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Monday 15, June 2026

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शान्तिकुंज में सप्त ऋषियों की स्थापना कैसे हुई | Shantikunj Me Sapt Rishi Ki Sthapna Kaise Hui

शान्तिकुंज में सप्त ऋषियों की स्थापना कैसे हुई | Shantikunj Me Sapt Rishi Ki Sthapna Kaise Hui

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कर्तव्य क्यों जरूरी है ? Kartavya Kyon Zaroori Hai? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

कर्तव्य क्यों जरूरी है ? Kartavya Kyon Zaroori Hai? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 15 June 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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जल्दी सोएँ, जल्दी जागें — यही श्रेष्ठ जीवन का सरल सूत्र है।

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान का नाम लेना और आत्मा को खुराक देना हर एक के लिए आवश्यक है स्वाध्याय इसके लिए कितना उपयोगी हो सकता है और भजन और पूजन और और उपासनाएँ कितनी उपयोगी हो सकती है ये  सारे के सारे कामों के लिए प्रातःकाल का समय उपयोगी है लेकिन उपयोगी ये तभी मिल सकता है जब उस समय सोया नहीं जाए और उस समय जल्दी जगा जाए इसके लिए यह आवश्यक है कि  जल्दी सोया जाए अथवा अर्थात अगर कोई आदमी विलम्ब से सोएगा और जल्दी उठेगा तो बीमार पड़ेगा इसलिए जहां आप जल्दी जगने की आदत को डालना जरूरी है  वहां यह आदत भी डालना जरूरी है कि जल्दी हम लोग सोए जैन धर्म में इसीलिए रात में लोग जल्दी रोटी खा लेते हैं ताकि जल्दी पेट भर जाए तो जल्दी नींद आ जाए यह जैन धर्म का उतना ही सम्मत है कि इस कारण से भी रखा गया हो हम जल्दी सोए और जल्दी रोटी खाए जल्दी उठ जाए जल्दी उठना और जल्दी सोना निसंदेह जीवन को स्वस्थ बनाता है समर्थ बनाता है आदमी  को बुद्धिमान बनाता है यह लाभ हम स्वयं को और अपने परिवार को और अपने पड़ोसी को दे सकते हैं

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अखण्ड-ज्योति से




एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।

नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ, वे उसके वैभव की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। उन्होंने उससे पूछा कि वृक्ष राज तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?

सेमर के वृक्ष ने हंसते हुए ऋषि के प्रश्न का उत्तर दिया कि- “भगवान्! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।” नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।

सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्प वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए। पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी तूफान की तरह चल दिया।

सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ा डाले और डेढ़ की तरह खड़ा हो गया। पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ढूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों का त्यों हरा भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सेमर से पूछा- पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो, इसका क्या रहस्य है?

वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक निवेदन किया- ऋषिराज! मेरे पास इतना वैभव है पर मैं इसके मोह में बँधा हुआ नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए इतने पत्तों को धारण किये हुए हूँ, परन्तु जब जरूरत समझता हूँ इस सारे वैभव को बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता हूँ और ठूँठ बन जाता हूँ। मुझे वैभव का गर्व नहीं था वरन् अपने ठूँठ होने का अभिमान था इसीलिए मैंने पवन की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य को अधिक बताया था। आप देख रहे हैं कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ हूँ।

नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है। यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले कर्मयोगी साधु के लिए घर ही तपोभूमि है।

अखण्ड ज्योति फरवरी 1943

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