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Thursday 09, January 2025

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POST

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 13 जनवरी 2025 से प्रारंभ हो रहे विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजन महाकुंभ में गायत्री परिवार द्वारा शिविर 13 जनवरी से प्रारंभ होकर 26 फरवरी 2025 तक रहेगा। महाकुम्भ क्षेत्र में सेक्टर 10 में गदा माधव मार्ग पर गायत्री परिवार का शिविर लगाया गया है। शिविर में मिशन से जुड़ी अनेक गतिविधियां लगातार 45 दिनों तक संचालित रहेंगी। अनेक जनपदों से गायत्री परिजनों को समयदान के लिए आमंत्रित किया गया है। गायत्री परिवार शिविर में प्रतिदिन सुबह 9 बजे से 12 बजे तक 51 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ किया जाएगा। सायं कालीन प्रतिदिन प्रज्ञा पुराण कथा का आयोजन होगा।

देव संस्कृति दिग्दर्शन की प्रदर्शनी भी शिविर में देखने को मिलेगी साथ ही मिशन का व्यसन मुक्ति अभियान व निर्मल गंगा जन अभियान, पर्यावरण संरक्षण को वृहद रूप से मेला क्षेत्र में जन जन तक पहुंचाया जाएगा।

शिविर में मिशन के साहित्यों का पुस्तक मेला भी लगाया जाएगा। शिविर में आदरणीय डॉ चिन्मय पांड्या जी का आगमन भी 26 जनवरी की शाम को होना प्रस्तावित है तदोपरांत 27 जनवरी को सुबह नव निर्मित गायत्री चेतना केंद्र शिवकुटी प्रयागराज में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में भी प्रमुख रूप से रहेंगे।

 

देश भर सभी गायत्री परिजनों को आमंत्रित किया जा रहा है कि आप इस आध्यात्मिक आयोजन में आवश्य प्रतिभाग करें और शिविर में भी जरूर पधारें आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

शिविर की प्रमुख विशेषताएं -

● विराट पुस्तक मेला
● देव संस्कृति दिग्दर्शन प्रदर्शनी
● 51 कुण्डीय यज्ञ एवं संस्कार (सुबह 9 से 12)
● निशुल्क संस्कार शाला का आयोजन
● प्रज्ञा पुराण कथा (सायं 3 से 6)
● व्यसन मुक्त भारत का महाअभियान
● निर्मल गंगा एवं पर्यावरण संरक्षण का महाअभियान
● समयदानी परिजनों की आवासीय व्यवस्था

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Bhagwan Buddha

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मनुष्य पूर्ण मनुष्य बनो, Manushya Purna Manushya Bano

मनुष्य पूर्ण मनुष्य बनो, Manushya Purna Manushya Bano

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साहित्य की आज कहीं कमी है? जितनी पत्र-पत्रिकाएं आज प्रकाशित होती हैं, जितना साहित्य नित्य विश्व भर में छपता है उस पहाड़ के समान सामग्री को देखते हुए लगता है, वास्तव में मनीषी बढ़े हैं, पढ़ने वाले भी बढ़े हैं। लेकिन इन सबका प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? क्यों एक लेखक की कलम कुत्सा भड़काने में ही निरत रहती है एवं क्यों उस साहित्य को पढ़कर तुष्टि पाने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है, इसके कारण ढूंढ़े जायें तो वहीं आना होगा, जहाँ कहा गया था- “पावनानि न भवन्ति”। यदि इतनी मात्रा में उच्चस्तरीय, चिन्तन को उत्कृष्ट बनाने वाला साहित्य रचा गया होता एवं उसकी भूख बढ़ाने का माद्दा जन-समुदाय के मन में पैदा किया गया होता तो क्या ये विकृतियाँ नजर आतीं जो आज समाज में विद्यमान है। दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का समाधान यदि सम्भव हो सकता है तो वह युग-मनीषा के हाथों ही होगा।

जैसा कि हम पूर्व में भी कह चूके हैं कि नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं विचारों की काट द्वारा होगी, समाज का नव-निर्माण होगा तो वह सद्-विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा। अभी तक जितनी मलिनता समाज में प्रविष्ट हुई है, वह बुद्धिमानों के माध्यम से ही हुई है। द्वेष-कलह, नस्लवाद-जातिवाद, व्यापक नर-संहार जैसे कार्यों में बुद्धिमानों ने ही अग्रणी भूमिका निभाई है। यदि वे सन्मार्गगामी होते, उनके अन्तःकरण पवित्र होते, तप, ऊर्जा का सम्बल उन्हें मिला होता तो उन्होंने विधेयात्मक चिन्तन प्रवाह को जन्म दिया होता, सत्साहित्य रचा होता, ऐसे आन्दोलन चलाए होते।

