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Books - स्वर्ग नरक की स्वचालित प्रक्रिया

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स्वर्ग नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया

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शरीर से असमर्थों, दुर्बलों और रुग्णों की ही तरह मानसिक पिछड़ेपन और विकारग्रस्तता के दल-दल में धंसे हुए लोगों का ही बाहुल्य अपने समाज में दृष्टिगोचर होता है। यह विक्षिप्तता भी एक प्रकार की बीमारी ही है जिसमें प्राणियों को तिरस्कार, अभाव एवं चित्र-विचित्र प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं।

विचारणीय है कि यह सब होता क्यों है? मनुष्य का प्रत्यक्ष कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। जान-बूझकर ऐसा कुछ किया हो जिससे उन शारीरिक व्याधियों और मानसिक आधियों का दुःख सहना पड़े ऐसा कुछ सूझ नहीं पड़ता। फिर ईश्वर ने ऐसी विचित्र संरचना क्यों की। किसी को ऐसा-किसी को वैसा क्यों बनाया? इसका भी कोई उत्तर नहीं हो सकता? ईश्वर न तो अन्यायी है न उसकी सृष्टि में अन्धेरगर्दी, अव्यवस्था। दूसरी ओर इन व्याधिग्रस्त लोगों का ऐसा कोई प्रत्यक्ष कसूर भी नहीं दीख पड़ता, जिसका दण्ड भुगतने जैसी बातें कही जा सकें।

इस असमंजस का समाधान मनः शास्त्र के आचार्य एक ही शोध निष्कर्ष के आधार पर देते हैं कि अनैतिक एवं असामाजिक चिन्तन और कर्तृत्व से मनःक्षेत्र में उत्पन्न होने वाला अन्तर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और उससे निरन्तर उठने वाली आन्तरिक कलह सारे मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालक के आहत, घायल, उद्विग्न होने पर उसके आधीन काम करने वाले तन्त्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है। शरीर के अनाचार और मस्तिष्क के मनोविकार ही वे कारण हैं जिनके कारण आत्म-सत्ता का स्वसंचालित तन्त्र अनेकानेक प्रकार के आत्म-दण्डों की व्यवस्था अपने आप ही कर लेता है।

नरक का अधिपति पुराणों में चित्रगुप्त को कहा गया है। वर्णन है कि इन चित्रगुप्त के बही खातों में मनुष्य के सभी कर्म निरन्तर लिखे जाते रहते हैं। उन अभिलेखों के आधार पर भगवान चित्रगुप्त प्रत्येक प्राणी के लिए दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करते हैं। यह चित्रगुप्त विज्ञान की विवेचना के अनुसार अचेतन मन ही है जिसकी अत्यन्त सम्वेदनशील कोशाओं के ऊपर मनुष्य के भले-बुरे कर्म टेपरिकॉर्डर के फीते अथवा फोटोग्राफी की प्लेट की तरह अंकित होते रहते हैं। समयानुसार वे प्रकट एवं फलित होते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया का परिचय शारीरिक एवं मानसिक रोगों के रूप में सामने आता है। इन दो व्यथाओं के साथ तीसरी एक और भी अनायास ही जुड़ जाती है, वह है सामान्य जीवन में पग-पग पर असफलता।

गंगा और यमुना दो के संगम पर एक तीसरी सरस्वती कहीं पाताल में से अनायास ही प्रकट होकर उस समागम के स्थान पर आ धंसी है। ठीक इसी तरह शारीरिक व्याधियां और मानसिक आंधियां जिसे घेरे हुए हैं उस विकृत मस्तिष्क और अस्वस्थ शरीर के द्वारा न कुछ उपयुक्त सोचते बन पड़ेगा और न उचित कर सकना सम्भव होगा। अतएव अपनी अटपटी कानी-कुबड़ी गतिविधियां किसी महत्वपूर्ण सफलता तक पहुंचने ही न देंगी। सम्बन्धित व्यक्ति उस बेतुके व्यक्ति से खिंचते, खीजते रहेंगे। फलतः सच्चे सहयोग से भी प्रायः वंचित ही रहना पड़ेगा। मतभेद बढ़ते-बढ़ते शत्रुता और विग्रह तक जा पहुंचते हैं और आक्रमण, प्रत्याक्रमण के कुचक्र में ऐसे व्यक्ति को भारी घाटा उठाना पड़ता है। प्रगति पथ तो प्रायः अवरुद्ध ही बना रहता है। यह नई विपत्ति-शारीरिक और मानसिक रुग्णता की ही देन है। दो रंगों के मिलने से तीसरा एक और नया रंग प्रकट हो जाता है। आधि और व्याधि ग्रस्तों को अवरोध और असफलता का तीसरा संकट अतिरिक्त रूप से सहन करना पड़ता है।

शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग और सफलता के अवरोध का त्रिविध समन्वय कितना कष्टकर और सन्तापदायक होता है उसे भुक्तभोगी ही जानता है। जिन्हें इन संकटों का त्रास सहना पड़ता है उनके लिए इस विपन्नता का प्रत्यक्ष नरक के रूप में ही अनुभव होता है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को—अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मनःसंस्थान ही है जिसमें प्रतिफल को परिणित कर सकने की ईश्वर-प्रदत्त क्षमता मौजूद है। नियंत्रण-व्यवस्था एवं अनुशासन को ही यम कहते हैं। अतः उस व्यवस्था का केन्द्रस्थल मस्तिष्क ही यमलोक है तथा मस्तिष्क की मूल-भूत सत्ता चित्त है चित्रगुप्त। ईश्वर ने सर्वत्र स्वसंचालित-व्यवस्था रखी है ताकि न्याय-व्यवस्था की अलग से अतिरिक्त झंझट न उठानी पड़े। अपनी ही सत्ता का एक पक्ष कर्म करता है, दूसरा उसका प्रतिफल गढ़कर तैयार कर लेता है। बाहर के न्यायाधीश को भ्रम में डाला जा सकता है। पर अन्तस्त में बैठे दृष्टा की निष्पक्ष न्यायशीलता कभी भी विचलित नहीं हो सकती। स्वयं के पुण्य ही उत्कर्ष-उल्लास के तथा स्वयं के पाप ही शोक-संताप के नये-नये अवसर सामने लाते रहते हैं।

भगवान किसी को न तो दण्ड देता है और न पुरस्कार। वह केवल विधि व्यवस्था का विधायक और नियन्ता मात्र है। सृष्टि की क्रमबद्धता और समस्वरूपता को बनाये रखने भर का ध्यान रखता है। व्यक्तिगत जीवन में उसका हस्तक्षेप नहीं के बराबर है। हर किसी को उसने यह पूरी आजादी दी है कि जो चाहे जिस तरह सोचे या करे। साथ ही विवेक का अनुदान देकर यह भी स्पष्ट कर दिया कि चिन्तन का कर्तृत्व का स्तर ही उसके सामने दण्ड पुरस्कार के रूप में सामने आयेगा। स्वतन्त्रता दिशा अपनाने भर की है। पर जो कंटीले मार्ग पर चलेगा वह चुभन से बच न सकेगा यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया। धर्म शास्त्र, तत्व दर्शन और प्रमाण उदाहरणों से भरा इतिहास इसी यथार्थता को पग-पग पर प्रतिपादित करते रहे हैं।

घृणित कर्म करने वाले आप ही अपने को दण्ड देते हैं और सन्मार्ग पर चलने वाले अपनी गतिविधियों के कारण स्वयं ही पुरस्कृत होते हैं। अनादि काल से यही स्वसंचालित क्रिया प्रतिक्रिया को सुसम्बद्ध शृंखला अपनी गति से चल रही है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुमार्ग पर चलने वाले सुख-शान्ति से रहें और सन्मार्ग अपनाने वालों को दुख दारिद्र्य से ग्रसित रहना पड़े। यदि ऐसा होता तो यहां उचित अनुचित के बीच कोई भेद ही न रह जाता और कोई कुकर्म से बचने एवं सत्कर्म अपनाने के लिए तैयार ही न होता। अधर्म का तात्कालिक आकर्षण यदि चिरस्थायी लाभ दें सका होता और उसके दुष्परिणाम की कोई आशंका न होती तो कदाचित् ही कोई व्यक्ति अधर्माचरण को अपनी प्रधान नीति बनाने से चूकता, तब शायद ही किसी को धर्ममार्ग अपनाने का उत्साह उत्पन्न होता और कदाचित ही कोई उस कष्टसाध्य प्रतीत होने वाली प्रक्रिया को अपनाता।

