Saturday 17, January 2026
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जप, ध्यान और प्राणायाम से जीवन का कायाकल्प कैसे करें? | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां
अमृत सन्देश:- जब भगवान भक्त से मांगने आते हैं | Jab Bhagwan Bhakt se Mangane Aate Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 17 January 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
Reel_6 महत्वाकांक्षाए त्यागे स्वावलंबन अपनाए 1.mp4
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
बहुत धन जमा करेंगे, बहुत अय्याशी करेंगे नहीं भाई साहब, यह शोभा नहीं देगा। आपको आप स्वस्थ होंगे तब, जब आप हमारी बिरादरी में शामिल हो गए तब। और महत्वाकांक्षाओं के अलावा, महत्वाकांक्षाआ के अलावा एक और है घर वालों का। घर वाले बढ़ाएँगे क्यों? तो आप बढ़ाते हैं, बेकार तो। तो उनकी संख्या बढ़ाते हैं और क्यों उनको निकम्मा बनाते हैं? स्वावलंबी बनने दीजिए। जो हैं, जो थोड़े बड़े होते जाते हैं, थोड़ा-थोड़ा स्वावलंबन सीखने दीजिए। थोड़ा-थोड़ा घर के काम में मदद करना सीखने दीजिए। थोड़ा-थोड़ा उनको सुसंस्कारी बनाते चलिए। परिवार भार नहीं रहेगा आपका। परिवार भार तब होता है, जब उनको आप बैठा करके अपंगों की तरीके से खिलाना चाहते है और सारा धन-दौलत उनके लिए छोड़ जाना चाहते हैं। तब परिवार भार हो जाता है। आपके ऊपर परिवार भार नहीं हो सकता। आपके ऊपर आपका गुजारा भार नहीं हो सकता। भार तो केवल आपकी महत्वाकांक्षाएँ हैं, ऐषणाएँ हैं। इसको आप कम कर ले तो फिर हमारे साथ में जल्दी-जल्दी चल सकें, फिर आप उसको हमारा हाथ बटाना शुरू कर दें। हाथ तो आप बटाते रहें। पर वह हाथ बँटाने के लिए एक शिकायत है यह कि क्रमबद्धता नहीं है। जब आपको उत्साह आ गया तो आपने छलाँग लगाई और जब आपका उत्साह ठंडा हो गया तो मगर घड़ियाल की तरीके से पानी में जा बैठे। नहीं भाई साहब, यह नहीं। यह पानी के बुलबुलों की तरीके से उछल-कूद करना और फिर 2 मिनट बाद ठंडे हो जाना, यह कोई शोभा की बात है। यह कोई शान की बात है। यह कोई इज्जत की बात है। चलना है तो चलना है। चलना है तो चलना है। चलते ही रहेंगे, चलते ही रहेंगे। हमको और आपको चलते ही रहना चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
भस्रिका प्राणायाम एक आश्चर्य जनक प्राणायाम है। इसे वासुकी प्राणायाम भी कहते हैं। इस क्रिया को करने में न कोई अड़चन है, न कठिनाई, न किसी आसन को सिद्ध करने की जरूरत है और ने अन्य कोई बाधा ही है। इस क्रिया में अन्य प्राणायामों की तरह आसन, बन्ध, मुद्रा, रेचक, पूरक का अनुपात, आहार-विहार की नियमितता आदि की पाबन्दी नहीं है। इसमें किसी प्रकार की हानि होने की भी आशंका नहीं है।
लाभ :- इस क्रिया से अधिकाँश रोग दूर होते हैं। शरीर में कहीं भी रोग हो प्राणायाम से बिजली जैसा धक्का वहीं लगता है और बार-बार के प्रहार से वहाँ के रोग कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। दिल की धड़कन के लिये यह प्राणायाम रामबाण है। धड़कन का दौरा होने पर भी यह क्रिया विधिपूर्वक करने से तुरन्त आराम होता है। खून खराबी, फोड़े-फुन्सी, दाद, खाज, खुजली, जिगर बढ़ जाना, तिल्ली, पित्ताशय, मूत्राशय, अण्डकोश आदि रोगों में इस क्रिया में बड़ा लाभ होता है। पेट की तमाम बीमारियों के लिये यह प्राणायाम एक चूरन है। खाना न पचता हो, भूख कम लगती हो, कब्ज रहती हो, अग्नि कम हो गई हो तो इस क्रिया से बढ़ जाती है। जुकाम, खाँसी, पेट का भारीपन, सिर दर्द, कमर दर्द आदि में भी इसका अच्छा असर होता है।
गले के रोगों के लिये भी यह क्रिया लाभदायक सिद्ध हुई है। इससे स्वर बड़ा मधुर हो जाता है। बहुत से मनुष्य थोड़ा सा भी शारीरिक या मानसिक परिश्रम करने पर थक जाते हैं। यदि वे इस क्रिया को करने लगें तो थकावट का अनुभव नहीं करेंगे। मेरे कार्यालय के अनेक व्यक्ति दिन भर काम करने के बाद शाम को बड़ी थकावट मालूम करने लगते थे। मैंने उनसे थोड़े दिन यह प्राणायाम कराया। उनको अभूतपूर्व लाभ हुआ। फिर तो चाहे जितनी देर शाम को या रात में काम करना पड़े वे हतोत्साह नहीं होते थे। इस क्रिया से आलस्य, सुस्ती, ढीलापन, दीर्घसूत्रता नहीं रह जाती है। हमारे आयु की माप वर्षों में नहीं होती है। बल्कि श्वासों की संख्या पर निर्भर है।
मान लीजिए कि एक मनुष्य की आयु पचास लाख श्वांस है। वह चाहे तो इसको 50 वर्ष में लेले या 100 वर्ष में लेले या जल्दी-जल्दी श्वास लेकर 20 ही वर्ष में कुल संख्या पूरी कर ले। साधारण स्वस्थ मनुष्य को एक मिनट में 12-14 श्वास लेना चाहिए। यदि इससे अधिक लेते हैं तो आपकी आयु कम है और यदि 12-14 से भी कम लेते हैं तो आप दीर्घजीवी होंगे। जो प्राणी जल्दी-जल्दी श्वास लेते हैं वह थोड़े ही जीते हैं। योगी लोग श्वासों की मात्रा कम करके दीर्घजीवी हो जाते हैं। यों योगी अधिकतर समाधि में रहता है उसकी श्वास उतनी देर तो चलती नहीं और उसकी उतने समय की आयु बढ़ जाती है। इस भस्रिका प्राणायाम द्वारा श्वास-प्रश्वास की गति बहुत थोड़ी हो जाती है। कभी-कभी तो 10-12 श्वास प्रति मिनट से भी कम हो जाती है। इसके साथ योग की कुछ गुप्त क्रियायें की जाती हैं जिससे श्वास-प्रश्वास की गति 3-4 प्रति मिनट हो जाती है। इस भस्रिका प्राणायाम से बढ़ी हुई श्वास की गति सामान्य स्तर पर आ जाती है और यही कारण है कि मनुष्य की आयु बढ़ जाती है।
क्रमशः जारी........
अखण्ड ज्योति 1952 अगस्त, पृष्ठ 20
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