Wednesday 25, December 2024
मृत वर्षा रसानुभूति ध्यान साधना | Amrit Varsha Rasanubhuti Dhyan Sadhna
कुण्डलिनी ध्यान: शक्ति केंद्रों को जागृत करने की विधि | Kundalini Jagran
स्वभाव और संस्कार की महत्ता | Swabhav Aur Sanskar Ki Mehtta
साधना क्या है । Sadhana Kya Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 25 December 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
यह हमारे साहित्य जो कुछ भी हमने लिखा है उसमें हमारी जीवात्मा जुड़ी हुई है हमारा प्राण जुड़ा हुआ है हमारा अनुभव जुड़ा हुआ है और हमारा चिंतन और हमारा चरित्र जुड़ा हुआ है उसको हमने जीवन में उतारा है तब लोगों से कहा है जो जीवन में उतारा है उसको लोगों से आप कहेंगे तो उसका असर जरूर पड़ेगा वेश्याएं अपने जीवन में सैकड़ों भड़वे पैदा कर लेती हैं शराबी अपने जीवन में बीसियों को शराबी बना देता है जुआँरी अपने साथ में बीसियों को जुआँरी बना देता है क्यों इसीलिए बना देता है कि उसका जीवन में क्रिया और उसके विचार दोनों मिले हुए हैं क्रिया और विचार जिसके यहां मिले हुए नहीं होगें उसका बे असर पड़ेगा हमारा अध्यात्म और नए युग की नई प्रेरणाएं चेतनाएं किस तरीके से दी जानी चाहिए लोगों से क्या कहा जाना चाहिए वह हमने जीवन में उतारा हैं आपने भी उतारा है आपने तो नहीं उतारा है पर हमने तो उतारा है, हमने उतारा है |
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
किसान का उदाहरण ऊपर दिया गया है इन्हीं गतिविधियों को प्रत्येक महत्वपूर्ण सफलताएं पाने वाला व्यक्ति अपनाता है। विद्वान को विद्या की प्राप्ति चुटकी बजाने भर से—किसी जादू मन्त्र से नहीं हो जाती। इसके लिए उसे पाँच वर्ष की आयु से अध्ययन साधना का शुभारम्भ करना पड़ता है और स्कूल के घण्टे तथा घर पर अभ्यास का समय मिलाकर प्रतिदिन लगभग छह घण्टे का मानसिक श्रम करना पड़ता है।
इस श्रम में जितनी एकाग्रता, अभिरुचि तथा तन्मयता होती है, उसी अनुपात से प्रगति होती है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होना इसी मनोयोग तथा उत्साहपूर्ण परिश्रम पर अवलम्बित रहता है। विद्वान समझा जाने वाला व्यक्ति बालकपन से आरम्भ किये अध्ययन क्रम को स्नातक बन जाने पर भी समाप्त करके चुप नहीं बैठा है, वरन् अपनी रुचि के विषयों को पढ़ने के लिए अनेकानेक ग्रन्थों को घण्टों तक पढ़ते रहने का स्वभाव बनाये रहा है।
आज वह विद्वान समझे जाने पर भी अध्ययन से विरत नहीं हुआ है। उसकी रुचि घटी नहीं है। इस ज्ञान साधना से यों उसे धन भी मिलता है और सम्मान भी। पर इससे बड़ी उपलब्धि है उसका आत्म−सन्तोष। ‘स्वान्तः सुखाय’ उद्देश्य को ध्यान में रखकर वह भले−बुरे दिनों में—हारी−बीमारी में भी—अन्तः प्रेरणा से किसी न किसी प्रकार पढ़ने के लिए समय निकालता रहता है। इसके बिना उसे अन्तःतृप्ति ही नहीं मिलती। आत्म−साधक की मनःस्थिति भी यही होनी चाहिए। उसे सिद्धि के लिए लालायित रहकर अपनी तन्मयता में व्यवधान उत्पन्न नहीं करना चाहिए वरन् साधना को किसी अध्ययन प्रिय की तरह ‘स्वान्तः सुखाय’ ही अपनाना चाहिए। परिणाम तो हर भले−बुरे कर्म का होता है फिर कोई कारण नहीं कि आत्म−साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।
व्यायामशाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मनःस्थिति और गतिविधि का यदि गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो आत्म साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चित नहीं हो जाता वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम ब्रह्मचर्य की, तेल मालिश की, उपयुक्त दिनचर्या की, प्रसन्नता निश्चिन्तता की भी व्यवस्था करता है।
यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाय और मात्र दंड बैठकों को ही जादू की छड़ी मान लिया जाय तो सफलता दूर की चीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता। चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 13
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