गुरु का स्तर
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गायत्री महाविज्ञान (तीसरे खण्ड) में युगऋषि ने यह तथ्य स्पष्ट किया है कि गायत्री महामंत्र की दीक्षा का अधिकार उसी को है, जिसने अपनी जीवन साधना से कीलित गायत्री विद्या का उत्कीलन किया हो। सबको पता है कि गायत्री साधना को ब्रह्मा, वशिष्ठ एवं विश्वामित्र ने शापित किया था। शाप और उसके उत्कीलन का मर्म स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं -
इस कथन में एक भारी रहस्य छिपा हुआ है, जिसे न जानने वाले केवल ‘शापमुक्तो भव’ वाले मंत्र को पढ़ लेने मात्र से यह मान लेते हैं कि हमारी साधना शापमुक्त हो गयी। ... विश्वामित्र का अर्थ है संसार का मित्र, लोकसेवी- परोपकारी। वशिष्ठ का अर्थ है विशेष रूप से श्रेष्ठ तथा ब्रह्मा का अर्थ है ब्रह्म परायण सृजन क्षमता सम्पन्न। इन तीनों गुणों वाले पथ प्रदर्शक के आदेशानुसार होने वाले आध्यात्मिक प्रयत्न ही सफल एवं कल्याणकारी हो सकते हैं।
हम सब परम भाग्यशाली हैं कि हमें इन तीनों विशेषताओं से युक्त मार्गदर्शक- गुरु प्राप्त हुए। इसके अलावा गुरु की सामर्थ्य के बारे में और दीक्षा देते समय वे जो तथ्य प्रकट करते रहे हैं, उन्हें भी सदैव ध्यान में रखना जरूरी है। गुरु की सामर्थ्य एवं भूमिका पर प्रकाश डालते हुए वे कहते रहे हैं --
दीक्षा देने वाले गुरु में यह क्षमताएँ होनी चाहिए कि वे प्रत्येक दीक्षित साधक को उसकी प्रामाणिकता प्रखरता एवं आवश्यकता के अनुसार (१) अपने प्राण, (२) तप एवं (३) पुण्य का एक अंश प्रदान कर सके। इसी के साथ उन्हें उपयुक्त (४) मार्गदर्शन एवं (५) शक्ति- अनुदान भी देते रह सकें। उक्त जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम व्यक्ति ही गुरुदीक्षा देने के अधिकारी होते हैं।
इस कथन में एक भारी रहस्य छिपा हुआ है, जिसे न जानने वाले केवल ‘शापमुक्तो भव’ वाले मंत्र को पढ़ लेने मात्र से यह मान लेते हैं कि हमारी साधना शापमुक्त हो गयी। ... विश्वामित्र का अर्थ है संसार का मित्र, लोकसेवी- परोपकारी। वशिष्ठ का अर्थ है विशेष रूप से श्रेष्ठ तथा ब्रह्मा का अर्थ है ब्रह्म परायण सृजन क्षमता सम्पन्न। इन तीनों गुणों वाले पथ प्रदर्शक के आदेशानुसार होने वाले आध्यात्मिक प्रयत्न ही सफल एवं कल्याणकारी हो सकते हैं।
हम सब परम भाग्यशाली हैं कि हमें इन तीनों विशेषताओं से युक्त मार्गदर्शक- गुरु प्राप्त हुए। इसके अलावा गुरु की सामर्थ्य के बारे में और दीक्षा देते समय वे जो तथ्य प्रकट करते रहे हैं, उन्हें भी सदैव ध्यान में रखना जरूरी है। गुरु की सामर्थ्य एवं भूमिका पर प्रकाश डालते हुए वे कहते रहे हैं --
दीक्षा देने वाले गुरु में यह क्षमताएँ होनी चाहिए कि वे प्रत्येक दीक्षित साधक को उसकी प्रामाणिकता प्रखरता एवं आवश्यकता के अनुसार (१) अपने प्राण, (२) तप एवं (३) पुण्य का एक अंश प्रदान कर सके। इसी के साथ उन्हें उपयुक्त (४) मार्गदर्शन एवं (५) शक्ति- अनुदान भी देते रह सकें। उक्त जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम व्यक्ति ही गुरुदीक्षा देने के अधिकारी होते हैं।

