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Books - स्वर्ग नरक की स्वचालित प्रक्रिया

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अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन आवश्यक

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अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन की आवश्यकता सामान्य जीवन में सर्वत्र समझी जाती है, पर आत्मिक प्रगति का प्रसंग जब आता है तो उस ओर से एक प्रकार मुंह ही मोड़ लिया जाता है। इस उपेक्षा का ही कारण है कि प्रगति के लिए किए गये प्रयास प्रायः निरर्थक चले जाते हैं और यह शिकायत बनी रहती है कि आत्मिक क्षेत्र की सफलतायें प्राप्त करने के लिए जो उपाय बताये गए, वे सारगर्भित नहीं थे। अधिकांश साधकों को ऐसी ही असमंजस की स्थिति में फंसा और निराशा से खिन्न मनःस्थिति की ओर जाता देखा जाता है। आरम्भिक उत्साह को बहुत समय तक स्थिर रखने वाले कोई विरले ही दीखते हैं। इसमें अधीरता तो एक कारण है ही, पर उस कठिनाई की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती, जिसके कारण साधनायें अपने प्रभाव का कोई परिचय प्रस्तुत नहीं करतीं और आशा का कुसुम असमय में ही मुरझाने लगता है।

तथ्यों को खोजने पर एक भयंकर भूल सामने आती है कि अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन के सिद्धान्त की उपेक्षा कर दी जाती है। सरलतापूर्वक जल्दी उपार्जन के लोभ में ऐसी आतुरता अपनाई जाती है जिसके अत्युत्साह में परिशोधन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए ठहरना बन ही नहीं पड़ता। फलतः एकांगी प्रयास अधूरे रहते हैं, सफलता के लिए समग्र प्रयास चाहिए। आधी-अधूरी प्रक्रिया हर काम में असफलता उत्पन्न करती है तो फिर आत्मिक क्षेत्र ही उसका अपवाद कैसे रह सकता है। साधनाओं की असफलता का मूल कारण यह अधूरापन ही होता है जिसमें परिशोधन जैसी आरम्भिक आवश्यकता को पूरा किए बिना ही आगे की छलांग लगा दी गई।

दुष्कर्मों के कारण चित्त पर जमे हुए कुसंस्कारों की मोटी परतें आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्हें हटाने को ‘परिशोधन’ कहते हैं। उपासना का महत्व कृषि कर्म करने, उद्यान लगाने जैसा है जिसके लिए बीजारोपण से भी पूर्व भूमि शोधन की आवश्यकता है। अच्छी तरह जोतना, भूमि के कंकड़-पत्थर हटाना, खर पतवार उखाड़ना, नमी रखना, खाद देना जैसे कई काम करके भूमि को इस योग्य बनाया जाता है कि उसमें बोया हुआ बीज ठीक तरह उग सके। अंकुरों को बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुंचने के लिए उपयुक्त भूमि की आवश्यकता होती है। यदि उसके बनाने में आनाकानी की गई है और जल्दी फसल कमाने के लोभ में भूमि साधना का श्रम निरर्थक समझा गया है तो उसे भूल ही जाना कहा जाएगा। जो आरम्भ में तो श्रम बचाने की बुद्धिमत्ता समझा गया था, पर पीछे उसमें बीज भी गंवा बैठने की निराशा ही हाथ लगता है।

आत्मिक प्रगति की साधना का पूर्वार्ध है—आत्मशोधन और उत्तरार्ध है—आत्म विकास। उपासनायें आत्म-विकास का प्रयोजन पूरा करती हैं। इसके लिए योगाभ्यास वर्ग के अनेकानेक विधिविधानों का प्रचलन है। अपनी रुचि, आवश्यकता और परम्परा के अनुसार उनमें साधक चुनाव करते हैं और प्रगति का उपक्रम आरम्भ करते हैं यह उत्तरार्ध है। यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उत्तरार्ध से लाभ पाने के नये आधार और दृश्य सामने आते हैं और कुछ पाने की आशा तो बंधती है, पर पूर्वार्ध की उपेक्षा करके यह छलांग प्रायः असफल ही होती देखी गई है। पूर्ण असफल न भी हों तो भी उसका प्रतिफल इतना स्वल्प दिखाई देता है जो आरम्भ में सोचे या बताये गये माहात्म्य की तुलना में बहुत ही कम होता है और साधक का मन उदास कर देता है।