ईश्वर ने मनुष्य को जितना स्वावलम्बी बनाया है उतना ही परावलम्बी भी। सर्व तन्त्र स्वतन्त्र मनुष्य नहीं ईश्वर ही है। ईश्वर इसलिए स्वतन्त्र है कि उसने नियम व्यवस्था बनाई है और उसने सर्व प्रथम अपने को बांधा है। जहां विश्व का कण-कण किसी विधान से बंधा है उसी प्रकार ईश्वर भी मर्यादा पुरुषोत्तम है। मर्यादायें टूटने न पायें उन्हें तोड़ने का कोई दुस्साहस न करे इसलिए उसने अपने को भी प्रतिबन्धित किया है। पात्रता की मर्यादा से अधिक अनुदान किसी को नहीं मिलते। कर्मफल की मर्यादा का उल्लंघन करके वह न तो किसी को क्षमा प्रदान करता है और न किसी को भक्त अभक्त होने के नाम पर राग, द्वेष की नीति अपनाता है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। बिजली मनुष्य की बहुत सेवा सहायता करती है—पर करती तभी तक है जब तक उसे विधि-पूर्वक प्रयुक्त किया जाता है। अविधि पूर्वक व्यवहार करने पर यज्ञाग्नि भी होता को जला सकती है। प्रचुर खर्च करके बिजली के यन्त्रों को सुसज्जा एवं मनोयोग पूर्वक लगाने वाले भी यदि प्रयोगों में प्रमाद बरतें तो वह प्रतिष्ठापित विद्युत यन्त्र प्रयोक्ता के प्राण लिये बिना न छोड़ेंगे। ईश्वर को कर्मफल की श्रृंखला में अग्नि या विद्युत के समतुल्य माना जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

जन्मजात अपंग, बाधित, असमर्थ, मूढ़, रुग्ण व्यक्तियों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि उद्धत आचरण करने वालों के प्रगति साधनों का प्रकृति ने किस प्रकार अपहरण कर लिया। बन्दूक का दुरुपयोग करने वालों का लाइसेंस जब्त हो जाता है, इसी प्रकार मोटर चलाने में प्रमाद बरतने वालों का लाइसेंस छिन जाता है। अपराधियों को न्यायालय में समाज से पृथक रहने का यातनापूर्ण कारावास मिलता है और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते हैं। जन्मजात बाधितों को देखकर हम अनुमान लगा सकते हैं कि मिली हुई कर्म स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वालों से प्रकृति किस प्रकार प्रतिशोध लेती है।

