Saturday 19, April 2025
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नियत मार्ग की मर्यादा
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 19 April 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
युग निर्माण परिवार को क्यों सौभाग्यवान मानना चाहिए | Yug Nirman Pariwar Ko Kyun Saubhagyawan Manana Chahiye
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
युग निर्माण परिवार के लोगों को अपने आपको सौभाग्यवान मानना चाहिए कि जो घटनाएं भविष्य में घटने वाली हैं, जो युग अगले दिनों आने वाला है, उसमें उनको पहली पंक्ति पर खड़े होने का मौका दिया गया है। पहली पंक्ति पर जो लोग खड़े होते हैं, जिनको हमेशा श्रेय मिलता आ रहा है, आंदोलन में जो लोग पहली पंक्ति में आए, उन लोगों को श्रेय मिला। पीछे भी लोग आए, बहुत सारे, हजारों आदमियों के बलिदान भी हुए, जेल भी गए। लेकिन जो शुरू के दिनों में, अगले दिनों में काम में आ गए थे, उन्हीं को लोग, उन्हीं की बात लोगों को याद है।
दादा भाई नौरोजी से लेकर के लोकमान्य तिलक और गोखले तक जो नेता उस जमाने में थे, क्या उसके बाद लोग नहीं आए? हाँ, उसके बाद भी आए। क्या उनसे कम योग्यता के थे आदमी? नहीं, उनसे ज्यादा योग्यता के भी थे। लेकिन क्योंकि वह अपनी हिम्मत उस जमाने में दिखा सके, जिस जमाने में दूसरे लोग कंधे से कंधा मिलाकर के तैयार नहीं थे, अकेले आदमी दिखाई पड़ते थे, हिम्मत इकट्ठे करके सबसे पहली पंक्ति में आए — यह भगवान की विशेषता और अनुग्रह का चिन्ह है।
भगवान जिन पर अनुग्रह करते हैं, उनको पहली पंक्ति में खड़ा करते हैं, उनका स्वास्थ्य सबसे पहले खराब करते हैं। विवेकानंद के अनुसार, पीछे तो हजारों आदमी अपने आप उनके अनुयायी बन जाते हैं। भगवान बुद्ध को भगवान का कृपा पात्र माना जाएगा क्योंकि वह त्याग और तप और बलिदान के राह पर सबसे पहले आगे आए। पीछे भी आए लोग, ऐसा नहीं है कि भगवान बुद्ध ने ही तो अपना कार्य किया हो। ढाई लाख शिष्य उनके थे और वे एक-एक विहारों में बंटे हुए थे, संसार के विभिन्न भागों में गए।
बुद्ध के त्याग से कम था क्या उन लोगों का त्याग? उनका भी उतना ही त्याग था, जितना भगवान बुद्ध का। लेकिन श्रेय की पहचान यह है कि वे पहली पंक्ति में आते हैं, आगे आते हैं, जब कोई और नहीं होता, तब भी वे हिम्मत दिखाते हैं। यही विशेषता है, जिसको कि हम भगवान का अनुग्रह कह सकते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता:। जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवा भावी बनें।
विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवा व्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवा व्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहकता बढ़ती जाती है।
दु:खियों की सेवा, निर्बल की रक्षा और रोगियों की सहायता सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवा व्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्टï हो जाती है।
सेवा व्रती का शरीर स्वच्छ रहना आवश्यक है। उसे अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान करना चाहिए। अपवित्र और रोगी मनुष्य की प्रवृत्ति कभी स्वच्छ नहीं रहती। उनमें क्रोध, ईर्ष्या आदि की उत्पत्ति हो जाती है। इससे विभिन्न वासनाएँ भडक़ उठती हैं। फिर मनुष्य अपनी इन्द्रियाँ पर नियंत्रण नहीं रख पाता। जब असंयम का अधिकार बढ़ता है, तब दुष्कर्मों की वृद्धि होती है। सुख की कामना से की गई सेवा भोग में परिवर्तित हो जाती है तब साधक में अहंकार जाग्रत होता है। सत्य का लोप हो जाता है, पाप-वृत्तियाँ अपना पंजा कठोर करती हुई उसे बुरी तरह जकड़ लेती है।
स्थूल शरीर की इच्छाएँ मनुष्य के धर्म का अपहरण कर लेती हैं, उस समय अन्याय और दुराचार का बोलबाला होता है। यदि अपने मन पर नियंत्रण नहीं हो तो सेवा कुसेवा बन जायेगी और जीवन की सुख-शांति का लोप हो जायेगा। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब सत् को अपनाना और शुद्ध संकल्पों में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है।
अहं का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है, अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए जो तुम्हारी सेवा चाहे, उसी की सेवा करो। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए किसी को अपना मान कर सेवा न करो, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करो। परमात्मा के अंश भूत होने के नाते सब प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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