Friday 11, April 2025
हे बजरंग बली हनुमान, हे महावीर करो कल्याण |
आप सभी को हनुमान जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ
गृहस्थ जीवन की सफलता के लिए 5 BEST तरीके
मन में से भय की भावनाएं निकाल फेंकिए | Man Se Bhay Ki Bhavnayen Nikal | Pt Shriram Sharma Acharya
"महापुरुषों की सफलता का राज: अनुशासन का महत्व" जीवन में अनुशासन और नियमितता कैसे लाये |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 11 April 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
भावना की शक्ति आपके जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती है
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
महाराज जी, ऐसा ध्यान बताइए, कैसा ध्यान बताए, ऐसा ध्यान बताइए, एक जगह एकाग्र हो जाए, कहीं मन भागे नहीं। बेटे, ऐसा एकाग्र जैसा तू चाहता है, तूने मनोविज्ञान को पढ़ा नहीं है, अभी साइकोलाजी पढ़ी नहीं है, तैने मन की संरचना बखड़ा रहता है, खड़ा रहता है, एक बिंदु पर। बेटा, हो ही नहीं सकता कभी साकार उपासना, जो हम बताते हैं, गायत्री माता की उपासना बताते हैं। गायत्री माता एक हाथ में कमण्डल, एक हाथ में पुस्तक, एक हंस, एक मोर मुकुट, ये क्या चक्कर है, महाराज जी, ये चक्कर है।
बेटे, मन को सीमा-बद्ध करने के लिए इतने बड़े दायरे में घुमाना पड़ेगा। कभी कमण्डल देख, कभी हंस को देख, कभी उनके मुकुट को देख, कभी उनके होंठों को देख, कभी साड़ी को देख, कभी इसको देख। इतने वाले दायरे में, जब मन भागेगा, तो रुकेगा नहीं कहीं, एक बिंदु पर तो रुकता नहीं, कभी कहीं। इतने दायरे में, यहाँ वहाँ, यहाँ वहाँ, यहाँ वहाँ भागता रहेगा, चल, एक सीमा में घुमता रहेगा। मन सीमा में घुमाया जाता है।
एक मिनट अगर मनुष्य का मन एकाग्र हो जाएगा, तो समाधि में चला जाएगा। एक मिनट अगर एक मनुष्य का एकाग्रचित हो जाए, एक बिंदु पर एकत्र हो जाए, हो जाए, तो समाधि में चला जाएगा और बेहोश हो जाएगा। एक मिनट, एक मिनट की एकाग्रता से।
फिर, वो जो हम कहते हैं, एकाग्रता, उसका मतलब होता है, एक धारा, एक दिशा। सबेरे हम आपको ध्यान कराते हैं, एक धारा देते हैं, एक दिशा देते हैं। मन को एकाग्र होने का दावा नहीं करते, एक दिशा देते हैं। वैज्ञानिकों को एक दिशा होती है, एक धारा होती है। मन कितना भागता है, कितना भागता है, कितना भागता है, विवेक कहाँ भागता है, बेटे? वैज्ञानिक का पर दिशा एक रहती है, ये रिसर्च कर लीजिए, इसमें से ये कैलिकल इस में मिल जाएगा तो ये हो सकता है, इस में ये मिल जाएगा तो ये हो सकता है, न, ये नहीं हो सकता है। इसको ऐसे मिला देने से कोई बात बनेगी, इस चीज को ऐसे बना देंगे तो ऐसे हो सकता है। सारे का सारा शतरंज इतनी बनी हुई है, पड़ोस में किसके यहाँ से आएगी, मालूम नहीं।
अपने काम में एकाग्र हो गया, एकाग्र हो गया। महाराज जी, अभी तो आप कह रहे थे कि वह हजारों तरह के विचार करता है। हाँ, बेटे, हजारों तरह के विचार करता है, लेकिन एकाग्र कहलाएगा क्योंकि उसकी दिशाधारा एक दिशा, एक होना, धारा एक होना। बस, इतनी ही एकाग्रता हो सकती है कि आप जो विचार करते, वो असंभव पर विचार करते हैं। मन कहीं भागने न पावे, एक विशेष दिशा में लगा दें, ये हो सकता है।
अखण्ड-ज्योति से