सुविधाजनक प्रगतिशील वातावरण में, सुसंस्कारी परिवार में जन्म होना पूर्वकृत सत्कर्मों का फल कहा जा सकता है। दुर्भागी व्यक्ति कुसंस्कारी परिस्थितियों में जन्म लेकर असुविधाजनक अड़चन भरे वातावरण में रहते हैं और प्रगति पथ पर बढ़ने में भारी अड़चन अनुभव करते हैं। इस विभेद के पीछे पूर्व जन्मों में संग्रहीत शुभ-अशुभ कर्म के परिणाम झांकते देख सकते हैं। यों इन अड़चन भरी परिस्थितियों में भी सत्कर्म करने की, आगे बढ़ने की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है और कोई चाहे तो नियत अवरोधों को सहन करते हुए भी आगे बढ़ने, ऊंचे उठने में सफल हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जिनमें अन्धे, अपंग, मूक, बधिर जैसी विषमताओं से ग्रसित लोगों ने इतनी उन्नति करली जिसे देखकर सर्वसुविधा सम्पन्न व्यक्तियों को भी आश्चर्यचकित रहना पड़ा। यदि इस संसार में ऐसी व्यवस्था रही होती कि तत्काल कर्म फल मिला करता तो फिर मानवी विवेक एवं चेतना की दूरदर्शिता की विशेषता कुण्ठित अवरुद्ध हो जाती। यदि झूठ बोलते ही जीभ में छाले पड़ जायें, चोरी करते ही हाथ में दर्द उठ खड़ा हो, व्यभिचार करते ही बुखार आ जाय, छल करने वाले को लकवा मार जाय तो फिर किसी के लिए भी दुष्कर्म कर सकना सम्भव न होता। एक ही निर्जीव रास्ता चलने के लिए शेष रह जाता। ऐसी दशा में स्वतन्त्र चेतना का उपयोग करने की, भले और बुरे में से एक को चुनने की विचारशीलता नष्ट हो जाती और विवेचना, ऊहापोह का बुद्धि प्रयोग सम्भव न रहता। तब दूरदर्शिता और विवेकशीलता की क्या आवश्यकता रहती और इसके अभाव में मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रतिभा का कोई उपयोग ही न हो पाता। बुरे कार्य के दुष्परिणाम और भले कार्य के सत्परिणाम समझने के लिये अन्तः प्रेरणा, अध्यात्म तत्वदर्शन, धर्म विज्ञान नीति सदाचरण, श्रेय साधना का जो उपयोगी एवं आकर्षक सतोगुणी धर्म कलेवर खड़ा किया गया है उसकी कुछ आवश्यकता ही न रहती। सब कुछ नीरस हो जाता है, यहां जो कौतुक कौतूहल दीख रहा है, बहुरंगी, कटु, मधुर अभिव्यंजनायें सामने आ रही हैं, उनमें कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर न होता। इन परिस्थितियों में और कुछ लाभ भले ही होता मनुष्य की वह चेतनात्मक प्रतिभा कुंठित ही रह जाती जिसके कारण प्रगति पथ पर इतना आगे तक चल सकना सम्भव हो सका है।

कर्म का फल शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से कुछ विलम्ब से भी मिल सकता है पर आन्तरिक दृष्टि से तुरन्त तत्काल मिलता है। सद्भावनायें धारण करने वाला अन्तःकरण अपने आप में अत्यधिक प्रफुल्लित रहता है। सुगन्ध विक्रेता बिना प्रयास किये निरन्तर उस महक का लाभ उठाता रहता है जिसके लिये दूसरे लोग तरसते ललचाते रहते हैं। सत्कर्म का सबसे बहुमूल्य लाभ आत्म सन्तोष हैं जिसे प्राप्त करने में तनिक भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सन्मार्ग पर चलने वाले का अन्तरात्मा अपने आप को प्रोत्साहन भरा आशीर्वाद देता रहता है। इस आधार पर बढ़ता हुआ आत्मबल मनुष्य की वास्तविक शक्ति को इतना अधिक बढ़ा देता है जिसकी तुलना उपनिषद्कार की उक्ति के अनुसार हजार हाथियों के बल से भी नहीं की जा सकती।

सद्भाव सम्पन्न सन्मार्गगामी का कोई स्वार्थवश कितना ही विरोधी क्यों न हो पर भीतर ही भीतर उसके लिए गहन श्रद्धा धारण किये रहेगा। महात्मा गांधी पर आक्रमण करने वाले गोडसे ने गोली दागने से पूर्व उनके चरणस्पर्श करके प्रणाम किया था। ईसामसीह को क्रूस पर चढ़ाने वाले लोग आंसुओं की धार से अपनी श्रद्धांजलि चढ़ा रहे थे। सुकरात को विष पिलाने वाले जल्लाद ने आत्म-प्रताड़ना से अपना माथा पीट लिया था।

महामानवों के पास भौतिक सम्पदायें भले ही न रही हों पर उनकी चरित्र निष्ठा, आदर्शवादिता और उदारता की पूंजी इतनी प्रचुर मात्रा में उन्हें विभूतिवान् बनाये रही है और वह वैभव इतना बढ़ा रहा है जिसके ऊपर धन कुबेरों की सम्पन्नता को निछावर किया जा सके। ऋषियों के चरणों में जारकुट रले देखकर यह समझा जा सकता है कि सन्मार्गगामी सर्वथा निर्धन नहीं होते, उनके पास अपने ढंग की ऐसी सम्पदा होती है जिसे पाकर मानव जीवन को सब प्रकार सार्थक एवं धन्य हुआ माना जा सके।

