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Monday 28, April 2025

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Ep:-07 आप आत्मोन्नति की ओर अधिक ध्यान रखें

Ep:-07 आप आत्मोन्नति की ओर अधिक ध्यान रखें

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आहार, संयम और अन्नमय कोश का जागरण | Aahar Sanyam Aur Annamay Kosh Ka Jagran

आहार, संयम और अन्नमय कोश का जागरण | Aahar Sanyam Aur Annamay Kosh Ka Jagran

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गायत्री मन्त्र का अर्थ |Gayatri Mantra Ka Arth

गायत्री मन्त्र का अर्थ |Gayatri Mantra Ka Arth

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!!ऑस्ट्रेलिया में डॉ. चिन्मय पंड्या जी के सघन जनसंपर्क अभियान से विस्तारित आत्मीयता का संदेश !!

!!ऑस्ट्रेलिया में डॉ. चिन्मय पंड्या जी के सघन जनसंपर्क अभियान से विस्तारित आत्मीयता का संदेश !!

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ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में युवा प्रोफेशनल्स संग डॉ. चिन्मय पंड्या जी का आत्मीय संवाद

ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में युवा प्रोफेशनल्स संग डॉ. चिन्मय पंड्या जी का आत्मीय संवाद

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मन को अस्वस्थ न रहने दिया जाए | Man ko Aswasth Na Rehne Diya Jaye

मन को अस्वस्थ न रहने दिया जाए | Man ko Aswasth Na Rehne Diya Jaye

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ब्रह्मविद्या का प्रचार प्रसार फिर से होना चाहिए | Bhramahavidya Ka Prachar Prasar Phir Se Hona Chahiye

ब्रह्मविद्या का प्रचार प्रसार फिर से होना चाहिए | Bhramahavidya Ka Prachar Prasar Phir Se Hona Chahiye

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संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | Dr Chinmay Pandya

संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | Dr Chinmay Pandya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 28 April 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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Reel_1 ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जीवन 1.mp4

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान की कृपा खाई नहीं जा सकती। भगवान की कृपा के आधार पर मैं लोगों से बताता रहता हूँ, भाई, तुम्हें भगवान की कृपा से फायदा कराना हो तो इसकी अपेक्षा तो ये अच्छा है कि तुम नौकरी कर लो, धंधा कर लो। नहीं साहब, उसमें कम फायदा होता है। तो बेटे, चोरी कर ले। चल, चोरी करेगा, छह महीने की सजा तो हो जाएगी, तुझसे पिण्ड तो छूटेगा। भगवान की कृपा से ले करके नहीं। बेटा, भगवान की कृपा से लिया हुआ जो है, नहीं साहब, परमार्थ के लिए होता है, लोकहित के लिए होता है। उससे जो मिलती है, उससे भगवान की कृपा से सुख नहीं मिला है, शांति मिली है। हर एक को सुख नहीं मिला है, किसी को शांति मिली है। सुख किसी को नहीं मिला है, शांति मिली है। ये शांति की जरूरत हो तो भगवान की कृपा के चक्कर में फंस और तुझे सुख की जरूरत हो तो भगवान से दूर रह। भगवान से दूर रह। भगवान से दूर रहने वालों को जितने भी तेरे पास सुख दिखाई पड़ते हैं, हर आदमी सांसारिक दृष्टि से हर आदमी गरीब दिखाई पड़ते हैं, कंगाल दिखाई पड़ते हैं। तो महाराज जी, कंगाल कर देते। हाँ, नहीं बेटे, कंगाल नहीं कर देता, पर ये बात है कि क्योंकि मन इतने उदार हो जाते हैं कि वो खा नहीं सकते, खिला सकते हैं। खा नहीं सकते, खिला के रहते हैं।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर को 500 रुपये महीने की नौकरी मिलती थी। 500 रुपये महीने में से जब 500 रुपये सामने आते तो उनको वो अपनी जिंदगी के दृश्य खड़े हो जाते कि हम आखों के, हमको बिजली की अभाव में, रोशनी के अभाव में, सड़क के किनारे खड़ा होना पड़ता था। सड़क के किनारे वाली जो बत्तियाँ जलती हैं, उसके नीचे से किताब पढ़नी पड़ती थी। तो सारे विद्यार्थी जो सड़क के किनारे खड़े होते थे, आ के आगे खड़े हो जाते थे। पिता जी, आपको तो 500 रुपये तनख्वाह मिलती है, 500 रुपये तनख्वाह मिलती है, 500 रुपये तनख्वाह मिलती है। तो देखिए, जब आप पढ़ा करते थे और आपके पास चार आने महीने अगर होते तो आप देखिए, मिट्टी के तेल की बत्ती लेकर के अपने घर पे पढ़ सकते थे। चार आने महीने का आपके पास इंतजाम नहीं था। हाँ बेटे, नहीं था हमारे पास, इसीलिए तो आप सड़क पर पढ़ते थे। हाँ, सड़क पर पढ़ते थे। तो हमारी भी वही हालत है। आज आप हमको मदद नहीं कर सकते, उसमें से बच्चे आ करके सामने उनके खड़े हो जाते और ये कहते कि हमारी मदद कीजिए, हमारी मदद कीजिए।

