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Wednesday 11, June 2025

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माँ तुम्हारी याद आती है | Maa Tumhari Yad Aati hai | जीवन पथ के प्रदीप | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या

माँ तुम्हारी याद आती है | Maa Tumhari Yad Aati hai | जीवन पथ के प्रदीप | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या

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भावी महाभारत का स्वरूप कैसा होना  चाहिए | Bhavi Mahabharat Ka Swaroop Kaisa Hona Chahiye

भावी महाभारत का स्वरूप कैसा होना चाहिए | Bhavi Mahabharat Ka Swaroop Kaisa Hona Chahiye

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 11 June 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: अपने को श्रेष्ठ बनाओ और आगे बढाओ पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



  तृष्णाओं ने सारी हमारी इच्छाशक्ति, सारी हमारी आकांक्षाएं, सारा हमारा मनोबल इस तरीके से चूसा — ऐसे चूसा, ऐसे चूसा कि अगर वही इच्छा, वही इच्छा जो धन कमाने के लिए, वासना के लिए काम कर रही थी — अगर वही इच्छा, वही इच्छा अगर थोड़ी सी, उसका एक मीटर बदल गया होता और रेडियो का एक स्टेशन बदल गया होता, तो सीलोन की जगह पर से विविध भारती आ गई होती।
पर वह तो सीलोन के गाने सुनाती। कौन सी? जब देखो तब वही फिल्मी गाना। जब देखो तब फिल्मी गाना। सीलोन वही बोलता रहता है — "6, 3 के नंबर घुमा देना।"
"नहीं साहब, ये नंबर नहीं घुमाए जा सकते।"

हमारे दिमाग की, अक़ल की सुई हमेशा तृष्णा के ऊपर लगी रही — बड़प्पन, अमीरी, बड़प्पन, अमीरी, बड़प्पन, अमीरी, बड़प्पन, अमीरी।
जमाखोरी? जमाखोरी तो नहीं हो सकी।
हम गरीब देश में रहते हैं बेटे, कहाँ से अमीर हो जाएगा तू?
राम मनोहर लोहिया के हिसाब से तीन आने रोज, नेहरू के हिसाब से बारह आने रोज — जिस मुल्क की आमदनी हो, उस आदमी से तू क्या उम्मीद करता है? अमीर बन जाऊँगा?
बेटे, कैसे अमीर बन जाएगा?

सारी जनता भूखी मरी जा रही है। किसी के पास पहनने को नहीं है, कपड़े नहीं हैं। लाखों-करोड़ों आदमी किसी तरीके से ज़िंदगी काट रहे हैं।
तू क्या चाहता था?
"
मैं तो लग्ज़री चाहता था, विलासिता चाहता था, अमीरी चाहता था, ठाठ।"
अरे अभागे, बाकी लोगों को देख। औरों को देख। किसके लिए अमीर बनना है?

"नहीं साहब, मैं तो मालदार बनूँगा।"
बेटे, तेरी ये ख़्वाहिशें रहेंगी, और तू खाली हाथ मरेगा।
तड़प-तड़प के मरेगा।
इन्हीं तृष्णाओं में मरेगा।
खाली हाथ मरेगा।
सिकंदर खाली हाथ चला गया था।
रावण खाली हाथ चला गया था।
कंस खाली हाथ चला गया था।
ऐसे-ऐसे दौलतमंद खाली चले गए।
दुष्ट, तू कहाँ से अमीर बन जाएगा?

"नहीं साहब, बड़ा मालदार बनूँगा। और 6 मकान बनाऊँगा। और 6 बेटों को 6 मकान बनाऊँगा। और 6 बेटों को 6 मकान बनाऊँगा। भाड़ बनाएगा। इतना जेवर बनाऊँगा कि तीनों बहुओं के लिए 21-21 तोले का जेवर बनवाऊँगा। यह बनाऊँगा।"

यही ताने-बाने, यही ताने-बाने, यही ताने-बाने, यही ताने-बाने।
और तब हमारी अक़्ल — यह कैसी कीमती अक़्ल थी।
यह कितना बड़ा कंप्यूटर था हमारे पास।
इस कंप्यूटर का हमने ठीक तरीके से इस्तेमाल किया होता तो गज़ब कर देता — यह कंप्यूटर, हमारी अक़्ल।
और हमारी अक़्ल को सब चूस गई — यह चुड़ैल।
सब चूस गई।

चुड़ैल कौन?
तृष्णा।
और हमारी जीवात्मा — जीवात्मा के जो भीतर था, जो हमारे भीतर से कोई कहता था, भगवान कहता था —
"श्रेष्ठ बन, ऊँचा उठ। ऊँचा उठ। आगे बढ़। आगे बढ़। ऊँचा उठ, ऊँचा उठ। आगे बढ़।"

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अखण्ड-ज्योति से




  परेशानी, निराशा, आपत्ति अथवा जीवन के निविड़ अंधकार में वह पत्नी के सिवाय कौन है जो अपनी मुस्कानों से उजाला कर दिया करे अपने प्यार तथा स्नेह से हृदय नवजीवन जगाकर आश्वासन प्रदान करती रहे। पत्नी का सहयोग पुरुष के सुख में चार चाँद लगा देता और दुःख में वह उसकी साझीदार बनकर हाथ बँटाया करती हैं दिन भर बाहर काम करके और तरह-तरह के संघर्षों से थककर आने पर भोजन स्नान तथा आराम-विश्राम की व्यवस्था पत्नी के सिवाय और कौन करेगा।  
        
पुरुष एक उद्योगी उच्छृंखल इकाई है। परिवार बसाकर रहना उसका सहज स्वभाव नहीं हैं यह नारी की ही कोमल कुशलता है जो इसे पारिवारिक बनाकर प्रसन्नता की परिधि में परिभ्रमण करने के लिये लालायित बनाये रखती है। पत्नी ही पुरुष को उद्योग उपलब्धियों की व्यवस्था एवं उपयोगिता प्रदान करती हैं पुरुष पत्नी के कारण ही गृहस्थ तथा प्रसन्न चेता बनकर सामाजिक भद्र जीवन बिताया करता पत्नी रहित पुरुष का समाज में अपेक्षाकृत कम आदर होता है। परिवारों में सामाजिकता के आदान-प्रदान उन्हीं के बीच होता हैं पारिवारिकता तथा पत्नी की परिधि पुरुष को अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों से बचाये रहती है। 

पत्नी के रूप में नारी का यह महत्व कुछ कम नहीं है। यदि आज संसार में नारी का सर्वथा अभाव हो जाये तो कल से ही पुरुष पशु हो उठे, सारी समाज व्यवस्था उच्छृंखल हो उठे, और सृष्टि का व्यवस्थित स्वरूप अस्त-व्यस्त हो जाये। 

 नारी को अर्धांगिनी ही नहीं सह-धारिणी भी कहा गया है। पुरुष का कोई भी धर्मानुष्ठान पत्नी के बिना पूरा नहीं होता। बड़े-बड़े राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों में भी यजमानों को अपनी पत्नी के साथ ही बैठना पड़ता था और आज भी षोडश संस्कारों से लेकर तीर्थ स्नान तक का महत्व तभी पूरा होता है जब गृहस्थ पत्नी को साथ लेकर पूरा करता है। किसी भी गृहस्थ का सामान्य दशा में अकेले धर्मानुष्ठान करने का निषेध हैं इतना ही नहीं भारतीय धर्म में तो नारी को और भी अधिक महत्व दिया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं का क्रिया-कलाप भी उनकी सह-धर्मियों, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के बिना पूरा नहीं होता।

.... क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 25
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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