भौतिकविज्ञानियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि शारीरिक स्वास्थ्य का आधार मात्र पौष्टिक आहार एवं व्यायाम नहीं है वरन् मनःक्षेत्र की समस्वरता पर आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की नींव रखी हुई है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय रोगों के विशेषज्ञ यह कहते हैं कि अधिक मानसिक श्रम करने आदि के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं होते वरन् छल, प्रपंच, क्रूर, दुराचरण जैसी दुष्प्रवृत्तियां ही मनः संस्थान में अंतर्संवाद मचाती हैं और उन्हीं के फलस्वरूप अनिद्रा एवं सनक से लेकर उन्माद तक रोग अपने विभिन्न आकार प्रकार से उठ खड़े होते हैं। कोई समय था जब वात-पित्त, कफ, आहार-विहार, कृमि, कीटाणु, छूत संक्रमण, ऋतु प्रभाव, गृहदशा, भाग्य प्रारब्ध आदि को विभिन्न रोगों का कारण माना जाता था। वे बातें पुरानी हो गईं। मनःशास्त्र के विज्ञानी अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अनैतिक, असामाजिक और अवांछनीय चिन्तन से इस प्रकार की घुटन से भरा आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है, जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुंच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति-नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एकमात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञानवेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल कराते हैं, पश्चाताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।

भारतीय धर्मशास्त्र आधि और व्याधि का अन्योन्याश्रय संबंध मानता रहा है। आधि अर्थात् मनःक्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियां जिस व्यक्ति में भरी होगी वह शरीर और मस्तिष्क के रोगों से ग्रसित होता चला जायेगा और वे रोग मात्र औषधि चिकित्सा से कदापि अच्छे न हो सकेंगे। कष्ट साध्य रोगों की एक श्रेणी कर्मजन्य भी होती हैं, उन्हें अन्तःक्षेत्र में जमी हुई दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। इन्हें प्रायश्चित और पश्चाताप द्वारा उखाड़ने का विधान है। असाध्य महारोगों के लिए यह प्रायश्चित चिकित्सा प्राचीन अध्यात्म विज्ञान और भौतिक मनोविज्ञान के आधार पर समान रूप से उपयुक्त मानी गई है। मन की निर्मलता से बढ़कर शारीरिक रोगों की निवृत्ति का और कोई कारगर उपाय नहीं है।

निश्चित रूप से मनुष्य एक स्वसंचालित यन्त्र है जो कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए परिणाम भोगने की श्रृंखला में मजबूती के साथ जकड़ा हुआ है। यदि हम सद्भावनाओं का, सत्प्रवृत्तियों का, चिन्तन और कर्तव्य अपनायें तो सहज ही सुख-शान्ति की परिस्थितियां प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म दुष्कर्म के प्रतिफल हैं।

मनुष्य को जहां इच्छा-पूर्वक भले-बुरे कर्म करने की स्वतन्त्रता मिली है वहां उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने और परिणाम प्रस्तुत करने की स्वसंचालित प्रक्रिया भी साथ ही जोड़ दी गई है। समस्त सृष्टि में यही हो रहा है, बीज जमीन में बोया जाता है, खाद, पानी मिलते ही वह अंकुरित होता है और पौधा वृक्ष बनने लगता है। ईश्वर सर्वत्र समाया हुआ है इसलिए यह कार्य ईश्वर करता है यों कहने में भी हर्ज नहीं है। पर ईश्वर भी इतना झंझट कहां तक सिर पर लादता उसने स्वसंचालित प्रक्रिया बनाकर अपना कर्म फल सम्बन्धी प्रयोजन सरल कर लिया है।

