Friday 20, June 2025
योग का इतिहास | History of Yoga | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan Shantikunj Rishi Chintan- AWGP 212K subscribers
गंगा से यमुना तक | Ganga Se Yamuna Tak पुस्तक :- चेतना की शिखर यात्रा | Chetna ki Shikhar Yatra Part 01 लेखक:- श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या जी
सन्त का सान्निध्य | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या Sant Ka Sanidhay | Shraddheya Dr. Pranav Pandya पुस्तक :- जीवन पथ के प्रदीप
सत्य, तप और वैराग्य का समन्वय | Satya Tap Aur Vairagya Ka Samnway पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य में
मत किसी से शत्रुता करो, मत किसी से डरो। गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
सर्वोत्कृष्ट परमार्थ-ज्ञानयज्ञ | Sarvottoskruth Parmarth Gyan Yagya
भगवान तब देंगे जब पात्रता बढ़ेगी | Bhagwan Tab Denge Jab Patrata Badhegi पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
मृत्यु की तैयारी, मरने के बाद हमारा क्या होता है? Marne Ke Baad Hamara Kya Hota Hai?
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 20 June 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: हम रुकें नहीं हैं, बस दिशा बदली है पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप यह मत कीजिए कि हम भगोड़े हैं और भाग गए और काम नहीं करना चाहते और एकांत में बैठेंगे और हम दिन ऐसे बिताएंगे। हमारे तो दिन पहले की अपेक्षा जब आप लोगों से मिलते जुलते हैं, उससे ज्यादा मुसीबत से बीत रहे। आप यह मत सोचिए कि हम यहां आराम कर रहे हैं और हम कुछ काम नहीं करते और बैठे रहते हैं और सोया करते हैं और लेटे रहते हैं।
नहीं, आप यह मत सोचिए। हम जहां कहीं भी बची हुई जिंदगी में जहां कहीं जाएंगे, पिछले दिनों 60 साल में जो काम किया है, उससे कम नहीं, बल्कि ज्यादा ही काम करेंगे। कहीं भी काम के लिए रहना पड़े, कहां रहना पड़ेगा, कहीं भी रहना पड़ सकता है। शांतिकुंज में भी रहना पड़ सकता है और हिमालय पर भी।
आपको मालूम ही है, हमारी जमीन खरीदी हुई रखी है। कभी भी वहां हम जा करके अपना अड्डा डाल सकते हैं। और हमको यह भी हो सकता है कि यह शरीर काम का नहीं रहे और इस शरीर से कुछ काम चलता हुआ दिखाई नहीं पड़े, तो इस शरीर को हम फेंक दें। बिना शरीर के रहें, बिना शरीर के भी आप रह सकते हैं।
हमारे गुरु जो बिना शरीर के रहते हैं, और हमको बिना शरीर के रहने में क्या आफत है? इसीलिए कहीं भी हमको रहना पड़े, लेकिन हर हालत में हम आपका, हम आपके लिए वही काम करेंगे जो हमें करना चाहिए। समाज के लिए, देश के लिए, विराट ब्रह्म के लिए, भगवान के लिए हम को बराबर वही काम करना पड़ेगा।
इसलिए हम अब इससे आगे, इससे आगे उस काम के लिए आमादा हुए, तो एक काम कम करना पड़ा। आपसे मिलने के लिए काम कम करना पड़ा और दूसरों के साथ में जोड़ने के लिए काम ज्यादा करना पड़ा। अकेले का रहना, अकेले का रहना बेकार होता है नहीं, आप यह मत सोचिए बेकार होता है।
अखण्ड-ज्योति से
अन्तरिक्ष अनुसंधान से जब तक तो तथ्य उपलब्ध हुए है, उनके अनुसार यदि अपने सौर मंडल के किसी दूरतम ग्रह की कोई यात्रा करना चाहे, तो शायद इसमें उसका पूरा जीवन ही खप जाय और यदि वहाँ पहुँच कर वह वापिस लौटना चाहे, तो कदाचित् उसका मृत शरीर ही धरती पर आयेगा। कोई भी व्यक्ति अपना सम्पूर्ण जीवन इस प्रकार बर्बाद करना नहीं चाहेगा। इस स्थिति से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने कई विकल्प ढूँढ़े है। एक के अनुसार यदि मनुष्य को सुषुप्तावस्था में लाया जा सकें, तो बिना कुछ खाये-पिये और साँस लिये भी वह लम्बी अवधि अवधि तक जीवित बना रह सकता है।
कि मस्तिष्क को यदि अर्धचेतनावस्था में योगियों की तरह लम्बे समय तक रखा जा सके, तो लम्बी आयु की सकना हर किसी के लिए संभव है। वैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष से पता चलता है कि इसके समान सुषुप्तिकरण भी एक अवस्था है। जीवन और मृत्यु के बीच की इस अवस्था की व्यापक खोज की जा रही है। आशा है निकट भविष्य में ही जीवन और मृत्यु की तरह इसे भी जीवन के एक सामान्य स्तर के रूप में स्वीकार लिया जायेगा।
पिछली दिनों इस मध्यवर्ती दशा को लेकर वैज्ञानिकों के बीच विवाद छिड़ा रहा। इनमें से अधिकाँश का मत था कि बहुत लम्बे समय तक बिना भोजन-वायु के जिन्दा रह सकना सम्भव नहीं, किन्तु कुछ वर्ष पूर्व वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे प्रमाण हाथ लगे है, जिनसे उनमें एक बार फिर आशा का संचार हुआ है। सोवियत विज्ञानवेत्ता प्रो. पी. कोप्तरेव ने ‘डाफनिया ‘ नामक जल कीट और शैवाल को उन क्षेत्रों से ढूँढ़ निकला है, जहाँ स्थायी रूप से बर्फ जमी रहती है।
हिसाब लगाया गया, तो पता चला इनमें से कुछ कीटक 25 हजार वर्ष प्राचीन थे। प्रो. कोप्तरेव ने उनमें से अधिकाँश को गर्मी देकर फिर से जिन्दा कर लिया। इतनी लम्बी अवधि तक निष्क्रिय अवधि में पड़ा रहना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चेतना तब भी यथावत् बनी रहती है, केवल यह सुषुप्त की दशा में चली जाती है। यदि इस अन्तराल में शरीर कोशों को क्षति से बचाया जा सकें, तो गर्मी और आक्सीजन देकर उन्हें पुनर्जीवित कर सकना शक्य हैं
अब वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रह है। कि रासायनिक तत्वों का कार्बनिक पदार्थों से संश्लेषण किस प्रकार हो सकता है? इस सम्बन्ध में वे ‘क्लोरेला’ नामक पौधे लगाने की कोशिश कर रहे हैं और इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे है कि क्या इनकी नर्सरी उगा कर अन्तरिक्ष यानों से संश्लेषण की क्रिया पूरी की जा सकती है क्या? यदि ऐसा हुआ, तो इससे सुषुप्ति की दशा में पड़ा शरीर अपने शारीरिक उच्छिष्ट से ही जीवन उसी प्रकार बनाये रख सकता है, जैसे मनुष्यों और पशुओं द्वारा छोड़ी हुई साँस और मलमूत्र से पौधे जीवनी शक्ति प्राप्त करते है। यह प्रयोग सफल हुआ, तो मानवी शरीर को लम्बे काल तक मूर्च्छित स्थिति में रखने के उपाय उसे इच्छानुसार जिलाये जा सकना सम्भव हो सकेगा।
... क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 31
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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