Wednesday 23, April 2025
हमारी इच्छाशक्ति प्रबल एवं प्रखर हो | Hamari Echhashakti Prabal Evam Prakhar Ho
गायत्री मंत्र का भावार्थ | Gaytri Mantra Ka Bhavarth
अमृत सन्देश:- दस सूत्री कार्यक्रम | Dash Sutri Karyakram
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ईश्वर प्राप्ति कठिन नहीं, सरल है, Eswar Prapti Kathin Nhi Saral Hai
यज्ञ से वातावरण और वायुमण्डल परिशोधन | Yagya Se Vatavaran Aur Vayumandal
भगवान हर जगह पर व्याप्त हैं | Bhagwan Har Jahag Par Vyapat Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 23 April 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!चरित्र का निर्माण और युग निर्माण आंदोलन
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
युग निर्माण आंदोलन से संबंध रखने वाले व्यक्तियों को या उसके संपर्क में आए हुए व्यक्तियों को ध्यान यह यह रखना चाहिए कि हम जो कार्य करने चले हैं वह स्थूल नहीं है सूक्ष्म है स्थूल क्रियाकलाप को केवल इसलिए हाथ में लेते रहते हैं समय-समय पर इस से सूक्ष्म भावना का परिपोषण हो हम वह काम नहीं कर सकते जो दूसरी संस्थाएं कर रही हैं स्कूल खोलने के लिए हमारे पास धन कहां है उद्योग धंधे फैलाने के लिए हमारे पास ज्ञान और बुद्धि कहां है ऐसे असंख्य काम है वैज्ञानिकों के जैसे प्रयोगशालायें हमारे पास कहां हैं कल कल कारखानें खड़े करने के लायक क्षमताएं हमारे पास कहां हैं हमारे पास जो कुछ भी चीज है वह यह है कि हम अपनी भावनाओं के द्वारा दूसरों की भावनाओं को प्रभावित करें यह सबसे मूल्यवान वस्तु है भावनाओं भावनाएं आदमी को महान बनाती हैं देवता बनाती हैं देवदूत बनाती हैं सूखी बनाती हैं लोकनायक बनाती हैं और जो कुछ भी बनाती है उसका सारा श्रेय भावनाओं का है भावनाओं का परिष्कार युग निर्माण आंदोलन का मूलभूत उद्देश्य है इसी के लिए बाहरी क्रियाकलाप हम कभी-कभी खड़ा कर देते हैं रचनात्मक कार्यक्रमों में अनेक बातें शामिल हैं इसमें विद्यालय की स्थापना शामिल है चिकित्सालय की स्थापना शामिल है अनेक कार्यक्रम शामिल हैं एक सहस्र कार्यक्रम शामिल हैं शामिल है वृक्षारोपण शामिल है न जाने क्या क्या शामिल है लेकिन वह शामिल केवल स्थूल है वह मूल नहीं है यह काम तो गवर्नमेंटें भी कर सकती हैं और कोई अच्छी गवर्नमेंट हो जो काम हमको हमारे कार्यकर्ताओं को करना पड़ रहा है उसको करने की कोई आवश्यकता ना हो उसमें सारे के सारे क्रियाकलाप जो देश और राष्ट्र को निर्माण करने वाले हैं गवर्नमेंटों के हाथ में हैं हम क्यों खोलें गवर्नमेंट क्यों ना खोलें हम विद्यालय क्यों खोलें गवर्नमेंट क्यों नहीं खोलें हम वृक्षारोपण क्यों करें गवर्नमेंट क्यों नहीं करें यह सारे के सारे काम जो हमको आज कल जनता स्तर पर करने पड़ रहे हैं यह गवर्नमेंटें भी कर सकती हैं लेकिन एक काम जो गवर्नमेंटे नहीं कर सकती जो हमको ही करना पड़ेगा हमको ही करना चाहिए और हम नहीं कर सकते हैं वह काम यह है कि भावनाओं का नवनिर्माण भावनाओं के नव निर्माण करने के लिए पूंजी जिस पूंजी की जरूरत है वह हमारा चरित्र बनना चाहिए हमारी भावनाएं उदात्त होनी चाहिए अगर हमारे पास चरित्र बल नहीं है और हमारे पास उदात्त भावनाएं नहीं है और हम आदर्शवादी नहीं हैं और हम उत्कृष्ट चरित्र नहीं हैं तो उन कार्यों को पूरा न कर सकेंगे जिस काम को करने के लिए युग निर्माण योजना ने यह कदम बढ़ाया है
पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरे की उपमा पा लेता है। यों उसका अनगढ़ प्रयोग करने वाले अँगीठी में जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पूर्व ही विषैली गैस के कारण मर चुके होते हैैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, रांगा, सीसा, अभ्रक जैसे सामान्य खनिजों काबजारू मूल्य तुच्छ होता है, पर उन्हें जब भस्म रासायन बनाकर ग्रहण किया जाता है, तो वे संजीवनी बूटी का काम करते और मंहगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब डिस्टिल्ड वाटर बना लिया जाता है, तब उसकी गणना औषधियों में होती है, उसे कई रासायनिक क्रियाओं एवं सम्मिश्रणों में प्रयुक्त किया जाता है।
मानव समुदाय पर भी यही बात लागू होती है। वे भी यों तो गलीकूचों में भीड़ लगाते और गंदगी फैलाते देखे जाते हैं, पर उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान् बना लिया जाता है, तो फिर वे ऋषि- देवता कहाते और अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है। हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के रूप में ही है।
कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है, जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जन्म- जन्मान्तरों के संस्कारों की अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं,पर जो उन्हें कुरेदता- उभारता है, वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊंचा उठते हुए महामानव का पद पाता है।
अपना परिशोधन, तप- प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उत्पादनों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं, जिन्हें पार करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुंजायश नहीं।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरे की उपमा पा लेता है। यों उसका अनगढ़ प्रयोग करने वाले अँगीठी में जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पूर्व ही विषैली गैस के कारण मर चुके होते हैैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, रांगा, सीसा, अभ्रक जैसे सामान्य खनिजों काबजारू मूल्य तुच्छ होता है, पर उन्हें जब भस्म रासायन बनाकर ग्रहण किया जाता है, तो वे संजीवनी बूटी का काम करते और मंहगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब डिस्टिल्ड वाटर बना लिया जाता है, तब उसकी गणना औषधियों में होती है, उसे कई रासायनिक क्रियाओं एवं सम्मिश्रणों में प्रयुक्त किया जाता है।
मानव समुदाय पर भी यही बात लागू होती है। वे भी यों तो गलीकूचों में भीड़ लगाते और गंदगी फैलाते देखे जाते हैं, पर उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान् बना लिया जाता है, तो फिर वे ऋषि- देवता कहाते और अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है। हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के रूप में ही है।
कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है, जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जन्म- जन्मान्तरों के संस्कारों की अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं,पर जो उन्हें कुरेदता- उभारता है, वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊंचा उठते हुए महामानव का पद पाता है।
अपना परिशोधन, तप- प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उत्पादनों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं, जिन्हें पार करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुंजायश नहीं।
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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