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Wednesday 18, June 2025

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प्रज्ञा पुराण भाग 2, प्रथम खंड, प्रथम अध्याय- लोक कल्याण जिज्ञासा प्रकरण | पं श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रज्ञा पुराण भाग 2, प्रथम खंड, प्रथम अध्याय- लोक कल्याण जिज्ञासा प्रकरण | पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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नर और नारी एक दूसरे का सम्मान करे | Nar Aur Nari Ek Dusre Ka Samman Kare पुस्तक :- नारी दलित एवं प्रताड़ित न रहे, न रहने दी जाय | NARI DALIT EVAM PRATADIT NA RAHE NA RAHANE DI JAY Part 02 लेखिका:- माता भगवती देवी शर्मा

नर और नारी एक दूसरे का सम्मान करे | Nar Aur Nari Ek Dusre Ka Samman Kare पुस्तक :- नारी दलित एवं प्रताड़ित न रहे, न रहने दी जाय | NARI DALIT EVAM PRATADIT NA RAHE NA RAHANE DI JAY Part 02 लेखिका:- माता भगवती देवी शर्मा

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जनमानस का परिष्कार – एक धर्मयुद्ध | Janmans Ka Pariskar - Ek Dharamyuddh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

जनमानस का परिष्कार – एक धर्मयुद्ध | Janmans Ka Pariskar - Ek Dharamyuddh पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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"तीनों आचार्यों की परीक्षा : सार्थक विद्या | Motivational Story

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राजा जनक का अद्भुत दृष्टिकोण Raja Janak Ka Adbhut Dristikon आद डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी

राजा जनक का अद्भुत दृष्टिकोण Raja Janak Ka Adbhut Dristikon आद डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी

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आचरण में श्रेष्ठता का समावेश | Aacharan Mai Shresthata ka Samavesh |  पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य में

आचरण में श्रेष्ठता का समावेश | Aacharan Mai Shresthata ka Samavesh | पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य में

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मांगने से पहले योग्य बनो | Mangane Se Pehle Yogya Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

मांगने से पहले योग्य बनो | Mangane Se Pehle Yogya Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गीता का कर्म योग | Gita Ka Karm Yog | Pt Shriram Sharma Acharya

गीता का कर्म योग | Gita Ka Karm Yog | Pt Shriram Sharma Acharya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 18 June 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: मानवता बचेगी तभी धरती बचेगी पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



रामचंद्र जी थे अकेले ही थे, लड़ने के लिए गए थे। बेचारे किससे गए थे? रावण के, जिसके ढेरों के ढेरों आदमी थे, जो इतनी बड़ी ताकत थी, बड़े हथियार थे, उससे लड़ने गए थे। हमको भी लड़ने के लिए इन सब मुसीबतों से लड़ना है, नहीं तो फिर इंसानियत जिंदा नहीं रहेगी। इंसानियत जिंदा नहीं रहेगी, यह जमीन भी जिंदा नहीं रहेगी।

 

कहीं ऐसा भी हो सकता है कि एटम बमों की लड़ाई शुरू हो और जमीन का मट्टी धूल हो जाए और धूल कहीं आसमान में उड़ी उड़ी फिरे, फिर आपको तलाश करना पड़े कि यह जमीन थी। कोई मालूम नहीं साहब, सुना तो हमने भी है कि जमीन भी थी, सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं थी। ऐसी ही मुसीबत आ सकती है।

 

ऐसी मुसीबत के वक्त पर हमको अपना जद्दोजहद करनी है, हमको कुछ बनाना भी है। बनाना का मतलब क्या है? रामचंद्र जी ने केवल रावण को मारा ही नहीं था, रामराज्य भी स्थापित किया था। और श्री कृष्ण भगवान ने महाभारत में मारकाट ही नहीं मचाई थी, बल्कि महाभारत, महान भारत जो कि ग्रेट इन इंडिया, बहुत बड़ा भारत वर्ष बना करके रख दिया था।

 

बहुत छोटा रह गया था, तब हमको बनाना भी है, बिगाड़ना भी है। बनाना भी है, बिगाड़ना भी है। बिगाड़ना है और बनाना है, दोनों कामों के लिए हमारे ऊपर बहुत अधिक दबाव आ गया है। इसलिए आप लोगों से क्षमा मांगनी पड़ी और बड़ा छाती पर पत्थर रखना पड़ा।

 

आप लोगों से बातचीत न भी हम कर सकें, तो भी हम आप सब के साथ तो रहेंगे, पर अलग रहना पड़ेगा। आप यह मत ख्याल कीजिए कि हम आपके साथ-साथ रहते हैं, बातचीत करते हैं और अपनी बात कहते हैं तो अच्छे लगते हैं। न उससे क्या बनता-बिगड़ता है?

 

जुएं होते हैं न, सिर में बैठ जाते हैं और खाते रहते हैं और खून पीते रहते हैं। आपके लिए कुछ फायदेमंद है? खटमल चारपाई में बने रहते हैं और रात भर काटते रहते हैं। पास रहने से कोई फायदा है? चूहे घर में रहते हैं, ढेरों के ढेरों अनाज खा जाते हैं। कोई फायदा है? छिपकलियाँ घर में रहती हैं, नमक पर पेशाब कर जाती हैं, जहरीला बना जाती हैं।

 

कुछ फायदा है नजदीक रहने से? कोई खास फायदा हो, ऐसी बात नहीं है। और दूर रहने से कोई आदमी नुकसान में रहता हो, आप यह भी मत सोचिए।

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अखण्ड-ज्योति से



  उस रात विन्दुमती को एकाएक ज्वर हो गया। चौलिया उनकी देख-भाल के लिए नियुक्त की गई। एक दिन-दो दिन और क्रमशः कई दिन बीत गए, ज्वर सन्निपात में परिवर्तित हो गया। चिकित्सकों ने ज्यों-ज्यों चिकित्सा की स्थिति त्यों-त्यों बिगड़ती गयी। इस बीच घर के सब लोगों ने अपनी दैनिक क्रियाएँ यथावत् निबटाए। किन्तु चौलिया को किसी ने न स्नान करते देखा न शयन करते।         
        
  अपनी सगी माँ की कोई क्या सेवा करेगा, चौलिया ने जैसी सेवा विन्दुमती की की। लेकिन दैवयोग भला किसके टाले टलता है। एक रात विन्दुमती की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ उसने आँखें खोली-सामने चौलिया खड़ी थी। अनंग को बुलाया बिन्दु की आँखें छलक पड़ी, कुछ कहना चाहा पर निकले कुल दो शब्द -”बेटी चौलिया ......और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। विन्दुमती का देहावसान हो गया। 

 इधर अर्थी जा रही थी श्मशान को उधर चौलिया किसी नए आश्रय की खोज में। अनंगपाल ने समझाया-बेटी! यह घर तेरा घर है तू कहाँ जा रही हैं? तो चौलिया बोली- “माँ थी जब तक, तब उसकी सेवा के लिए मेरी आवश्यकता थी और मुझे भी अपनी सहनशीलता का अभ्यास करने के लिए उनकी आवश्यकता थी। अब वे नहीं रही तो मुझे अन्यत्र वैसी ही परिस्थिति ढूँढ़ने के लिए जाना चाहिए। जहाँ मेरा रहना सार्थक हो सके।” 
                  
अनंगपाल देखते ही रह गए और चौलिया वैसी ही स्थिति वाला कोई और दूसरा स्थान ढूँढ़ने के लिए आगे बढ़ गई। 
 
 समाप्त
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 2
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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