परिस्थितियाँ आज भी विषम हैं। वैभव और विनाश के झूले में झूल रही मानव जाति को उबारने के लिये आस्थाओं के मर्मस्थल तक पहुँचना होगा और मानवी गरिमा को उभारने, दूरदर्शी विवेकशीलता को जगाने वाला प्रचण्ड पुरुषार्थ करना होगा। साधन इस कार्य में कोई योगदान दे सकते हैं, यह सोचना भ्रांतिपूर्ण है। दुर्बल आस्था अन्तराल को तत्त्वदर्शन और साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रान्तियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है।

अध्यात्म ही व्यक्ति के अन्तराल में विकृतियों के माहौल से लड़ सकने- निरस्त कर पाने में सक्षम तत्वों की प्रतिष्ठापना कर पाता है। हमने व्यक्तियों में पवित्रता व प्रखरता का समावेश करने के लिए मनीषा को ही अपना माध्यम बनाया एवं उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1984 पृष्ठ 20-21

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जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन | Jaisa Khaye Ann Wasia Bane Man |

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गायत्री की गरिमा भारी सत्य सनातन मंगल कारी |

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सद्गुरु प्रेम और दिव्य अनुभूतियाँ : देकर भी करता मन, दे दें कुछ और अभी |

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आज के समय की विभीषिकाए | Aaj Ke Samay Ki Vibhishikayen

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आरती श्री सद्गुरु चरणन | Aarti Shri Guru Charnan Ki |

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सृष्टि के रूप में भगवान का दर्शन | Sristi Ke Roop Mei Bhagwan Ke Darshan

सृष्टि के रूप में भगवान का दर्शन | Sristi Ke Roop Mei Bhagwan Ke Darshan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 09 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! अखण्ड दीपक Akhand Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) एवं चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 09 January 2025 !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 09 January 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मैं चाहता हूँ कि आपका आप कुटुंबी होकर के जिएँ; परिवार होकर के जिएँ; ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की मान्यता से ओत-प्रोत रहें और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का सिद्धांत लागू करने के लिए दर्शनशास्त्रों का अध्ययन करने के साथ-साथ आप ये भी करें इस थ्योरी को प्रैक्टिस में लाएँ और जैसे कि हमारे कुटुंब के रूप में हमको भगवान ने दी है। ये क्या है कुटुंब? इसमें आप बहुत बड़े-बड़े काम कर सकते हैं। आप अपने आपको लोक-व्यवहार के बारे में जानकार बना सकते हैं। बच्चों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो, बड़ों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो, बराबर वालों के साथ आपका व्यवहार कैसा हो? मिल-बाँट के खाने में कैसा आनंद आता है? इसे आप समझें और एकदूसरे के दुःख और दर्द, सुख और सुविधाएँ बँटा लेने से कितना ज्यादा आदमी सुखी और समुन्नत रह सकता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव करना सीखें। ये सारी बातें कुटुंब में ही संभव है।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



सदाचार-श्रेष्ठ आचरण-अच्छा चालन चलन, यह मानव जीवन का बहुमूल्य खजाना है। सृष्टि के आदि काल से ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक यह बात स्वीकार होती आई है कि मनुष्य का गौरव इसमें हैं कि उसका आचरण श्रेष्ठ हो। भलाई, नेकी, उदारता, सेवा, सहायता, सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय वाला व्यक्ति सदाचारी कहा जाता है, उसके बाह्य आचरण ऐसे होते हैं, जो दूसरों को स्थूल या सूक्ष्म रीति से निरन्तर लाभ ही पहुँचाते रहते हैं। वह एक भी कार्य ऐसा नहीं करता, जिससे उसकी आत्मा को लज्जित होना पड़े, पश्चाताप करना पड़े या समाज के सामने आँखें नीची झुकानी पड़ें।

मनुष्य चाहे जितना विद्वान् चतुर धनवान, स्वरूप वान, यशस्वी तथा उच्च आसन पर आसीन हो, परन्तु यदि उसका व्यवहार उत्तम नहीं तो वह सब व्यर्थ है, धूलि के बराबर है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा है, उस पर मीठे फल भी लगते हैं पर उससे दूसरों को क्या लाभ या धूप में तपा हुआ पथिक न तो उसकी छाया में शान्ति लाभ कर सकता है और न भूख से व्याकुल को उसका एक फल प्राप्त हो सकता है। जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह किसी की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति में जरा भी बाधा पहुँचाने वाला कार्य न करेगा वरन् उससे सहायता ही देगा।

आप अपने आचरणों को ऐसा रखिये, जिससे आपके माता पिता की कीर्ति में वृद्धि हो। आपको अपना मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें। छोटे लोग आपका उदाहरण सामने रख कर अपने आचरण को उसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें। स्मरण रखिए, सदाचार मानव जीवन का महान धन है। जो सदाचारी है, असल में वही सच्चा धनी है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 14

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व्यक्तित्व का विकास

(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य कामकाजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।
    
(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।
    
(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविध सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।
 

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।
   
कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकाँक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटाएँ पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्त्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।

.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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