प्रायश्चित्त पूर्वक भूल सुधारें
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यह युग परिवर्तन का अति महत्त्वपूर्ण समय है। इस समय युग परिवर्तन के क्रम में ईश्वर से साझेदारी करने वालों को उदारतापूर्वक- मुक्त हस्त से दिव्य अनुदान बाँटे जा रहे हैं। साझेदारी नारे लगाने से नहीं, अनुबंध- अनुशासन निभाने से मिलती है और फलित होती है।
हमारी गुरुसत्ता ने हमें दीक्षा देकर दक्षिणा में साझेदारी के अनुबंध निभाने के नियम ही माँगे हैं। जो उन्हें भूल रहे हैं या उनका दिखावा मात्र कर रहे हैं, वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। मिले हुए सौभाग्य को नकार कर अनेक जन्मों के लिए पश्चात्ताप की अग्नि में जलते रहने के नारकीय कष्ट को न्योता दे रहे हैं।
इससे बचना है और सौभाग्य पाना है, तो दक्षिणा के नियम टूटने का प्रायश्चित्त करते हुए अनुबंधों को नये सिरे से साधना चाहिए। इसके लिए दीक्षा व्रतभंग प्रायश्चित्त का क्रम अपनाना चाहिए।
यह करें :: --
(१) युगऋषि द्वारा निर्धारित दीक्षा की दक्षिणा के नियमों को भली प्रकार समझें- हृदयंगम करें।
(२) अपनी स्वस्थ समीक्षा करें। क्या दीक्षा के समय हमने उक्त अनुशासनों को ठीक से समझा या यूँ ही दीक्षा का कर्मकाण्ड पूरा कर लिया। अथवा उस समय समझबूझ कर किए गये संकल्पों को कितना निभाया?
(३) चूक जहाँ भी हुई हो, ठीक करें। उन्हें एक कागज़ पर स्पष्ट बड़े अक्षरों में लिखकर अपनी उपासना स्थली पर रखें।
(४) प्रायश्चित्त स्वरूप १००० गायत्री मंत्र जप करके दीक्षा का नवीनीकरण करें। निर्धारित नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करें। उपासना के समय उन्हें रोज दोहरायें। प्रार्थना करें कि हे प्रभु! यह नियम न टूटे, हमारा परस्पर का पवित्र संबंध न टूटे।
अपनी दीक्षा को प्राणवान, प्रभावी बनाने के लिए परिजन एक- दूसरे को प्रेरणा दें। खुले दिल से भूल स्वीकार करने तथा साहस पूर्वक उसे ठीक करने का व्रत लें। दीक्षा व्रतभंग प्रायश्चित करने कराने का क्रम व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से तुरंत प्रारंभ करें। परिजन एवं कार्यकर्ता कहलाने वाले प्रत्येक परिजन को इससे जोड़ें। विभिन्न गोष्ठियों या कार्यकर्ता गोष्ठियों, सम्मेलनों में इसे प्रभावशाली ढंग से करने- कराने का क्रम अपनाएँ। करोड़ों नर- नारी युगऋषि से दीक्षा ले चुके हैं। उन्हें दीक्षा अनुबंधों में प्रामाणिक ढंग से लाने का क्रम तत्परता से बरता जाय, तो कमाल हो जाय। न कहीं समयदानी- सहयोगियों की कमी रह जाये, न संसाधनों की। परिजनों के व्यक्तित्व गुरुसत्ता की दृष्टि में प्रामाणिक बनते ही, उज्ज्वल भविष्य की दिव्य धाराएँ उनके माध्यम से धरती पर उतरने लगेंगी। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का क्रम प्रचण्ड हो उठेगा। उठें, जागें और इष्ट ध्येय तक रुकें नहीं। शिष्यत्व की प्रामाणिकता पर टिकते है गुरुसत्ता के विशेष अनुदान .
हमारी गुरुसत्ता ने हमें दीक्षा देकर दक्षिणा में साझेदारी के अनुबंध निभाने के नियम ही माँगे हैं। जो उन्हें भूल रहे हैं या उनका दिखावा मात्र कर रहे हैं, वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। मिले हुए सौभाग्य को नकार कर अनेक जन्मों के लिए पश्चात्ताप की अग्नि में जलते रहने के नारकीय कष्ट को न्योता दे रहे हैं।
इससे बचना है और सौभाग्य पाना है, तो दक्षिणा के नियम टूटने का प्रायश्चित्त करते हुए अनुबंधों को नये सिरे से साधना चाहिए। इसके लिए दीक्षा व्रतभंग प्रायश्चित्त का क्रम अपनाना चाहिए।
यह करें :: --
(१) युगऋषि द्वारा निर्धारित दीक्षा की दक्षिणा के नियमों को भली प्रकार समझें- हृदयंगम करें।
(२) अपनी स्वस्थ समीक्षा करें। क्या दीक्षा के समय हमने उक्त अनुशासनों को ठीक से समझा या यूँ ही दीक्षा का कर्मकाण्ड पूरा कर लिया। अथवा उस समय समझबूझ कर किए गये संकल्पों को कितना निभाया?
(३) चूक जहाँ भी हुई हो, ठीक करें। उन्हें एक कागज़ पर स्पष्ट बड़े अक्षरों में लिखकर अपनी उपासना स्थली पर रखें।
(४) प्रायश्चित्त स्वरूप १००० गायत्री मंत्र जप करके दीक्षा का नवीनीकरण करें। निर्धारित नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करें। उपासना के समय उन्हें रोज दोहरायें। प्रार्थना करें कि हे प्रभु! यह नियम न टूटे, हमारा परस्पर का पवित्र संबंध न टूटे।
अपनी दीक्षा को प्राणवान, प्रभावी बनाने के लिए परिजन एक- दूसरे को प्रेरणा दें। खुले दिल से भूल स्वीकार करने तथा साहस पूर्वक उसे ठीक करने का व्रत लें। दीक्षा व्रतभंग प्रायश्चित करने कराने का क्रम व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से तुरंत प्रारंभ करें। परिजन एवं कार्यकर्ता कहलाने वाले प्रत्येक परिजन को इससे जोड़ें। विभिन्न गोष्ठियों या कार्यकर्ता गोष्ठियों, सम्मेलनों में इसे प्रभावशाली ढंग से करने- कराने का क्रम अपनाएँ। करोड़ों नर- नारी युगऋषि से दीक्षा ले चुके हैं। उन्हें दीक्षा अनुबंधों में प्रामाणिक ढंग से लाने का क्रम तत्परता से बरता जाय, तो कमाल हो जाय। न कहीं समयदानी- सहयोगियों की कमी रह जाये, न संसाधनों की। परिजनों के व्यक्तित्व गुरुसत्ता की दृष्टि में प्रामाणिक बनते ही, उज्ज्वल भविष्य की दिव्य धाराएँ उनके माध्यम से धरती पर उतरने लगेंगी। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का क्रम प्रचण्ड हो उठेगा। उठें, जागें और इष्ट ध्येय तक रुकें नहीं। शिष्यत्व की प्रामाणिकता पर टिकते है गुरुसत्ता के विशेष अनुदान .