होना यह चाहिए था कि विकास प्रयासों का उत्तरार्ध अपनाने के साथ-साथ पूर्वार्ध का परिशोधन पक्ष भी ध्यान में रखा गया होता। इसे तप साधना कहते हैं। इसके हलके भारी अनेकों प्रकार हैं। उन्हें अपनाने से मनोभूमि की कुसंस्कारिता हटती है और उर्वरता उत्पन्न होती है। यही भूमि शोधन है जिसमें अंकुर उपजाने जैसे उत्साहवर्धक दृश्य तो तत्काल सामने नहीं आते, पर दूरदर्शिता के सहारे निकट भविष्य में अभीष्ट सफलता मिलने का आश्वासन अवश्य मिलता है। अस्तु साधना की सनातन परम्परा में आत्मशोधन की-तपश्चर्या की उतनी ही आवश्यकता और महत्ता बताई गई है जितनी कि उपलब्धियों की झलक दिखाने वाली योग साधनाओं को। अदूरदर्शिता की भूमि की उखाड़-पछाड़ बेकार लगती है और अंकुर उपजाना या पौद लगाना प्रत्यक्ष लाभदायक दीखता है। इतने पर भी तथ्य तो तथ्य ही रहेंगे। शोधन की उपेक्षा करके उपार्जन की उतावली अन्ततः निराशाजनक ही सिद्ध होती है।

उपासना विधानों का प्रचलन इन दिनों तेजी पर है। बताने वाले ऐसे गुरुओं की बाढ़-सी आई हुई है जो बहुत ही सरल पूजा प्रक्रिया बताकर लम्बे-चौड़े लाभ मिलने का आश्वासन देकर पहली ही बार अनेकों को आकर्षित कर लेते हैं। उनका आरम्भ कर देने वाले लोगों की भी कमी नहीं रहती। क्योंकि वे बहुत ही सरल होते हैं। इतने सरल जिससे शारीरिक-मानसिक या अन्य किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ता। ऐसे ही बाल-क्रीड़ा की तरह उस पूजा पत्री को पूरा कर देना चुटकी बजाने जैसा खेल मात्र होता है। इतना कुछ करने पर भी देवता को प्रसन्न करके और उससे तरह-तरह के वरदान पाने का लाभ यदि मिलता है तो उसे कौन छोड़े। लाटरी खुलने के लाभ की कल्पना करके जब एक रुपये का टिकट खरीदने वाले लाखों मिल सकते हैं तो अत्यन्त सरल पूजा विधि के सहारे प्रचुर लाभ पाने का लोभ कौन संवरण कर सकेगा? स्पष्ट है कि चमत्कारी फलश्रुति बताने वाले को अपनी बताई विधि को अपनाने वालों की कमी नहीं मिलती। किन्तु बताये हुए लाभ न मिलने पर जो निराशा होती है वह अनास्था में बदलती जाती है। ऐसी दशा में सस्तेपन का प्रलोभन बनाने वाले के लिए उपासना पद्धति के लिए लोक मान्यता के लिए अहितकर ही सिद्ध होता है। उपयुक्त मार्ग यही है कि साधना विज्ञान को सही रीति से अपनाया जाय। उचित मूल्य चुकाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त करने के सिद्धान्त पर विश्वास किया जाय। उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाने के साथ या उससे भी पहले आत्मशोधन की महत्ता और आवश्यकता समझी जाय। प्रगति के प्रयासों में उसे अनिवार्य रूप में सम्मिलित रखा जाय। रोग और तप दोनों एक दूसरे के पूरक और अन्योन्याश्रित हैं। इन्हें धुलाई और रंगाई की उपमा दी जा सकती है। तप को धुलाई और योग को रंगाई कहा जा सकता है। मैले, कुचैले, चिकनाई और गन्दगी से सने कपड़े पर कोई भी रंग नहीं चढ़ता और रंग का पैसा एवं रंगाई का श्रम निरर्थक चला जाता है। इसी प्रकार साधना मार्ग पर चलते हुए आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी हुई अति महत्वपूर्ण सफलताएं जिन्हें सिद्धियों या विभूतियों के नाम से जाना जाता है—प्राप्त कर सकना तभी सम्भव हो सकता है जब आत्मशोधन और आत्म विकास की दोनों ही प्रक्रियाएं समानान्तर चलती रहें।