चक्की में ऊपर से अनाज डालते हैं नीचे आटा निकलता जाता है। कोल्हू में ऊपर से सरसों डालते ही तेल टपकता रहता है। मोटर में मीटर लगा रहता है और वह बताता रहता है कि कितने मील चल लिये। यह स्वसंचालित मशीनों का जमाना है। बड़े-बड़े प्रिंटिंग प्रेस घण्टे में हजारों कागज इसी आधार पर छापते हैं। एक बार मशीन चला दी फिर सारा काम अपने आप ये मशीनें करती रहती हैं। इधर कच्चा माल डाला जाता रहता है उधर से तैयार बनकर निकलता रहता है।

कर्म फल की प्रक्रिया भी इसी तरह की है। बुरे कर्म के दुखद परिणाम जिन्हें नरक कहते हैं, निश्चित रूप से मिलते हैं और भले कर्मों का सत्परिणाम जिन्हें स्वर्ग कहा जाता है मिलना भी उतना ही सुनिश्चित है। यह स्वसंचालित ढंग से होता रहता है। शरीर अपने कर्म फल की व्यवस्था स्वयं कर लेता है। बैठे रहिए तोंद बढ़ जायगी और चलना फिरना कठिन—अपच, दिल की धड़कन आदि कितने ही कष्ट कर रोग घेर लेंगे। श्रम करना धर्म है और हरामखोरी पसीना न बहाना अधर्म। शारीरिक पाप किया बैठे रहने का, उसका फल मोटापे के साथ जुड़े हुए कष्टों के रूप में सामने आ गया। अधिक खाया—पेट में दर्द—रात भर जगे—सिर में दर्द, नाश किया बेहोशी, जहर खाया—मौत, स्नान करने में आलस—बदबू, जुएं, खाज। नियमित व्यायाम पहलवान, पथ्य परहेज—निरोगता, यह दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था शरीर अपने आप ही किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना स्वतः ही कर लेता है। कर्म करने की अपनी इच्छा—फल देने की उस स्वसंचालित—ईश्वरीय सत्ता की इच्छा। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। कर्म करलें उसके फल से बचे रहें यह नहीं हो सकता।

आलसी दरिद्री रहते हैं, प्रमादी के लिए प्रगति के द्वार बन्द हो जाते हैं, क्रोधी शत्रुओं से घिर जाता है, धूर्त मित्रों से वंचित हो जाता है, बेईमान के सहयोगी बिछुड़ जाते हैं, उद्दण्ड को घृणा मिलती है, अपव्ययी ऋणी बनता है। यह दण्ड व्यवस्था हर किसी को पग-पग पर अनुभव होती है। श्रेष्ठ गुण, श्रेष्ठ स्वभाव और श्रेष्ठ कर्म करते हुए मनुष्य सम्मानित, यशस्वी, सहयोगी सम्पन्न, समृद्ध सफल बनता है और उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुंचता है। स्वयं सुखी रहता है और दूसरों को सुखी बनाता है। यह कर्म फल की—स्वर्ग नरक प्रक्रिया निरन्तर सामने रहती है। पापी, दुष्ट, दुरात्मा राजदण्ड भुगतते हैं, घृणास्पद बनते हैं और स्नेह सहयोग से वंचित होकर मरघट के प्रेत पिशाच बने एकाकी घूमते हैं। यह घृणित जीवन नरक नहीं है तो और क्या है? सेवा भावी, सद्गुणी, सज्जन धरती के देवता समझे जाते हैं और मरने के बाद भी वन्दनीय, श्रद्धास्पद ही बने रहते हैं, उनकी यश गाथायें अनेकों को प्रेरणा भरा प्रकाश देती रहती हैं। इसे स्वर्ग प्राप्त न करें तो और क्या कहें? सम्मानास्पद, श्रद्धा पात्र सज्जन और प्रामाणिक किसी व्यक्ति को माना जाय इससे बढ़कर सौभाग्य और सन्तोष की बात और क्या हो सकती है। इस प्रकार के कर्म फल प्राप्त करते रहने की—स्वर्ग-नरक जैसी प्रक्रिया हम निरन्तर फलित होती देखते रहते हैं।

