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Sunday 15, June 2025

कृष्ण पक्ष पंचमी, आषाढ़ 2025




पंचांग 16/06/2025 • June 16, 2025

आषाढ़ कृष्ण पक्ष पंचमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), ज्येष्ठ | पंचमी तिथि 03:31 PM तक उपरांत षष्ठी | नक्षत्र धनिष्ठा 01:13 AM तक उपरांत शतभिषा | वैधृति योग 11:06 AM तक, उसके बाद विष्कुम्भ योग | करण तैतिल 03:32 PM तक, बाद गर 03:12 AM तक, बाद वणिज |

जून 16 सोमवार को राहु 07:05 AM से 08:49 AM तक है | 01:09 PM तक चन्द्रमा मकर उपरांत कुंभ राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 5:20 AM सूर्यास्त 7:15 PM चन्द्रोदय 11:18 PM चन्द्रास्त 10:43 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु ग्रीष्म

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत - आषाढ़
  4. अमांत - ज्येष्ठ

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष पंचमी   - Jun 15 03:51 PM – Jun 16 03:31 PM
  2. कृष्ण पक्ष षष्ठी   - Jun 16 03:31 PM – Jun 17 02:46 PM

नक्षत्र

  1. धनिष्ठा - Jun 16 12:59 AM – Jun 17 01:13 AM
  2. शतभिषा - Jun 17 01:13 AM – Jun 18 01:01 AM


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गुरुदेव की चेतना घर घर पहुंचें | Gurudev Ki Chetna Ghar Ghar Pahuchen | Dr Chinmay Pandya Ji

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चरित्र-हमारी बहुमूल्य संपत्ति भाग 01 Chaitra Hamari Hamari Bahumulya Smaptti Part 01 सफल जीवन की दिशा धारा

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मनोबल द्वारा रोग का निवारण भाग - 02 | Manobal Dwara Rog Ka Nivaran Part 02 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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दान में सर्वोपरि ज्ञानदान को माना जाता है | Dan Mei Sarvopari Gyandan Ko mana Jata Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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द्रश्य दर्शक और द्रष्टा | Drashya Darshak aur Drashta   Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan

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इस विषम वेला में हमारा महान उत्तरदायित्व , Es visam vela mai humara mahan uttardaeitwa

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कलम और वाणी ही केवल हमारी हैं | गुरुदेव के पत्र स्नेह |

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अमृत सन्देश:-  आध्यात्मिक सफलता का रहस्य | Adhyatmik Safalta Ka Rehshay पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 16 June 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: हम आपसे दूर नहीं हें पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भाइयों, 60 वर्ष के करीब होने को आते हैं, गायत्री परिवार के साथ हमारे संबंध हुए, आप अपनी बात कहते रहे, हम अपनी बात कहते रहे, कैसे मजे-मजे में 60 वर्ष बीत गए। हमारे और आपकी एक नई बात हुई, नई बात हुई यह कि हमारा और आपका एक तरीके से संबंध विच्छेद हो गया। संबंध विच्छेद कैसे नहीं, संबंध विच्छेद नहीं हुआ है, ऐसा हो गया कि आपका और हमारा मिलना-जुलना संभव नहीं है। बातचीत भी आप हमसे नहीं कर सकेंगे और हम आपसे भी नहीं कर सकेंगे। मिलना-जुलना भी संभव नहीं है, ना आप हमारी शक्ल देखेंगे, ना आपकी शक्ल हम देख पाएंगे।
अब हमारे सामने मजबूरी आ गई है, इस मजबूरी की वजह से हमको यह करना पड़ा है। जैसे कि हमने आपको निवेदन किया, अब हमारी और आपकी बातचीत का सिलसिला खत्म, मिलने-जुलने का सिलसिला खत्म। प्यार-मोहब्बत का सिलसिला नहीं, प्यार-मोहब्बत का सिलसिला खत्म नहीं हो सकता, केवल मिलने-जुलने का सिलसिला खत्म हो जाएगा।

अब यह मिलने-जुलने के सिलसिले में आपको यह ख्याल आया हो, शायद कि बात क्या हुई, क्या कारण हुआ। कई आदमी होते हैं जो काम करने से अपना जी चुराते हैं, मिलने-जुलने से भी जी चुराते हैं, पलायनवादी उनको कहते हैं, भगोड़े उनको कहते हैं, आलसी उनको कहते हैं। हम वैसे नहीं हैं, हम पलायनवादी नहीं हैं।