उपासना को योग पक्ष कहते हैं। उसकी विधि व्यवस्था में जप, ध्यान, प्राणायाम, नाद, मुद्रा, बन्ध, प्रत्याहार, समाधि आदि प्रौढ़ स्तर की और पूजा-पाठ, स्नान, देवदर्शन, कथा, कीर्तन जैसे बाल स्तर के अनेकानेक उपचारों का समावेश है। आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली-क्षुद्रता को महानता के साथ सम्बद्ध करने वाली, व्यवहार में आदर्श भर देने वाली और जीवात्मा को परमात्मा बना देने वाली यह समस्त गतिविधियां योग कहलाती हैं। योग का अर्थ है जोड़ना। योग साधना को—उपासना प्रक्रिया को आत्मिक प्रगति का उत्तरार्ध कहते हैं।

परिशोधन को तपश्चर्या कहते हैं—इस प्रकरण में अपनी अवांछनीय आदतों और मान्यताओं को उलटने के लिए अन्तःक्षेत्र में जमी कुसंस्कारिता से संघर्ष करना पड़ता है और आदर्श पालन के लिए कष्ट कठिनाई को जानबूझकर आमन्त्रित करना और हंसते-हंसते सहना होता है। इसी स्तर के हलके भारी क्रिया-कलापों की तपश्चर्या करते हैं। व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन, अभ्यस्त सुविधाओं का परित्याग, मितव्ययता एवं सादगी का वरण, सत्कार्यों के लिए श्रमदान एवं साधनों का अंशदान इसी वर्ग में आते हैं। परमार्थ के लिए किये जाने वाले सभी पुण्य प्रयास इसी श्रेणी में आते हैं। साधना की प्रौढ़ता में दोनों वर्गों के समावेश आवश्यक है।

धर्मशास्त्र में पाप निवृत्ति और पुण्य प्रवृत्ति के दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उपयुक्त साधन चान्द्रायण तप बताया गया है। इस पुण्य प्रक्रिया के पांच प्रमुख भाग यह हैं—(1) एक महीने तथा आहार के घटने-बढ़ने वाला उपवास (2) गुप्त पापों का प्रकटीकरण (3) आन्तरिक परिवर्तन कर सकने वाले वातावरण में निवास और अनुशासन का प्रतिपालन (4) अन्तःकरण को परिष्कृत करने वाला योगाभ्यास युक्त तप साधन। (5) दुष्कर्मों की क्षति पूर्ति और पुण्य वर्धन की परमार्थ परायणता। इन्हें पूरा करने से चान्द्रायण तप सम्पन्न होता है। मात्र एक महीने का उपवास ही चान्द्रायण नहीं है।

एक महीने की निर्धारित ब्रह्म वर्चस् साधना क्रम में इन पांचों का समन्वय है।

(1) पूर्णिमा से पूर्णिमा तक एक महीने का उपवास रहता है। पूर्णिमा को पूर्ण आहार कर उसका चौदहवां अंश कृष्ण पक्ष में हर दिन घटाया जाता है। शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से बढ़ाते रहते हैं। अनभ्यास लोगों को ‘शिशु’ चान्द्रायण कराया जाता है और मनस्वी लोगों को यति चान्द्रायण। यह स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए शारीरिक काया-कल्प जैसा प्रयोग है। इससे रोग की जड़ें कटती हैं। परम सात्विक हविष्यान्न ही पेट में जाने से विचार परिष्कार और सद्भाव सम्वर्धन का उद्देश्य बड़ी अच्छी तरह पूरा होता है। पंच गव्य सेवन, गौ मूत्र से संस्कारिता हविष्यान्न का आहार आदि के माध्यम से गौर सम्पर्क भी सधता रहता है। प्यास बुझाने के लिए मात्र गंगाजल पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

(2) गुप्त पापों का प्रकटीकरण साधना के मार्गदर्शक के सम्मुख करके चित्त की भीतरी परतों पर जमी हुई दुराव की जटिल ग्रन्थियों को खोला जाता है। मानसिक रोगों के निराकरण का यह बहुत ही उत्तम उपचार है। जो किया जा चुका उसके परिमार्जन के लिए क्या करना चाहिए यह परामर्श प्राप्त करना भी इसी प्रकटीकरण का अंग है।