गायत्री मंत्र के संबंध में हम यही प्रयोग और परीक्षण आजीवन करते रहे और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्तिमान है। सब कुछ उसके भीतर है, लेकिन है तभी जब गायत्री मंत्र के बीज को तीनों चीजों से समन्वित किया जाए। उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, अटूट श्रद्धा- विश्वास और परिष्कृत व्यक्तित्व यह जो करेगा पूरी सफलता पाएगा। हमारे अब तक के गायत्री उपासना संबंधी अनुभव यही हैं कि गायत्री मंत्र के बारे जो तीनों बातें कही जाती हैं पूर्णतः: सही हैं। गायत्री को कामधेनु कहा जाता है, यह सही है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है, यह सही है। गायत्री को पारस कहा जाता है, इसको छूकर के लोहा सोना बन जाता है, यह सही है। गायत्री को अमृत कहा जाता है, जिसको पीकर के अजर और अमर हो जाते हैं, यह भी सही है।
यह सब कुछ सही उसी हालत में है जबकि गायत्री रूपी कामधेनु को चारा भी खिलाया जाए, पानी पिलाया जाए, उसकी रखवाली भी की जाए। गाय को चारा आप खिलाएँ नहीं और दूध पीना चाहें तो यह कैसे संभव होगा? पानी पिलाएँ नहीं ठंढ से उसका बचाव करें नहीं, तो कैसे संभव होगा? गाय दूध देती है, यह सही है, लेकिन साथ साथ में यह भी सही है कि इसको परिपुष्ट करने के लिए, दूध पाने के लिए उन तीन चीजों की जरूरत है जो कि मैंने अभी आप से निवेदन किया। यह विज्ञान पक्ष की बात हुई। अब ज्ञानपक्ष की बात आती है। यह मेरा ७० वर्ष का अनुभव है कि गायत्री के तीन पाद तीन चरण में तीन शिक्षाएँ भरी हैं और ये तीनों शिक्षाएँ ऐसी हैं कि अगर उन्हें मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में समाविष्ट कर सके तो धर्म और अध्यात्म का सारे का सारा रहस्य और तत्त्वज्ञान का उसके जीवन में समाविष्ट होना संभव है। तीन पक्ष त्रिपदा गायत्री हैं (१) आस्तिकता, (२) आध्यात्मिकता, (३) धार्मिकता। इन तीनों को मिला करके त्रिवेणी संगम बन जाता है। ये क्या हैं तीनों?
पहला है आस्तिकता। आस्तिकता का अर्थ है- ईश्वर का विश्वास। भजन- पूजन तो कई आदमी कर लेते हैं, पर ईश्वर- विश्वास का अर्थ यह है कि सर्वत्र जो भगवान समाया हुआ है, उसके संबंध में यह दृष्टि रखें कि उसका न्याय का पक्ष, कर्म का फल देने वाला पक्ष इतना समर्थ है कि उसका कोई बीच- बचाव नहीं हो सकता। भगवान सर्वव्यापी है, सर्वत्र है, सबको देखता है, अगर यह विश्वास हमारे भीतर हो तो हमारे लिए पाप कर्म करना संभव नहीं होगा। हम हर जगह भगवान को देखेंगे और समझेंगे कि उसकी न्याय, निष्पक्षता हमेशा अक्षुण्ण रही है। उससे हम अपने आपका बचाव नहीं कर सकते।
इसलिए आस्तिक का, ईश्वर विश्वासी का पहला क्रिया- कलाप यह होना चाहिए कि हमको कर्मफल मिलेगा, इसलिए हम भगवान से डरें। जो भगवान से डरता है उसको संसार में और किसी से डरने की जरूरत नहीं होती। आस्तिकता, चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा का मूल है। आदमी इतना धूर्त है कि वह सरकार को झुठला सकता है, कानूनों को झुठला सकता है, लेकिन अगर ईश्वर का विश्वास उसके अंत:करण में जमा हुआ है तो वह बराबर ध्यान रखेगा। हाथी के ऊपर अंकुश जैसे लगा रहता है, आस्तिकता का अंकुश हर आदमी को ईमानदार बनने के लिए, अच्छा बनने के लिए प्रेरणा करता है, प्रकाश देता है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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