Wednesday 22, January 2025
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अपने गुरु स्वयं बनिए, Apne Guru Swanya Baniye
आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें | Adhyatmik Jivan Es Tarah Jiye
अमृतवाणी:- कर्मठ परिजनों से : भाग 01 | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya
ट गयी कमर की बेल्ट और बैसाखी | Chut Gyi Kamar Ki Belt Aur Baisakhi
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन
ऋषि अगस्त्य की पत्नी ने एक बार रत्नजड़ित आभूषण पहनने की इच्छा की और किसी शिष्य से माँग लाने के लिए उन्हें बाधित किया। ऋषि किसी प्रकार जाने को तैयार तो हो गए, पर एक शर्त रखी, जिसके पास ईमानदारी की कमाई का धन होगा, उसी के आभूषण ग्रहण करूँगा।
ऋषि के शिष्यों में कितने ही सुसंपन्न भी थे। वे पहुँचे तो इच्छापूर्ति के लिए वे सभी सहर्ष तैयार थे, पर पूछने पर उन सभी का उपार्जन न नीतिपूर्ण था, न उनका कमाया। अस्तु वे उन्हें लेने से इन्कार करते हुए आगे बढ़ते गए। अंत में उनका ऐसा शिष्य मिला जो प्रतापी भी था और राजा भी, पर उसके कोष में कुछ भी न था जो मिलता उसे तत्काल लोक-मंगल के कार्यों में खर्च कर देता। ऋषि को देने के लिए उसके पास आभूषण जैसी कोई वस्तु थी ही नहीं। निदान ऋषि खाली हाथों घर वापस लौटे और पत्नी को अनीति उपार्जित आभूषण पहनने की हठ छोड़ने के लिए सहमत कर लिया।
अखण्ड ज्योति अप्रैल 1987 पृष्ठ 18
एक ऐसे भविष्य वक्ता थे जो सब का सही भविष्य बताते थे। दो मित्र उनसे अपना भविष्य पूछने गए। एक से उन्हें कहा एक महीने बाद मृत्यु हो जायगी और दूसरे से कहा एक महीने बाद राजा बनोगे। दोनों बड़ा विश्वास लेकर घर लौट गए।
जिसे मरना था उसने अपने आप को सत्कर्मों में लगा दिया। पुण्य परमार्थ में निरत रहने लगा ताकि अगले जन्में काम आए। दूसरे ने सोचा जब कुछ ही दिन रात बनना है तो जो हाथ में है उसे मौज से क्यों न उड़ाएँ? व अहंभाव मदिरा पीने लगा।
महीना बीत गया। एक के पैर में चोट लगी और वह मरहम पट्टी से अच्छी हो गई। दूसरे का स्वर्ण मुद्राओं की थैली रास्ते पर पड़ी मिली। पर वह भी मदिरापान में खर्च हो गई। महीना बीतने पर भी वे ज्यों के त्यों थे। कारण पूछने के लिए भविष्यवक्ता के पास फिर दोनों गए।
उनने कहा- कर्म से प्रारब्ध बदल सकता है। पुण्यात्मा ने सत्कर्मरत होकर मृत्यु की विषमता को चोट के हलके रूप में बदल डाली और राज्य पाने वाले के मदिरापान ने उसे स्वर्ण मुद्राओं में घटाकर समाप्त कर लिया। भाग्य विधान है तो पर उसे कर्म द्वारा बदला भी जा सकता है।
अखण्ड ज्योति मार्च 1987 पृष्ठ 23
Ep:- 18/21 अंतःशक्ति जागृत करें | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया
सफाई और व्यवस्था का महत्व | Safai Aur Vyavastha Ka Mehtav
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 22 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