शीर्ष संस्कार इसी प्रयोजन के लिए है। पूर्ण मुण्डन तो नहीं कराया जाता, पर बाल थोड़े छोटे अवश्य हो जाते हैं। जिसका तात्पर्य है संचित दुष्ट विचारों का परित्याग। बच्चों का मुण्डन संस्कार भी जन्म-जन्मान्तरों की पशु प्रवृत्तियों को मस्तिष्क में से हटाने के उद्देश्य से ही किया जाता है। बाल छांटने के अतिरिक्त गोमूत्र गोमय आदि मन्त्र विधान सहित शीर्ष संस्कार किया जाता है। साधक अनुभव करता है कि इस धर्म कृत्य के साथ-साथ उसके मनःसंस्थान में अति महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है।

(3) वातावरण का मनुष्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व के परिवर्तन प्रयास में वातावरण का परिवर्तन आवश्यक माना गया है। ब्रह्म वर्चस आरण्यक में वैसी समुचित सुविधा उपलब्ध है। परिमार्जन, संरक्षण और अभिवर्धन के तीनों उद्देश्य पूरे करने वाली त्रिवेणी यहां विद्यमान है। दिनचर्या में स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन के चारों तत्व गुंथे हुए हैं। शारीरिक और मानसिक संयम अनुशासन की कठोर विधि व्यवस्था का पालन करना पड़ता है। प्रवचन और परामर्श का दैनिक लाभ मिलता है। दिनचर्या, इतनी अनुशासित और व्यवस्थित रहती है कि उस ढर्रे में ढल जाने वाला भविष्य में अपने आपको सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक ढांचे में ही ढाल लेता है। वातावरण का प्रभाव अभिनव परिवर्तन के रूप में निरन्तर अनुभव होता रहता है।

(4) अन्तःकरण में दैवी संस्कारों की जड़ जमाने वाले योगाभ्यास और तप साधन चान्द्रायण के साथ-साथ ही करने होते हैं। सवा लक्ष्य गायत्री पुरश्चरण अनिवार्य रूप से आवश्यक है। गायत्री यज्ञ में नित्य ही सम्मिलित होना होता है। इसके अतिरिक्त उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना के लिए पांच योगाभ्यास निश्चित हैं। जप और ध्यान के अतिरिक्त (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन प्राणायाम (3) खेचरी मुद्रा (4) सोहम् साधना एवं शक्तिचालिनी प्रक्रिया के रूप में नित्य ही करनी पड़ती है। इन साधनाओं को चेतना क्षेत्र के पांच प्राणों का और काया क्षेत्र के पांच तत्वों का परिष्कार होने के साथ साथ जीवन में अभिनव प्राण संचार होता है। शास्त्रों में इसे पंचीकरण योगाभ्यास एवं पंचाग्नि तपश्चर्या कहा है। सर्व साधारण के सध सकने जितना ही दबाव इस एक महीने के साधन क्रम में सम्मिलित किया गया है। गायत्री की पंचमुखी साधना में पंचकोशों के अनावरण का ग्रन्थि वेधन का रहस्यमय विधान इन्हीं पांच साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है। अन्तःचेतना के यह पांच उभार देवताओं के वरदान जैसे चमत्कारी प्रतीत होते हैं।

(5) पापों की क्षति पूर्ति एवं पुण्य सम्पदा की अभिवृद्धि के लिए चान्द्रायण व्रत की पूर्णाहुति के रूप के कुछ अवांछनीयताओं का परित्याग और कुछ परमार्थों को अपनाने का संकल्प करना होता है। संग्रह का अंश दान तीर्थयात्रा के रूप में धर्म प्रचार का श्रमदान, पुण्य प्रयोजनों में सहकार, सत्सृजन में योगदान जैसे कुछ कदम ऐसे उठाने के लिए परामर्श दिया जाता है जिनके सहारे अन्तःकरण पर परिवर्तन को व्यवहार में उतारने की छाप प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगे। आन्तरिक काया-कल्प—चान्द्रायण तपश्चर्या का उद्देश्य है। यह कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित बनकर न रह जाय वरन् व्यवहार में भी परिलक्षित होने लगे। इसके लिये क्रियात्मक कदम उठाने के लिए वैसा परामर्श मिलता है जो प्रस्तुत परिस्थितियों में सरलतापूर्वक शक्य हो सके। उपलब्ध सुसंस्कार परिपक्वता के लिए—दूसरों के सम्मुख परिवर्तन का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए कुछ साहसिक कदम उठाने पड़ते हैं। यही चान्द्रायण की पूर्णाहुति है।

