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Saturday 11, January 2025

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जागृत परिजनों को उच्च स्वर से समय ने पुकारा है। अरुणोदय ने जागृति का सन्देश भेजा है। ऊषा की अग्रिम किरणें करवटें बदलते रहने से विरत होकर अँगड़ाई लेने और उठ खड़े होने की चुनौती प्रस्तुत कर रही है। इस पुण्य बेला में असामान्यों को सामान्यों की तरह समय नहीं गुजारना चाहिए। महानता सम्पन्न आत्माओं को तुच्छताग्रस्त प्राणियों जैसी गतिविधि नहीं अपनाये रहनी चाहिए।

नवयुग की चेतना घर−घर पहुँचाने और जन−जन को जागृति का सन्देश सुनाने का ठीक यही समय है। इन दिनों हमारा भूमिका युग दूतों जैसी होनी चाहिए। इन दिनों हमारे प्रयास संस्कृति का सेतु बाँधने वाले नल−नील जैसे होने चाहिए। खाई कूदने वाले अंगद की तरह−पर्वत उठाने वाले हनुमान की तरह−यदि पुरुषार्थ न जगे तो भी गिद्ध गिलहरी की तरह अपने तुच्छ को महान के सम्मुख समर्पित कर सकना तो सम्भव हो ही सकता है। गोवर्धन उठाते समय यदि हमारी लाठी भी सहयोग के लिए न उठी तो भी सृष्टा का प्रयोजन पूर्णता तक रुकेगा नहीं। पश्चात्ताप का घाटा हमें भी सहना पड़ेगा।

साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में अपनी भागीरथी भूमिका आवश्यक हो गई हैं। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा।

विनाश की शक्तियाँ प्रबल होती हैं या सृजन अधिक शक्तिशाली होती हैं? यह प्रश्न वाणी से नहीं व्यवहार से- उत्तर से नहीं, उदाहरण से- अपना समाधान माँगता है। यह देवत्व की प्रतिष्ठा का सवाल है। हमें सृजन की समर्थता सिद्ध करनी होगी, ताकि संव्याप्त निराशा में आशा का आलेग उग सके। कोई आगे नहीं चलेगा तो पीछे वालों का साहस कैसे जगेगा? व्यवसायी की बुद्धि लेकर नहीं, शूरवीरों की साहसिकता को अपनाकर ही हमें वह करने का अवसर मिलेगा, जो अभीष्ट आवश्यक, उपयुक्त ही नहीं विशिष्ट आत्माओं के प्रस्तुत अवतरण का लक्ष्य भी हैं।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1978 पृष्ठ 60

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प्रतिकूल परिस्थिति में विचलित न हो, Pratikul Paristhiti Me Vichlit Na Ho

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शालीनता बिना मोल मिलती है, परन्तु उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।

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स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर कोटि कोटि नमन |

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ईमानदारी से कमाए गये धन का महत्व: साधन संपदा का सदुपयोग करें

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तिभावान युवाओं की युग निर्माण में भागीदारी Yuvaon Ki Yug Nirnaam Me Bhagidari

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समय के प्रति लापरवाही न करें। Samay Ke Prati Laparvahi Na Kare

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Ep:- 21/21 विभूतियों का आह्वान | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 11 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



अगर अपने घर का संस्कारी वातावरण बना लें; सब लोगों को आरंभ से अंत तक शिष्टाचार और दूसरी मर्यादाओं को पालन करने के लिए शिक्षित करते रहें, तो आप विश्वास रखिए, आपके घर के लोग स्वावलंबी बन सकते हैं; सुसंस्कारी बन सकते हैं। स्वावलंबी बनना और सुसंस्कारी बनना बहुत कुछ इस बात के ऊपर निर्भर रहता है। घर का वातावरण कैसा है, ये स्कूलों में नहीं सिखाया जा सकता। इसको कोई आदमी कथा और उपदेशों के द्वारा किसी के गले नहीं उतार सकता। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि समूचे कुटुंब का एक खास तरह का वातावरण बनाया जाए और वह वातावरण जैसा बनाया गया है, उसमें हर आदमी को ढाला जाए। वातावरण ढालता है आदमी को, आप यकीन रखिए। वातावरण ढालता है। एक आदमी के उपदेश करने से कहाँ काम चलता है? कोई-कोई समर्थ आदमी ऐसे हुए भी होंगे, जिनके उपदेश का किसी ने एक दस-पाँच मिनट में कोई लाभ उठा लिया होगा। नारद जी जैसे आदमी। पर हर आदमी ऐसे कहाँ होते हैं? आदमी को ढालने के लिए वातावरण की जरूरत है।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य  

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अखण्ड-ज्योति से



यों सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र हैं, पर जिनमें विशेष विभूतियाँ चमकती हैं उन्हें ईश्वर के विशेष अंश की सम्पदा से सम्पन्न समझा जाना चाहिए। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान कृष्ण ने विशिष्ट विभूतियों में अपना विशेष अंश होने की बात उदाहरणों समेत बताई है। यों जीवनयापन तो अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी करते हैं, पर जिनके पास विशेष शक्तियाँ, विभूतियाँ हैं, कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य वे ही कर पाते हैं। इसलिए भावनात्मक नव निर्माण जैसे युगान्तरकारी अभियानों में उनका विशेष हाथ रहना आवश्यक है।

विभूतियों को सात भागों में विभक्त कर सकते हैं। (१) भावना (२) शिक्षा-साहित्य (३) कला (४) सत्ता (५) सम्पदा (६) भौतिकी (७) प्रतिभा। इन सातों के सदुपयोग से ही व्यक्ति और समाज का कल्याण होता है।

(१) भावना (धर्म एवं अध्यात्म)-व्यक्तित्व को उत्कृष्ट और गतिविधियों को आदर्श बनाने की अन्तःप्रेरणा को भावना कहा जाता है। धर्म धारणा और अध्यात्म साधना के समस्त कलेवर को इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। पिछले दिनों कुछ कर्मकाण्डों, परम्पराओं एवं विधानों को पूरा कर लेना भर धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता समझी जाती रही है। वस्तुतः चरित्र गठन का नाम धर्म और अपनी क्षमताओं को लोक मंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाओं के कल्पना लोक में नहीं उड़ते रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने तथा समाज के समग्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए। यही उनका वास्तविक प्रयोजन भी है।

धर्म की प्राचीनता और दार्शनिकता से प्रभावित लोगों को कहा जा रहा है कि अपने सम्प्रदाय की संख्या बढ़ाने, धर्म परिवर्तन के प्रति उत्साह में शक्तियों का अपव्यय न करें। हमारा सतत प्रयास है सब धर्मों के प्रति परस्पर सहिष्णुता, समन्वय की वृत्ति उत्पन्न करना। वे अपने स्वरूप को भले ही पृथक बनाये रहे, पर विश्वधर्म का एक घटक बनकर रहें और अपने प्रभाव को चरित्र गठन एवं परमार्थ प्रयोजन में ही नियोजित करें। प्रथा परम्पराओं वाले कलेवर को गौण समझें। सभी धर्म सम्प्रदाय अपनी परम्पराओं में से उत्कृष्टता का अंश अपनाकर विश्व एकता के, उत्कृष्ट मानवता और आदर्श समाज रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े और एक ही केन्द्र पर केन्द्रित हो। धर्मों के जीवित रहने का, अपनी उपयोगिता बनाये रहने का मात्र यही तरीका है।

.....क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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