कई व्यक्ति दूसरों को धोखा देकर अपनी वस्तु स्थिति छिपा लेने में प्रवीण बन जाते हैं और इस प्रकार पाप कर्म करते हुए दूसरों द्वारा मिलने वाले दण्ड से बच निकलने की तरकीब निकालते हैं। यह चतुरता आजकल बहुत चल पड़ी है। इससे कुछ लाभ तो है पर हानि उससे कहीं अधिक है। लाभ यह है कि सरकार की पकड़ में आने पर राजदण्ड से बच जाते हैं। पाप प्रकट न हो तो दूसरों के द्वारा घृणा निन्दा एवं विलगता से होने वाली हानि बच जाती है। पर इसमें जो छिपाव का ताना-बाना बुनना पड़ता है वह अन्तर्मन में एक विचित्र प्रकार की घुटन पैदा करता है। दुष्कर्म के साथ दुराव मिल जाने से भांग में भी अफीम मिली बन जाती है। अन्तर्मन की बनावट ऐसी है कि वह इस घुटन को पचा नहीं सकती।

नीलाथोथा खा लेने पर उलटी हुए बिना रहती नहीं। जमाल गोटा खा लेने पर दस्त जाना ही पड़ेगा। कच्चा पारा खा लें तो शरीर में से फोले बनकर फूटेगा। यह विष ऐसे हैं जो पच नहीं सकते। पच जायें तो और भी भयंकर प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं और जीवन दुर्लभ कर देते हैं। ठीक इसी प्रकार दुष्कर्म और दुराव मिलकर एक ऐसा विष बनाते हैं जिसे चतुर मनुष्य देर तक छिपाये तो रह सकते हैं पर अन्तर्मन को पचा लेने के लिए रजामंद नहीं कर सकते। सिगरेट का धुंआ पेट में भर लेना तो सम्भव है पर वह वहां रुक नहीं सकता। मुंह बन्द करलें तो नाक में होकर बाहर आयेगा। भीतर किसी भी हालत में रुकेगा नहीं।

हवा भरे गुब्बारे को पानी में जितने जोर से डुबाते हैं अवसर मिलते ही वह उसी वेग से उछल कर ऊपर आ जाता है। छिपे हुए पाप शारीरिक व्याधि और मानसिक ‘आधि’ बनकर समय कुसमय ऐसी बुरी तरह फूटते हैं कि कारण प्रतीत नहीं होता। चिकित्सा उपचार काम नहीं करते।

यह पाप शरीर और मन को कष्ट देने तक ही सीमित नहीं रहते वरन् अन्तरिक्ष में अनेक अदृश्य विपत्तियों का सृजन करते रहते हैं। पत्थर के कोयले की अंगीठी कितने ही व्यक्ति ठण्ड से बचने के लिए कमरे में बन्द करके रख लेते हैं। तत्काल ठण्ड से तो बचत दीखती है पर आकाश में ऐसा विष भर जाता है जिससे सोते-सोते ही उनकी मौत हो जाती है। शरीर में चोट नहीं लगी, बुखार आया नहीं, मस्तिष्क की नस फटी नहीं, सब कुछ ज्यों का त्यों; मौत का कुछ कारण मोटी आंख से दिखाई नहीं पड़ता। पर जानकार जानते हैं कि अंगीठी ने वायु में विष घोल दिया और वही मौत का कारण बना। ऐसे कितने ही अज्ञात अप्रत्यक्ष कारण अनायास ही विपत्ति बनकर सामने आ जाते हैं, जिनका अपने तात्कालिक क्रिया कलाप से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं दीखता। इसी प्रकार कई बार सुविधा सफलतायें भी मिल जाती हैं जिनके लिए उचित श्रम और प्रयत्न नहीं किया गया होता। यह असंगत अवरोध और अनुदान—दैव इच्छा एवं भाग्य का खेल बनकर सामने आते हैं। उनका प्रत्यक्ष कारण नहीं दीखता पर परोक्ष कारण वह स्वसंचालित प्रक्रिया ही होती है जिसने अपने कर्मों का फल अन्तरिक्ष में धीरे-धीरे तदनुरूप वातावरण बनाया और वह भले बुरे अप्रत्याशित अवसर सामने आकर खड़े हो गये।