बीज को वृक्ष रूप में परिणित करना एक चमत्कार है। व्यक्ति को तुच्छ से महान भी एक दैवी वरदान है। बीज अनायास ही वृक्ष नहीं बन जाता। उसे उगने से लेकर फूलने-फलने की परिपक्व स्थिति तक पहुंचने में समय और साधनों की आवश्यकता पड़ती है—(1) भूमि (2) खाद (3) पानी (4) सुरक्षा एवं (5) उत्पादक की श्रमशीलता का समन्वय आवश्यक होता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वराधन को सफल बनाने के लिए भी पांच परिपोषणों की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं पांचों का समन्वय ब्रह्म वर्चस् साधना में है। इसका सुनियोजित तप साधना की सामूहिक व्यवस्था से उस युग शक्ति का उद्भव होगा जिसकी सामर्थ्य से नये युग के सृजन की अनेकों आवश्यकताएं पूर्ण हो सकेंगी। व्यक्ति में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए जिन सृजन शक्तियों को युगान्तकारी भूमिका निभानी है, उनकी धार तेज करने के लिए यह एक महीने की चान्द्रायण तपश्चर्या अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगी यह सुनिश्चित है।

चान्द्रायण का सामान्य व्रत विधान

शास्त्रों में प्रायश्चित्त प्रकरण में कई प्रकार के विधानों का वर्णन है। कृच्छ, अतिकृच्छ, तप्तकृच्छ, सौम्य कृच्छ, पाद कृच्छ, महा कृच्छ, कृच्छाति कृच्छ, पर्ण कृच्छ, सान्तापन, कृच्छ सान्तापन, महा सान्तापन, प्राजापत्य, पराक, ब्रह्मकूर्य आदि विधानों का उल्लेख है। इनमें चान्द्रायण व्रतों को तप में सर्व प्रमुख माना गया है।

उसकी क्रिया-प्रक्रिया सर्वविदित है। मोटे नियम इस प्रकार हैं— एकैकं ह्रासयेत्पिंड कृष्णे, शुक्ले च वर्द्धयेत् । इन्दुक्षयेन पुंजीत एवचान्द्रायणो विधि ।। —वशिष्ठ

पूर्णमासी को पूर्ण भोजन करके एक-एक ग्रास घटाता जाय। चन्द्रमा न दीखने पर अमावस्या और प्रतिपदा को निराहार रहे। पीछे एक-एक ग्रास बढ़ाकर शुक्ल पक्ष के 14 दिनों में पूर्ण आहार तक पहुंच जाय। ग्रास से तात्पर्य मुर्गी के अण्डे जितना तथा मुंह में जितना आहार एक बार में आ सके उतना है। नित्य स्नायी मिताहारी गुरुदेव द्विजार्चकः ।। पवित्राणि जपेच्चैव जुहुयाच्चैव शक्तितः ।। व्रीहिणाष्टिक मुद्गाश्चच गोधूम सतीला यवाः । चरुमैक्ष्यं सक्तुव्रणाः शांवांघृत दधि पयः ।। —अग्नि पुराण

नित्य स्नान करे, भूख से कम खाये, गुरु देव, ब्रह्म परायणों आ अभिवादन करे, पवित्र रहे, जप करे, हवन करे। जौ, चावल, मूंग, गेहूं, तिल, हविष्यान्न, सत्तू, शाक, दूध, दही, घृत पर निर्वाह करे। चान्द्रायण के चार भेद हैं (1) पिपीलिका (2) यव मध्य (3) यदि (4) शिशु। इन चारों के अन्य समान हैं, पर आहार सम्बन्धी कठोरता, न्यूनाधिक है। यदि तपश्चर्या अधिक कठिन है और शिशु व्रत साधन में शरीर और मन की स्थिति को देखते हुए सरलता रखी गई है।

