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Friday 03, January 2025

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सभी में गुरु ही है समाया | Sabhi Mei Guru Hi Hai Samaya

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योग्यता और श्रमशीलता का महत्व : आजीविका के स्रोत देहात में खोजे | Yogyata Aur Shramshilta Ka Mehtav

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समस्या को अवसर में बदलें | Samasya Ko Avsar Me Badlein

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*हे प्रभु अपनी कृपा की छाह में ले लीजिये,* *कर दूर खोटी बुद्धि सबको, नेक नियत कर दीजिये  |* *हे प्रभु अपनी कृपा की छाह में ले लीजिये

*हे प्रभु अपनी कृपा की छाह में ले लीजिये,* *कर दूर खोटी बुद्धि सबको, नेक नियत कर दीजिये |* *हे प्रभु अपनी कृपा की छाह में ले लीजिये

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शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य नाश के यह प्रधान हेतु हैं जो लोग तन्दुरूस्ती पर अधिक ध्यान देते हैं, स्वास्थ्य के नियमों का ठीक तरह पालन करते हैं, वे मजबूत और निरोग बने रहते हैं। यूरोप अमेरिका के निवासियों के शरीर कितने स्वस्थ एवं सुदृढ़ होते हैं। हमारी तरह वे भाग्य का रोना नहीं रोते, वरन्ï आहार-विहार के नियमों का सख्ती के साथ पालन करते हैं, बुद्धि ओर विवेक का उपयोग निरोगता के लिए करते हैं, जिससे वे न तो बहुत जल्द बीमार पड़ते हैं, न दुर्बल होते हैं और न अल्पायु में मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।*

*मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है। किन्तु खेद है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकार-ग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ और आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रहता है। स्थिरता, प्रसन्नता और सदाशयता का कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होता। ईर्ष्या, द्वेष और रोष, क्रोध की नष्टïकारी चिताएँ जलती और जलाती ही रहती हैं। लोग मानसिक विकारों, आवेगो और असद्विचारों से अर्ध विक्षिप्त से बने घूम रहे हैं। यदि इस प्रचंड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मन:शांति का महत्त्व समझने और नि:स्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते चलें, तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ सकते हैं।

*भोगवाद की बढ़ती अतृप्त लालसा ने जन मानस को विशृंखलित बना दिया है। विकसित एवं विकासशील देशों में आये दिन होने वाली आत्महत्याओं और विभिन्न अपराधों में वृद्धि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आत्महत्या में अमेरिका व कनाडा का पहला स्थान है जबकि जापान दूसरे नम्बर पर है। विश्लेषण करने वाले कई प्रकार से इसका विवेचन कर सकते हैं, किन्तु यह सुनिश्चित है कि भोगवादी जीवन अध्यात्मवाद से परे होने के कारण कई प्रकार के संत्रास, विक्षोभ, तनाव एवं कष्ट सभी के लिए लाया है। आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं, किन्तु विशेष कारणों में निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।*

*कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति संपन्न देश में निराशा का क्या कारण? क्या कारण है कि इन्हीं देशों में आत्महत्या करने के एक सौ पचास उपाय बातने वाली  ‘फाइनल एक्जीट’ नामक पुस्तक सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तक है। स्पष्ट है कि भोगवाद का अंत निराश में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं, जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिए किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। पर मुसीबत यह कि उनके आसपास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक इष्र्यालु, चिंतित तथा उपेक्षित बनाकर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।*
 
भोगवाद, पूँजीवाद व साम्यवाद की मृगमरीचिका के टूटने के बाद अब अध्यात्मवाद ही एक मात्र मार्ग रह गया है, जो जन-जन के मनों को शांति दे सकता है। अध्यात्मवाद जीवन जीना सिखाता है। भोग करते हुए कैसे त्याग वाला जीवन जियें, इसके सूत्र हमें देता है। अच्छा हो हम समय रहते सँभलें, पाश्चात्य सभ्यता के आक्रमण से स्वयं को बचायें व अपनी संस्कृति के मूल तत्त्व अध्यात्म को जीवंत बनाए रखें।*
  
*आज की सारी समस्याओं का एक सामान्य हल है अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये और अपना दृष्टिकोण सर्वथा आध्यात्मिक बना लिया जाये, तो सारी समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे।*

पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

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 आध्यात्मिक उन्नति में बाधक हमारे पुराने कर्म।

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ध्यान:- आती-जाती श्वास का ध्यान | Aati-Jaati Shwans Ka Dhyan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 03 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