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अखण्ड-ज्योति से



  उचित यही है कि अशिष्टता के खरपतवारों को निरन्तर उखाड़ते रहा जाय ताकि गृह उद्यान के बहुमूल्य वृक्षों के पनपने में भारी व्यवधान उत्पन्न करने वाली आदतों का प्रश्रय मिलने ही न पावे। परिवार के वरिष्ठ लोगों को शिष्टाचार पालन में स्वयं को आगे रहना ही चाहिए साथ ही अन्य सदस्यों की समय-समय पर उनकी छोटी-मोटी भूलों को समझाते रहना चाहिए और उन्हें छोड़ने का अनुरोध करना चाहिए यह कार्य स्नेह, सौजन्य एवं सद्गुण का गहरा पुण्य लगाकर ही ठीक तरह सम्पन्न किया जा सकता है। झिड़की, डाँट-डपट मार-पीट गाली-गलौज निन्दा, उपहास -व्यंग जैसे उपायों से गलती सुधरती नहीं वरन् और भी अधिक बढ़ती है। उल्टी प्रतिक्रिया होती है।       
         और गलती करने वाला इसी बात पर अड़ जाता है। घर या बाहर कि किसी भी व्यक्ति, कभी भी गलती बताने और सुधारने की बात करनी हो तो फूँक-फूँक कर कदम धरना चाहिए कि कहीं सामने वाले के अहम् को चोट न लगे, वह अपना अपमान अनुभव करते हुए अपने स्नेह सद्भाव का स्मरण दिलाना चाहिए और उसे लाँछन लगाने निकालने की दृष्टि से नहीं वरन् अधिक सुसंस्कृत बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को अपनाने पर अधिक उज्ज्वल भविष्य बनाने की सम्भावना का प्रसंग प्रस्तुत करना चाहिए। उसी बात को दोष दर्शन के रूप में कह कर भर्त्सना की जा सकती है और उसी पथ्य को गुण अभिवर्धन के साथ जुड़े हुये प्रस्तुत किया जा सकता है। इनमें से पहला तरीका गलत और दूसरा सही है। यदि दूसरा तरीका अपनाया जाय तो परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य उस सुधार चर्चा को ध्यान पूर्वक सुनेंगे और अपनी कठिनाई सफाई बताते हुये बहुत हद तक सुधार के लिये तैयार हो जायेंगे। 

 परिवार के प्रत्येक वयस्क एवं समझदार व्यक्ति को अपने स्वभाव में शिष्टाचार के नियमों का कूट-कूटकर समावेश करना चाहिए। यह सर्वोत्तम तरीका है, जिसके आधार पर घर के प्रत्येक सदस्य को सभ्य एवं सुसंस्कृत बनाया जा सकता है। धर के बड़े लोग यदि इस कसौटी पर खरे उतरे तो फिर अन्य सब लोगों को वैसे ही अनुकरण की प्रेरणा मिलती रहेगी। यदि ऐसा वातावरण हो तो भी प्रत्येक वयस्क, अवयस्क, नर-नारी को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसके स्वभाव में सभ्यता के सभी पक्षों का समावेश होता चले। वस्तुतः यही सबसे बड़ी सम्पत्ति है जिसके आधार पर मनुष्य ऊँचे उठते और आगे बढ़ते है। 

 साथियों का सहयोग, सविचार लिये बिना कोई व्यक्ति एकाकी कदाचित ही कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है। दूसरों की सहायता बिना हँसी-खुशी भी स्थिर नहीं रह सकती। कष्टों और कठिनाइयों में दूसरों का सहारा चाहिये ही। यह सब जुटा सकना उस ही के लिये ठीक है जो अपने मधुर स्वर से दूसरों को प्रभावित एवं आकर्षित कर सकता है। ऐसा सजीव चुम्बकीय शिष्टाचार में ही समर्पित रहता है। 

 घर में गरीबी हो या अमीरी इसका चलता है, चले भी तो उससे किसी को क्या लेना देना हो सकता है। पर यदि सभ्यता की पूँजी पास में है तो उस सुसंस्कृत परिवार के सदस्य प्रत्येक आगन्तुक पर सम्पर्क में आने वाले पर गहरी छाप छोड़ेंगे और उसकी भी यही आकांक्षा जगायेंगे कि हे भगवान्! और न सही तो हमारे परिवार को भी इतना सभ्य बना दें जैसा कि अमुक व्यक्ति को देखकर आयें है। शालीन परिवारों के साथ लेन-देन चलन-व्यवहार ब्याह-शादी करने में हर किसी को प्रसन्नता होती है हर कोई उन्हें सम्मान देता हैं और सहयोग भी। अध्यात्म का पहला पाठ है सभ्यता का अपने आप से, अपने घर से शुभारम्भ, सभ्य, सुसंस्कृत बनायें, फिर औरों को उपदेश दें।
 
समाप्त
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 30
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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