पाप पर से पर्दा हटाया जाय

पापों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया का एक स्वरूप तो मुण्डन कराने—बाल कटवाने के रूप में प्रतीक चिन्ह की तरह है। दूसरा चरण है प्रकटीकरण। यह मात्र किसी सत्पात्र के सम्मुख ही हो सकता है। सार्वजनिक घोषणा कर सकने का किसी में साहस हो तो और भी उत्तम। पर इस प्रकटीकरण में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि व्यभिचार जैसी प्रक्रियाओं में साथी का नाम, पता आदि प्रकट न किया जाय। पापों पर पड़े हुए पर्दे को उठाने और प्रकटीकरण की विधा पूरी करने के लिए शास्त्र निर्देश इस प्रकार है— यथा तथा नरोऽधर्म स्वयं कृत्वाऽनुभाषते । तथा तथा त्वचेवाहि स्तेनाधर्मेण मुच्यते ।। —मनुस्मृति

जैसे-जैसे मनुष्य अपना अधर्म लोगों में ज्यों का त्यों प्रकट करता है, वैसे-वैसे ही वह अधर्म से उसी प्रकार मुक्त होता है जैसे केंचुली से सांप। समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृत पापयाः । गुहितस्य भवेद् वृद्धि कीर्तितस्य भवेत् क्षयः ।। —महाभारत

राजेन्द्र जब पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है, उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है उसका क्षय हो जाता है। तस्मात् प्रकाशयेत् पापं स्वधर्म सततं चरेत् । क्लीवा दुःखी च कुष्ठी च सप्त जन्मानि वै नरः ।। —पाराशर स्मृति

पाप को छिपाने से मनुष्य, सात जन्मों तक कोढ़ी दुःखी, नपुंसक होता है। इसलिए पाप को प्रकट कर देना ही उत्तम है। आचक्षाणेनतत्पापमेतत्कर्म्मास्मिशाधिमाम् । वह अपने किये हुए पाप को भी मुंह से कहता हुआ दौड़े कि मैं ऐसे कर्म के करने वाला हूं मुझे दण्डाज्ञा प्रदान कीजिए। कृत्वा पापं न गूहेत् गुह्यमानं विवर्द्धते । स्वल्पं वाथ प्रभूतं वा थर्मविद्ध्यो निवेदयेत् ।। ते हि पापे कृते वेद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम् ।। व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः ।। —पाराशर स्मृति

पाप कर्म बन पड़ने पर उसे छिपाना नहीं चाहिए। छिपाने से वह बहुत बढ़ता है। पाप छोटा हो या बड़ा उसे किसी धर्मज्ञ से प्रकट अवश्य कर देना चाहिए। इस प्रकार उसे प्रकट कर देने से पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे चिकित्सा करा लेने पर रोग नष्ट हो जाते हैं। रहस्यं प्रशश्यं च । —प्रायश्चित्तेन्दु शेखर पापं नश्यति कीर्तनात् । —धर्म सिन्धु

रहस्य के पर्दे को उठा देना चाहिए। पाप के प्रकटीकरण से वे धुल जाते हैं। तस्मात् पापं न गुह्येत् गुहमानं विवर्धयेत् । कृत्वातत् साधुरवमेयंतत् शमयन्त्युत ।। —महा. अनु.

अतः अपने पाप को न छिपावें, छिपाया हुआ पाप बढ़ता है। यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु पुरुषों से कह देना चाहिए। वे उसकी शान्ति कर देते हैं। परिशोधन प्रक्रिया में प्रकटीकरण भी एक उपचार है। जो कुकृत्य बन पड़े हैं उनका प्रकटीकरण आवश्यक है। पर वह होना उन्हीं के सामने चाहिए जो इतना उदार हो कि चिकित्सक की करुणा से अपराधों को धैर्य पूर्वक सुन सके और घृणा धारण किये बिना उन्हें अपने भीतर पचा सके। प्रकट करने वाले की निन्दा न होने दें। उसे उस प्रकटीकरण के कारण लोकनिन्दा के द्वारा होने वाली क्षति न पहुंचने दें, वरन् उसे स्नेहपूर्वक सत्परामर्श देकर सुधरने में सहायता करे। ऐसे व्यक्ति जब तक न मिलें तब तक प्रकटीकरण नहीं ही करना उचित है।