धर्म को हम छोड़ नहीं सकते,आध्यात्म को हम छोड़ नहीं सकते, क्योंकि इंसान को ऊंचा उठाने की क्षमता इसी क्षेत्र में है और किसी क्षेत्र में है ही नहीं। हम क्या कर सकते हैं इस गड्ढे में? जो दिक्कतें आएंगी, जो सार्थक है, उसे करेंगे। उसे क्यों करें? हम कहां जाएंगे? आप इसीलिए पहुंचना हमको यही पड़ेगा, जाना हमको यही पड़ेगा, आपको जाना है। भले से रंगमंच जो आज तक जिंदा है, तो क्या? और सो रहे हैं, तो क्या? बेवकूफ से भरा हुआ है, तो क्या? और भ्रष्ट है, तो क्या? जैसा भी कुछ है, आखिर जाना हमको यही पड़ेगा और सफाई भी हमको इसकी करनी पड़ेगी। और काम हमको इसी से लेना पड़ेगा। खदान में हीरे तो इसी में है, कोयला है, तो क्या? हम क्या करेंगे? हम जाएंगे जरूर, लेकिन आपको एक क्षेत्र स्वयं तलाश करना पड़ेगा, जहां शायद आपको निमंत्रण न मिलेगा और जहां इसकी जरूरत न समझी जाए। वह क्षेत्र कौन सा है? वह क्षेत्र बालकों का है, बालकों वाला क्षेत्र, स्कूलों वाले क्षेत्र में आपको स्वयं कोशिश करनी चाहिए, और आपको यह कोशिश करनी चाहिए कि आप को बच्चों में जाने का, उनके अभिभावकों के पास जाने का, और उनके अध्यापकों के पास जाने का मौका मिल जाए।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
कितने व्यक्ति चमत्कारी साधनाओं के विधान जानने और प्रगति में सहायता करने वाले आशीर्वाद पाने के इच्छुक रहते हैं। उन्हें हम सदा यही कहते रहे हैं कि माँगने मात्र से नहीं, पात्रता के अनुरूप ही कुछ मिलता है। चमत्कारी साधनाओं के विधान हमें मालूम है। बताने में भी कोई आपत्ति नहीं, पर वे सफल तभी हो सकेंगे, जब प्रयोग कर्ता केवल कर्मकाण्डों तक ही सीमित न रहकर अपनी भाव भूमिका को भी आध्यात्मिक बनायें। केवल विधान और कर्मकाण्ड कोई सिद्धी नहीं दे। सकते उनके पीछे साधक की उच्च मनोभूमि का होना आवश्यक है और उस प्रकार की भूमिका बनाने की अनिवार्य शर्त उदार, परोपकारी, स्वार्थ-त्यागी और सहृदय होना हैं।
जो कंजूस, अनुदार, निष्ठुर, स्वार्थी और धूर्त प्रकृति के हैं, उन्हें किसी उच्च स्तरीय आध्यात्मिक विभूति का लाभ नहीं मिल सकता। इसी प्रकार आशीर्वाद भी केवल वाणी से कह कर या लेखनी से लिखकर नहीं दिये जाते, उनके पीछे तप की पूँजी लगाई गई हो तभी वे वरदान सफल होंगे। तप की पूँजी हर किसी के लिए नहीं लगाई जा सकती। गाय अपने ही बछड़े को दूध पिलाती है। दूसरे बछड़ों के लिए उसके थन में दूध नहीं उतरता। आशीर्वाद भी अपने ही वर्ग और प्रकृति के लोगों के प्रति झरते हैं। केवल चालाकी और चापलूसी के आधार पर किसी का तप लूटते जाने की घात तो कदाचित ही किसी की लगती है।
इन तथ्यों के आधार पर हम अपने उन प्रियजनों को जो चमत्कारी विधानों की जानकारी तथा लाभकारी आशीर्वादों की उपलब्धि के इच्छुक रहते हैं, हमें एक ही बात समझानी पड़ती है कि वे इन दोनों सफलताओं को यदि वस्तुतः चाहते हों तो अपना आन्तरिक स्तर थोड़ा ऊँचा उठाये और यह ऊँचाई बढ़ सके, उसके लिए हम उन्हें ज्ञान-यज्ञ सरीखे पुनीत परमानों की साधना करने उनमें सक्रिय भाग लेने के लिए अनुरोध करते रहते हैं। लोक-मंगल परमार्थ और युग की पुकार पूरी करने का कर्तव्य पालन करने के लिए ही नहीं हमारा प्रस्तुत मार्ग-दर्शन आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होने के लिए आवश्यक पात्रता उत्पन्न करने की दृष्टि से भी इसकी नितान्त आवश्यकता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ 64
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