समय लग सकता है। आज का फल आज मिलने से व्यक्ति भ्रम में पड़ सकता है और यह सोच सकता है कि बुरे कर्म के दण्ड से बच गये या भला कर्म निष्फल चला गया, पर वस्तुतः ऐसा होता कभी नहीं। तुरन्त या कालान्तर में इसका रहस्य अज्ञात होने के कारण प्रत्यक्षवादी, उतावले, अनास्थावान हो उठते हैं पर यदि धैर्य रखा जाय तो प्रतीत होगा कि इसी जन्म में अथवा अगले जन्म में प्रत्येक कर्म का भला बुरा परिणाम मिलना सुनिश्चित है। उसी व्यवस्था क्रम पर तो यह विश्व टिका हुआ है, यदि असंदिग्ध हो जाय तो फिर ऐसा अन्धेर फैले—ऐसी अराजकता उपजे कि कहीं कुछ संभलना—संभालना सम्भव न हो सके। फिर न कोई पाप से डरे और न पुण्य का झंझट और नुकसान उठाये।

दृष्टिकोण अपने आप में चित्त की प्रसन्नता अप्रसन्नता—सन्तोष असन्तोष, शान्ति अशान्ति बनकर पग-पग पर फलित होता रहता है। सत्कर्म करने पर मन में अनायास ही सन्तोष और उल्लास उठता रहता है। किसी कष्ट पीड़ित की सहायता अपना काम हर्ज करके यदि करदी जाय तो भीतर ही भीतर एक परम सात्विक हलका और शीतल मलयज पवन जैसा आनन्द उठता अनुभव होगा। इसके विपरीत यदि चोरी, ठगी, अनीति बरत कर किसी को क्षति पहुंचाई होगी तो भीतर ही भीतर कोई खटमल पिस्सू की तरह काट रहा होगा और आत्म ग्लानि से अन्तःकरण में उद्वेग बढ़ रहा होगा। वस्तुतः यही आत्म सन्तोष और आत्म धिक्कार अन्तःकरण को बलिष्ठ और दुर्बल बनाते हैं और इसी आधार पर प्रगति के अगणित मार्ग खुलते और अवरुद्ध होते हैं। पानी का अन्तरात्मा दिन-दिन दुर्बल होता जाता है। दूसरों पर से ही नहीं अपने पर से भी उसका विश्वास उठ जाता है। आत्मबल खोकर मनुष्य चैन नहीं पा सकता भले ही उसके पास पैसे कौड़ियों के टीले क्यों न जमा हो जायें। आत्म ग्लानि से भरी मनोभूमि को नरक कहा जा सकता है क्योंकि प्रकारान्तर से अनेक दुश्चिन्तायें आशंकायें, विभीषिकायें इतना सताती हैं कि उसकी तुलना में नरक वर्णित कष्टों की तुलना सहज ही की जा सके।

जो हर युवती को अपनी पुत्र की तरह देख सके—पराये पैसे को ठीकरी जैसा समझे, अपने स्वल्प उपार्जन से सादगी का जीवन जीते हुए सन्तुष्ट रहे, चरित्र उज्ज्वल रखे और दूसरों के प्रति स्नेह सहयोग भरा दृष्टिकोण रखे—उसे निरन्तर अपने भीतर एक अमृत जैसी निर्झरी कल-कल ध्वनि से प्रवाहित होती हुई अनुभव होगी और लगेगा कि भावना क्षेत्र में स्वर्गीय सुषुमा ही प्रादुर्भूत हो रही है।

मरने के बाद भी भले-बुरे कर्मों के दण्ड कितने ही प्रकार से मिलते होंगे। दो जन्मों के बीच सुखद और कष्टकर स्थिति रहती होगी, अगले जन्म उत्कृष्ट या निकृष्ट मिलते होंगे। स्वर्ग-नरक का स्थान भाव नगर की सही—प्रतिफल की व्यवस्था मरणोत्तर जीवन में भी रहती होगी। पर इस जन्म में तत्काल भी भले-बुरे परिणाम मिलते रहते हैं और स्वर्ग-नरक की स्वसंचालित प्रक्रिया भी हमें नियन्त्रण में रहने और विवेक पूर्ण रीति-नीति अपनाने के लिए बाध्य करती रहती है।
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