चान्द्रायण से शक्ति-अभिवर्धन

चान्द्रायण तप का एक निषेध पक्ष है—कष्ट सहन। जिसमें आहार घटाने-बढ़ाने की तितीक्षा प्रमुख है। दोषों के प्रकटीकरण से भी पश्चात्ताप करने और लज्जित होने का मानसिक कष्ट है। क्षति पूर्ति के लिए दान पुण्य करना अर्थ दण्ड है। तीर्थयात्रा आदि सत्कर्मों के लिए श्रमदान जैसे परमार्थों में भी कष्ट सहने और त्याग करने की ही बात है। यह सारा समुच्चय आत्म-प्रताड़ना परिकर का है। परिशोधन की प्रक्रिया निषेधात्मक होने के कारण कष्ट सहने की ही हो सकती है।

दूसरा विधायक पक्ष है—योग, जिसमें परित्याग की रिक्तता पूर्ण करनी पड़ती है। यह उपार्जन है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना योग है। योग से हर किसी का परिमाण बढ़ता है। विस्तार, मूल्य और सामर्थ्य में वृद्धि होती है। परित्याग से जो घाटा पड़ा था उसकी कमी योग की कमाई द्वारा पूरी हो जाती है। शौच जाने से पेट खाली होता है। इस कारण लगने वाली भूख की पूर्ति भोजन से करनी पड़ती है, तभी उस युग्म उपक्रम से शरीर यात्रा का पहिया आगे लुढ़कता है।

ब्रह्म वर्चस् साधना का यह भूमि शोधन पथ चान्द्रायण तप से पूरा होता है। इसके उपरान्त बीज बोने और खोद पानी लगाने की अभिवर्धन उद्देश्य के लिए की जाने वाली प्रक्रिया योग साधना द्वारा सम्पन्न होती है।

ब्रह्मवर्चस् योगाभ्यास पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी साधना है। पांच प्राणों से चेतना का और पांच तत्वों से काया का निर्माण हुआ है। इन दोनों प्रवाहों के मध्यवर्ती दिव्य शक्ति स्रोतों को पंचकोश कहते हैं। योगशास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यह पांच शक्तिशाली आवरण आत्मा पर चढ़े हैं। इन्हें सुरक्षा कवच वाहन, आयुध आदि भी कहा जा सकता है। यह रहस्यमय रत्न भण्डार हैं जिनमें सिद्धियों और विभूतियों के मणिमुक्तक प्रचुर परिमाण में भरे पड़े हैं। चाबी न होने पर तिजोरी में भरी धन राशि भी अपने किसी काम नहीं आती और अधिपति को भी अभावग्रस्त रहना पड़ता है। इसी प्रकार इन दिव्य कोशों का द्वार बन्द रहने पर—आवरण चढ़ा रहने पर मनुष्य को दुःखी दरिद्रों की तरह गया-गुजरा जीवनयापन करना पड़ता है।

उच्चस्तरीय गायत्री उपासना को पंचकोशों की अनावरण साधना कहते हैं। इसी योगाभ्यास को हठयोग की पद्धति के अन्तर्गत चक्रवेधन एवं कुण्डलिनी जागरण साधना कहते हैं। षटचक्रों का नाम सभी ने सुना है। भू-मध्य भाग से मस्तिष्क प्रारम्भ होता है और वह मेरुदण्ड में होकर जननेन्द्रिय क्षेत्र तक चला जाता है। यह समूचा परिधि ब्रह्मलोक या ब्रह्मरंध्र कहलाता है। इसमें सात शक्ति संस्थान हैं। इनमें से छह मध्यवर्ती सक्रिय स्रोत षट्चक्र हैं। एक इन सबका अधिपति नियन्त्रक है, जिसे महाचक्र, सहस्रार चक्र कहते हैं। इस प्रकार यह पूरा परिकर गिना जाय तो सप्तचक्र बन जाते हैं। इन्हें का पिण्ड—ब्रह्माण्ड में अवस्थित सप्त ऋषि, सूर्य के सप्त अश्व, सप्त लोक, सप्त सिन्धु, सप्तमेरु, सप्त द्वीप, सप्त तीर्थ आदि अलंकारिक निरूपणों के साथ अध्यात्म शास्त्रों में वर्णन मिलता है।