बस, ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने निश्चय कर लिया था, हम 50 रुपये महीने से अपना गुजारा करेंगे और 450 रुपये महीना उन लोगों के लिए सुरक्षित रखेंगे जिनको, जिनको फीस की जरूरत है, जिनको किताबों की जरूरत है, जिनको दूसरी चीजों की जरूरत है। हजारों आदमी आ करके लाभ उठाते रहते और अपने 50 रुपये में अपना गुजारा करते रहते हैं। महाराज जी, ये तो गरीब है, अमीर तो नहीं बना। नहीं बेटे, अमीर नहीं बना सकता। संत अमीर नहीं हो सकते। भगवान के भक्त के हिस्से में अमीरी नहीं आई है। अमीर, अमीर बना तो सकता है, पर स्वयं अमीर नहीं हो सकता।

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अखण्ड-ज्योति से



अयोग्य विद्यार्थी का न तो कोई वर्तमान होता है और न भविष्य। वह निकम्मा, चाहे दुःख हो, चाहे प्रसन्न कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस प्रकार पतन द्वारा पाई असफलता तो दुःख का हेतु है, किन्तु पुरुषार्थ से अलंकृत प्रयत्न की असफलता दुःख खेद का नहीं, चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।

 प्रायः आर्थिक उतार लोगों को बहुत दुःखी बना देता है। जिसका लंबा−चौड़ा व्यापार चलता हो। लाखों रुपये वर्ष की आमदनी होती हो, सहसा उसका रोजगार ठप हो जाए, कोई लंबा घाटा पड़ जाए, हैसियत, बिगड़ जाए और वह असाधारण से साधारण स्थिति में आ गिरे तो वह अवश्य ही दुःखी और शोक−ग्रस्त रहने लगेगा। फिर भी इस आर्थिक उतार का शोक करना उचित नहीं। क्योंकि शोक करने से स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। यदि शोक करने और दुःखी रहने से स्थिति में सुधार की आशा हो तो एक बार शोक करना और दुःखी रहना उस स्थिति में किसी हद तक उचित कहा जा सकता है। किन्तु यह सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विपन्नता का उपचार दुःखी रहना नहीं, बल्कि उत्साहपूर्वक पुरुषार्थ करना ही है। तथापि लोग उल्टा आचरण करते हैं। यह कम खेद की बात नहीं है।
    
 सम्पन्नता से विपन्नता में आ जाने पर लोग क्यों दुःखी रहते हैं? इसके अनेक कारण होते हैं। इसका एक कारण तो है अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करना। दूसरा कारण है दूसरों की संपन्न स्थिति को सामने रखकर अपनी स्थिति देखना। तीसरा कारण है, सामाजिक अप्रतिष्ठा की आशंका करना चौथा कारण है लज्जा और आत्म−हीनता का भाव रखना। और पाँचवाँ कारण है, विगत वैभव का व्यामोह। यह और इसी प्रकार के अन्य कारणोंवश लोग अपने आर्थिक उतार पर दुःखी और शोकग्रस्त रहा करते हैं। किन्तु यदि इन कारणों पर गहराई से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इन कारणों को सामने रखकर अपनी विपन्नता पर शोक करना बड़ी हल्की और निरर्थक बात है। इनमें से कोई कारण तो ऐसा नहीं, जिसे शोक का उचित सम्पादक माना जा सके।

.... क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56

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