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Saturday 28, December 2024

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आपके प्रति यदि किसी का व्यवहार अनुचित प्रतीत होता है तो यह मानने के पहले कि सारा दोष उसी का है, आप अपने पर भी विचार कर लिया करें। दूसरों पर दोषारोपण करने का आधा कारण तो स्वयमेव समाप्त हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी की छोटी-सी भूल या अस्त-व्यस्तता पर आप मुस्करा देते हैं या व्यंगपूर्वक कुछ उपहास कर देते हैं। आपकी इस क्रिया से सामने वाले व्यक्ति के स्वाभिमान पर चोट लगना स्वाभाविक है।

अपनी प्रशंसा सभी को प्यारी लगती है पर व्यंग या आलोचना हर किसी को अप्रिय है। कोई नहीं चाहता कि अकारण लोग उसका उपहास करें, मजाक उड़ायें। फिर आपके अप्रिय व्यवहार के कारण यदि औरों से अपशब्द, कटुता या तिरस्कार मिलता है तो उस अकेले का ही दोष नहीं। इसमें अपराधी आप भी हैं। आपने ही प्रारम्भ में इस स्थिति को जन्म दिया है। इसलिये दूसरों से प्रतिकार की भावना बनाने के पूर्व यदि अपना भी दोष-दर्शन कर लिया करें तो अकारण उत्पन्न होने वाले झगड़े जो कि प्रायः इसी से अधिक होते हैं, क्यों हों?

*अगर किसी को अपनी बात मनवानी ही है अथवा यह पूर्ण रूप से जान लिया गया है कि अमुक कार्य में इस व्यक्ति का अहित है, आप उसे छुड़ाना चाहते हैं तो भी अशिष्ट या कटु-व्यवहार का आश्रय लेना ठीक नहीं। यदि वह व्यक्ति आपके तर्क या सिद्धान्त को नहीं मानता तो आप उसे अयोग्य, मूर्ख या दुष्ट समझने लगते हैं और अनजाने ही ऐसा कुछ कह या कर बैठते हैं जो उसे बुरा लगे। इससे दूसरे के आत्माभिमान को चोट लगती है, जिसकी प्रतिक्रिया भी कटु होती है। उससे कलह बढ़ने की ही सम्भावना अधिक रहेगी।*

....क्रमशः जारी*
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
 अखण्ड ज्योति जुलाई 1964 पृष्ठ 40*

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स्वाध्याय में प्रमाद न करो।* *बिना अध्ययन के मानसिक विकास संभव नहीं।*

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*"प्राण संकट में धर्म का पालन और मर्यादाओं का महत्व"*

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गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना | Gurudev Daya Karke Mujhko Apna Lena

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गायत्री माता आरती एवं गायत्री चालीसा Shantikunj | Mata Aarti & Gayatri Chalisa

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धार्मिक जीवन और शिक्षण की योजना | Dharmik Jivan Aur Sikshan Ki Yojna

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गायत्री साधना | Gayatri Sadhna

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 28 December 2024 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



घर के लिए पुस्तकालय रखिए आप अपने बच्चों के लिए अमानत छोड़कर जाइए जेवर नहीं है जेवर है आपके पास नहीं साहब जेवर तो नहीं है तो आप अपने बच्चों को क्या देंगे जेवर नहीं है तो खेत हैं आपके पास हां खेत हैं मत दीजिए खेत लेकिन  आप हमारे साहित्य पढ़ाइए साहित्य अगर आपने पढ़ाया तो आपके बच्चे अब्राहिम लिंकन भी बन सकते हैं जार्ज वाशिंगटन भी बन सकते हैं और जाने कौन कौन बन सकते हैं इस तरीके से यह साहित्य जो पढ़ने के लायक है आज हमको आपको कहना था कि आपको क्या करना चाहिए अपने समय का एक हिस्सा और अपने श्रम का एक हिस्सा अपने समय का एक हिस्सा साधनों का एक हिस्सा हमको दीजिए हमारा भी कुछ हक हमारे गुरु का कुछ हक है हमारे ऊपर उसने कहा हमको चाहिए तेरा हमने कहा लीजिए हमने दिया हमको चाहिए आपका हमको समय चाहिए आपका हमको वक्त चाहिए आपका हमको पैसा चाहिए आपका हमको श्रम चाहिए आपका हमको पसीना चाहिए आपका हमको हमसे मतलब है समाज को ऋषियों को मानवीय गरिमा को इंसान के दुख और दर्दों को आपकी श्रम की जरूरत है 

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



सधाने से सामान्य स्तर के प्राणी आश्चर्यजनक कार्य करके दिखाते हैं। बन गये मनुष्य को पास भी नहीं आने देतीं ओर खेतों को उजाड़ कर रख जाती हैं, पर जब वे पालतू हो जाती हैं तो दूध, बछड़े गोबर आदि बहुत कुछ देती हैं। स्वयं सुखी रहती है और उसके पालने वाले भी लाभान्वित होते हैं यही बात अन्य वन्य पशुओं के बारे में लागू होती है।

जंगली घोड़े, कुत्ते, सुअर, हाथी आदि स्वयं भूखे मरते, कष्ट उठाते और अनिश्चित जीवन जीते हैं। फालतू बन जाने पर वे स्वयं निश्चिन्ततापूर्वक रहते हैं और अपने पालने वालों को लाभ पहुँचाते हैं। अपने भीतर शरीर तथा मन− क्षेत्र में एक से एक बढ़कर शक्तिशाली धाराएँ प्रवाहित होती हैं।

वे निरुद्देश्य और अनियन्त्रित स्थिति में रहकर वन्य पशुओं जैसी असंगत बनी रहती हैं। फलतः विकृत होकर वे सड़ी दुर्गन्ध की तरह अपने समूचे प्रभाव क्षेत्र को विषैला बना देती हैं। आग जहाँ भी रहती है वहीं जलाती है, तेजाब की बोतल जहाँ भी फैलती है वहीं गलाती है। विकृत प्रवृत्तियाँ छितराई हुई आग और फूटी तेजाब की बोतल की तरह हैं, उनसे केवल विनाश ही सम्भव होता है। यह दोनों ही वस्तुएँ यदि सुनियोजित रखी जा सकें तो उनसे उपयोगी लाभ मिलते हैं और वे इतने बढ़े−बढ़े होते हैं कि सामान्य दीखने वाला मनुष्य पग−पग पर अपनी असामान्य स्थिति का परिचय देता है।

साधना जीवन के बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों में सुसंस्कारित सुव्यवस्था उत्पन्न करने का नाम है। इसे समझ पाने और कर पाने का प्रतिफल, जंगली जानवरों को पकड़ कर पालतू बनाने की कला में प्रवीण व्यवसाइयों जैसा ही प्राप्त होता।

सरकस के जानवर कितने आश्चर्यजनक करतब दिखाते हैं। देखने वाले बाग−बाग हो उठते हैं। इन बंधे जानवरों को प्रशंसा मिलती है—प्रतिष्ठा होती है और अच्छी खुराक मिलती है। सधाने वाले और सिखाने वालों को अच्छा वेतन मिलता है और सरकस के मालिकों को उन्हीं जानवरों के सहारे धनवान बनने का अवसर मिलता है जो उच्छृंखल होने की स्थिति में स्वयं असन्तुष्ट रहते और दूसरों को रुष्ट करते थे।

.... क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 15

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