सप्त चक्रों की भी एक विवेचना यह है कि नीचे का मूलाधार और ऊपर का सहस्रार यह दोनों क्रमशः प्रकृति और पुरुष के शक्ति और शिव के, रयि और प्राण के, धरती और स्वर्ग के प्रतीक हैं। पृथकता की स्थिति में यह दोनों बहुत ही स्वल्प काम कर पाते हैं। मूलाधार प्रायः प्रजनन का ताना बाना बुनता रहता है और शरीर को ऊर्जा, साहस, उत्साह आदि प्रदान करता है। सहस्रार की अर्ध मूर्छित स्थिति में अचेतन और चेतन दोनों मिल कर कायिक गति-विधियों का संचालन और चिन्तन वर्ग के प्रयोजन पूरे करते रहते हैं। यह इन दोनों का निर्वाह मात्र के लिए चलते रहने वाला स्वल्प कार्य है। यदि उन दोनों की तन्द्रा छुड़ा दी जा सके और वे समर्थ सक्रिय हो उठें तो फिर समझना चाहिए कि अनन्त शक्तियों के—सिद्धियों के स्रोत खुल पड़ेंगे और मनुष्य साधारण से असाधारण बन जायगा। ऋषि, देवता और अवतारी मनुष्य इसी स्तर के होते हैं उनकी आन्तरिक मूर्छना जागृति में परिणित हो गई होती है। कुम्भकरण का पौराणिक उपाख्यान इसी स्थिति की झांकी कराता है। जब भी वह दैत्य जागता था अपनी सामर्थ्य का हाहाकारी परिचय प्रस्तुत करता था। मूलाधार की सामर्थ्य को सर्पिणी कहते हैं और सहस्रार को महासर्प कहा गया है। इन दोनों के मिलन को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। बिजली के अलग-अलग पड़े तार जब भी मिलते हैं तो चिनगारी छूटती और शक्तिधारा प्रवाहित होती है। इसी स्थिति को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। यह सौभाग्य सुअवसर जिन्हें प्राप्त होता है वे भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न पाये जाते हैं। वे आत्मोत्कर्ष का परम लक्ष्य प्राप्त करते और अपूर्ण से पूर्ण बनते हैं। ईश्वर प्राप्ति इसी स्थिति का नाम है।

सहस्रार को महासर्प कहा गया है। विष्णु की शेष शैया भी वही है। शिव के अंग में वही लिपटा है। समुद्र मंथन में रस्सी का काम वही करता है। सर्पिणी के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन प्रायः होता रहता है। वह अधोमुखी निद्रित स्थिति में पड़ी रहती है। जागृत होने पर ऊपर उठती और अग्नि शिखा के रूप में देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुंचती है। यह अलंकारिक वर्णन इस बात का है कि जननेन्द्रिय मूल में पड़ी हुई यह महाशक्ति जब ऊर्ध्वगामी बनती है तो मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मरन्ध्र तक जा पहुंचती है और उस क्षेत्र में सन्निहित अगणित दिव्यताओं को अनायास ही जागृत करती है। इसी स्थिति में अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण होता है। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकलने के उपाख्यान में मूलाधार के कुण्डगह्वर को समुद्र, मेरुदण्ड को सुमेरु पर्वत, सूर्यवेधन प्राणायाम के इड़ा पिंगला संघर्ष को मंथन माना जाता है। समुद्र मंथन कुण्डलिनी जागरण का महा पुरुषार्थ है जिसमें चेतना के देव पक्ष और काया के दैत्य पक्ष को मिल-जुलकर साधनारत होना होता है। इसका सत्परिणाम समुद्र मंथन से निकले 14 प्रसिद्ध रत्नों की तरह साधक को दिव्य विभूतियों के रूप में प्राप्त होता है।

मूलाधार और सहस्रार को नीचे वाले महाचक्रों को यदि कुण्डलिनी जागरण साधना के विशेष वर्ग में गिन लिया जाय तो शेष मध्यवर्ती पांच चक्र ही रह जाते हैं। इन्हें पांच कोश या पांच चक्र कह सकते हैं। कोश व्याख्या में इन्हें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कहते हैं। चक्र वर्णन में इन्हीं को स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनामृत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र कहा जाता है। यह एक ही तथ्य का दो रूप में वर्णन विवेचन मात्र है। वस्तुतः है एक ही। चक्रों का जागरण या कोशों का अनावरण एक ही बात है। संख्या की दृष्टि से पांच, छह या सात की गणना से किसी को भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। गायत्री माता के पांच मुखों की उच्चस्तरीय साधना परम शान्तिदायिनी और महान शक्तिशालिनी साधना है। इसी प्रक्रिया को ब्रह्म वर्चस् का योगाभ्यास साधना पक्ष समझा जाना चाहिए।
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