आप चाहे कम योग्यता के हो कम शक्ति के हो  कम उसके हो लेकिन अपना समय निकाल डालिए समय हमको दे डालिए आप के समय को हम यकीन दिलाते हैं जितना आपका समय जाएगा वह बेकार नहीं जाएगा आप के समय को हम बर्बाद नहीं होने देंगे जो आपके पैसे इस काम में खर्च होंगे यकीन आप लेकर जाइए कि हम आपके पैसों को बर्बाद नहीं होने देंगे आप गरीब नहीं हो जाएंगे हम गरीब नहीं होंगे आप कैसे गरीब हो जाएंगे हमारे बच्चे हैं तो हम स्वयं देख कर के समाज के लिए और भगवान के लिए और देश के लिए हमारे ऊपर कोई कठिनाइयां और कोई मुसीबतें नी आई हैं आपके ऊपर कैसे आ जाएगी इसलिए यहां से यकीन लेकर के जाइए यह हमारी प्रार्थना सुनते हुए जाइए हमारे दिल का दर्द को आप अनुभव करते जाइए अगर आप ऐसा अनुभव करके गए और  हमको कुछ सहायता करने में आप समर्थ हो सके तो हम आपके कृतज्ञ रहेंगे हमेशा और यह समझेंगे कि आप हमारी कुटुंबी हैं आप हमारे खानदान वाले हैं आप हमारे मित्र हैं आप हमारे प्रिय हैं |

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



सामान्यतया हर प्रज्ञा परिजन को युग सन्धि की बेला में अपनी उपासना को नैष्ठिक, नियमित एवं समग्र बना लेना चाहिए। तीन माला का जप, गुरुवार को जिस स्तर का बन पड़े उपवास, ब्रह्मचर्य, महीने में एक बार अग्निहोत्र का न्यूनतम साधना क्रम तो चलाना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त अपने भावना क्षेत्र को उत्कृष्टताओं के समुच्चय परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।

भावना, विचारणा और क्रिया- प्रक्रिया में जितनी अधिक उत्कृष्टता आदर्शवादिता का समावेश सम्भव हो सके, उसके लिए उपाय खोजने और प्रयत्न करने में सतत संलग्न रहना चाहिए। भजन कृत्य और तादात्म्य की उभय पक्षीय प्रक्रिया उपासना को समग्र बनाती है और अपना प्रत्यक्ष प्रतिफल हाथों हाथ प्रस्तुत करती है।

युग सन्धि के अगले दिन सृजन और विनाश की सम्भावनाओं से भरे पड़े हैं। ऐसी परिस्थितियों में उपासना विधान की अपनी महत्ता है। नैष्ठिक साधना एवं प्रज्ञा पुरश्चरण इसी निमित्त आरम्भ किए गए प्रारम्भिक उपचार हैं। लेकिन यहीं तक सीमित होकर किसी को नहीं रहना है। जो भी उपासना के माध्यम से आत्मशक्ति अभिवर्द्धन की बात सोचते हैं, उन्हें अपने निजी जीवन का कायाकल्प तो करना ही है। अपने परिकर क्षेत्र को भी उसी रंग में रंगना है। इससे व्यक्तित्व में और निखार आएगा, वह पुण्य लाभ तो मिलेगा ही, जो महाकाल की योजना में भागीदार बनने से किसी को भी मिल सकता है।

इस कार्य के लिए यदि कल्प साधना में सम्मिलित होकर प्रारम्भिक स्थिति जान ली जाय एवं उसमें जो परिशोधन संभावित हो उसे मार्गदर्शकों द्वारा जानकर प्रायश्चित विधान द्वारा अपने अन्तः को परिष्कृत कर लिया जाय तो यह और भी अच्छा है। साधना से ही वह स्थिति बनती है कि मनुष्य परमात्म सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है। बिना साधना के, तप- तितिक्षा के उपासना सम्भव नहीं। साधना कड़ा संयम, आहार की तितिक्षा अपनाकर ही सम्भव है।

जो इस प्रारम्भिक सोपान को पूरा कर लेता है। उसके लिए साधना मार्ग में आगे और फिर कोई अवरोध आड़े नहीं आता। साधना उपासना के बाद आराधना पुण्य परमार्थ की बात आती है। ईश्वरीय गुणों से सम्पन्न साधक बिना परमार्थ के रह नहीं सकता। लोक कल्याण, आराधना, परमार्थ परायणता ये सभी उपासना के उत्तरार्द्ध माने जा सकते हैं। जिसने स्वयं को अनुशासन के शिकंजे में कस लिया, दैवी प्रयोजन में सहभागी बनने योग्य स्वयं को बना लिया वह ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ऐसे व्यक्ति ही व्यक्तित्व सम्पन्न बनते, लोक सम्मान व दैवी अनुग्रह पाते हैं।

उपासना अपने समग्र रूप में ही सही कही जा सकती है। साधना, तप, आराधना उसके आवश्यक अंग माने जा सकते हैं। आत्मिक प्रगति का यह अवलम्बन मनुष्य को परमात्म सत्ता के साथ जोड़ देता है, समकक्ष बना देता है। यह कथन सत्य है। परन्तु शर्त मात्र यही है कि उसे सही रूप में अपनाया गया हो, चिन्ह पूजा की लकीर भर न पीटी गयी हो।

..... समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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