही दीखता है, पर परोक्ष कारण यह होता है कि संचित कर्मों का विष भीतर ही भीतर उफनता है और वह फोड़े के रूप में प्रत्यक्ष होकर कष्ट देता है। पुण्य कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाली सुविधा सफलता भी आसमान से नहीं उतरती, वरन् अन्तरंग के किसी कोने से सत्प्रवृत्ति बनकर अपनी जड़ जमाती है और उसके अमृत फल श्रेय, यश, सुख, सम्मान आदि की उपलब्धियों के रूप में सामने आ जाते हैं। ‘‘दैवेच्छा’’ शब्द ऐसे ही प्रसंगों के लिए उपयुक्त बैठता है। कई बार न चाहते हुए भी ऐसी भली-बुरी उमंगें भीतर से उठती हैं जो समझाने-बुझाने से भी नहीं रुकतीं और अपनी प्रेरणा से ऐसा कुछ करा लेती हैं, जो सामान्यतया मनुष्य के मन में पहले से नहीं रहा होता। ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं की कमी नहीं होती जिनकी भूमिका थी नहीं, किन्तु अनायास ही आंधी तूफान की तरह प्रकट हुई और सामान्य परिस्थितियों को तोड़ती, मरोड़ती मनुष्य को कहीं से कहीं उड़ा ले गई। ऐसी घटनाएं भले के लिए भी होती देखी गई हैं और बुरे के लिए भी।

भाग्यवाद के समर्थन में भी अगणित घटनाएं घटित होती रहती हैं। वे अपवाद तो होती हैं, पर इतनी कम मात्रा में नहीं होतीं कि उनकी उपेक्षा की जा सके। उनका तथ्य कारण जानने के लिए ग्रह-नक्षत्रों पर दोषारोपण करने या देवताओं को घसीटने, बदनाम करने की आवश्यकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के संचित कर्म—प्रारब्ध बनकर प्रकट हुए और उनने निश्चित परिणाम तक पहुंचाने के लिए भीतर उमंगें उठाने से लेकर बाहर साधन बनाने तक के अनेकानेक आधार परोक्ष रूप से खड़े कर दिये।

निदान सही हो जाने पर रोग की चिकित्सा सरल हो जाती है और बिना भटके उचित उपचार का सही लाभ मिल जाता है। प्रत्यक्ष कर्मों की तरह संचित कर्मों का स्वरूप समझ लिया जाय तो फिर भाग्यवाद और कर्मवाद के बीच जो विरोधाभास है उसकी आवश्यकता न रहेगी। तब किसी ग्रह-नक्षत्र की मनुहार किये बिना अपने पैर में अपनी ही भूल से चुभे हुए कांटे को निकालने का दूरदर्शिता पूर्ण प्रयत्न आरम्भ करना होगा। जिस प्रकार अपनी ही भूल से संकट उपजते हैं उसी प्रकार अपनी ही समझदारी से उनका निराकरण भी किया जा सकता है। समस्याएं खड़ी करने और गुत्थी उलझाने का दोष भी मनुष्य ही करता है, पर यदि वह सम्भलने और बदलने पर तैयार हो जाय तो उन्हें सुलझाने में भी सफल हो सकता है। अपने ही अनाचरण से रोग उत्पन्न होते हैं, पर उस कुमार्गगामिता को छोड़कर यदि पथ्य बरसने और उपचार करने पर उतारू हो सका जाय तो उन रोगों से छुटकारा पाने का भी आधार बन जाता है। विग्रह खड़ा करने वाले यदि चाहें तो संधि भी कर सकते हैं। अशांति के उत्पन्नकर्त्ताओं के लिए यह भी सम्भव है कि वे शान्ति के लिये नये सिरे से प्रयत्न करें और अपनी सूझ-बूझ के सहारे उनमें सफल होकर रहें।

संचित कर्म अपना निज का उपार्जन एवं संग्रह है। इसमें हेर फेर करना अपने काबू से बाहर की बात नहीं है। कर्म का फल निश्चित है, पर उसकी दिशा धारा मोड़ी जा सकती है। उसका निराकरण और समाधान भी हो सकता है। विष खा लेने पर भी जब उपचार द्वारा मरण संकट से बचाव हो सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रारब्धजन्य सम्भावनाओं में सुधार एवं हेर-फेर न हो सके। अशुभ प्रारब्ध के द्वारा उत्पन्न होने वाली विषम सम्भावनाओं का निराकरण सम्भव है। कर्जदारों को किस्तों में ऋण चुकाने के लिए सहमत किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपने ही कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली सम्भावित विपत्तियों से प्रयत्नपूर्वक छूटा न जा सके। प्रारब्ध कर्मों का फल भोग निश्चित होने पर भी उस के निवारण और निराकरण के उपाय हो सकते हैं। उन उपायों को अपनाया जा सकता है और प्रारब्ध के अनिष्ट फलों से बचा जा सकता है।

अनिष्टों से बचने के उपायों की यह व्यवस्था सस्ती और ऊलजुलूल नहीं, सुसम्बद्ध न्यायोचित तथा वैज्ञानिक ही हो सकती है। न तो संकट किसी के आकस्मिक प्रकोप से उत्पन्न होते हैं और न ही उनका निवारण किन्हीं चित्र-विचित्र चिन्ह-पूजा दान-अर्पण आदि मात्र से हो जाता है। आकस्मिक कष्टों-विपत्तियों की भी सही पृष्ठभूमि को समझने पर ही उनसे मुक्ति हो सकती है। भाग्यवाद की भ्रान्त धारणाओं से मुक्त हुए बिना प्रारब्ध के सही स्वरूप को समझना सम्भव नहीं है। यह जानना आवश्यक है कि प्रारब्ध का निर्माण कोई देवता, ग्रह-नक्षत्र आदि नहीं करते। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही करता है। भाग्य का परिणाम मनुष्य को मिलता तो है पर उस भाग्य के अच्छे-बुरे कैसे भी रूप का निर्माता स्वयं मनुष्य ही है।
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