Wednesday 20, May 2026
बुराई से लड़ो, इंसान से नहीं। Burai Se Lado, Insaan Se Nahi. अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- आत्मीयता पूर्ण विदाई भाग-2 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 20 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
क्या घर छोड़ देना ही अध्यात्म हैं ? Kya Ghar Chhod Dena hi Adhyatma Hai? अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
परिवार शब्द इतना शानदार है जिसके साथ में विश्व की समस्याएं जुड़ी हुई हैं इससे मानवीय समस्याओं के सारे के सारे समाधान जुड़े हुए हैं इतना महत्वपूर्ण शब्द है आप तो इसको छोटा वाला कहते थे आप तो यह कहते थे घर परिवारों से निश्चिंत हो जाएंगे घर परिवार को छोड़ देंगे जब ऐसी ऐसी बात कहते हैं तो मुझे बहुत नाराजगी होती है कोई-कोई आते हैं गुस्सा में लोगों का घूंट पीकर के रह जाता हूं पर मैं कुछ कहता नहीं हूं साहब आप घर से निवृत हुए और घर का जंजाल छूटा और आपकी शरण में आए हमारी शरण में आएगा तो बेवकूफ हमारे यहां उससे भी बड़ा परिवार तेरे ऊपर हावी हो जाएगा तेरे परिवार में कै आदमी है भाई साहब दो लड़कियां हैं और एक मां है और एक बहन है पाँच आदमी है पांच के ब्याह कर दो और सब से छुट्टी हो जाऊं काम दिला दूं फिर मैं निश्चिंत हो जाऊंगा फिर करेगा क्या निश्चिंत होकर निश्चिंत होकर आप की शरण में आ जाएगा हमारी शरण में आ जाएगा फिर यहां क्या करेगा यहां क्या करेगा यहां क्या समझता है तू यहां बाबाजी रहते हैं यहां अखाड़े बाज रहते हैं यहां यहां कौन रहता है यहां बता दे जरा हमारे पास आएगा तो क्या करेगा फिर नहीं साहब सबसे निवृता करके भगवान की भक्ति करूंगा और गुरु का चेला गुरु का चरण दाबूंगा और साधना करूंगा मारे डंडों के मारे भगा देंगे बहनचोद बेईमान कहीं का भाग करके आया यहां भगोड़ा भगोड़े को हमारे यहां कोई जगह नहीं है परिवार को छोड़कर आएगा नहीं साहब भाग करके आ जाएंगे आज आएंगे भागकर भगोड़े के लिए कहीं जगह होती है भगोड़े के लिए भगोड़े के लिए कोई जगह नहीं होती
अखण्ड-ज्योति से
आदर्शवादी बीजारोपणों की संकल्प और साहस का खाद पानी मिले तो उनके उगने, लहराने और देखते-देखते पुष्पित फलित होने में फिर कोई कठिनाई शेष न रहे। संकट परिस्थितिजन्य नहीं, मनःस्थिति में घुसी हुई कृपणता का है। चोर पकड़ा और हटाया जा सके तो समझना चाहिए कि प्रज्ञा परिजनों में से हर किसी को बहुत कुछ कर गुजरने का सुयोग सौभाग्य उपलब्ध हो गया।
श्रम, समय की इन दिनों महती आवश्यकता है। जन-जागरण के लिए जन-संपर्क साधने और युग चेतना से अवगत कराने वाले प्रयास आरम्भ करने होंगे। यह बन पड़े तो जन समर्थन और जन सहयोग की कहीं कोई कमी न रहेगी। बीमा एजेण्टों और वोट बटोरने वालों जैसी ललक हो तो जन-संपर्क में निकलने में लगने वाले संकोच, असमंजस देखते-देखते हवा में उड़ जायेंगे। कथनी और करनी का समन्वय ही प्रज्ञा अभियान की गतिविधियों को आगे बढ़ाता है। परामर्श देने से ही छुटकारा नहीं मिलता कुछ ऐसी भी करना पड़ता है, जिसमें समय लगे और पसीना बहे। ज्ञान रथ चलाने, स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाने जैसे प्रारम्भिक काम तक जब श्रम माँगते हैं तो उन बड़े कामों के लिए तो और भी बड़े प्रयास परिश्रम की आवश्यकता पड़ेगी।
लगन हो तो हममें से अधिकाँश की वह स्थिति है कि स्वाध्याय और सत्संग को सर्वसुलभ बनाने वाले उपरोक्त तीनों उपकरणों को अपने एकाकी बलबूते अपने संपर्क क्षेत्र में चलाते और उत्साहवर्धक आलोक वितरण करते रह सकें। बात एक कदम और आगे बढ़े तो शिक्षा प्रचार, हरितम् संवर्धन, स्वच्छता अभियान जैसे कितने ही सेवा कार्यों में कुछेक घनिष्ठ साथियों को लेकर जुटा जा सकता है। स्वयं संकल्प पूर्व आगे बढ़ने पर सहयोगी अनुयायियों की कभी कमी नहीं पड़ती। इंजन दौड़ेगा तो डिब्बे भी पीछे-पीछे घिसटते चलेंगे ही। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत असंख्यों प्रचारात्मक, सुधारात्मक और रचनात्मक कार्यक्रम हैं जिनमें से योग्यता और सुविधा के अनुरूप स्थानीय परिस्थितियों-आवश्यकताओं के अनुसार कुछ भी चुना जा सकता है। लक्ष्य एक ही है-लोकमानस का परिष्कार। सुविधा संवर्धन से अधिक महत्व इन दिनों विचार परिवर्तन को दिया जाना है। यह तथ्य हम में से किसी को भी भुला नहीं देना चाहिए।
जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हैं। जिनके पास गुजारे के साधन हैं वे परिव्राजकों की भूमिका निभा सकते हैं अपने समय को पुरातन वानप्रस्थों की तरह लोक मंगल के लिए लगा सकते हैं। इसमें निकटवर्ती प्रज्ञापीठों के माध्यम से सुव्यवस्थित कार्य करना अधिक सरल और सफल हो सकता है। एक वर्ष का वानप्रस्थ लेकर जन जागरण की तीर्थयात्रा पर निकल पड़ना अपने आप में एक मनोरंजक, अनुभव सम्पादन, तप साधन एवं उच्चस्तरीय पुण्य परमार्थ है। साइकिलों पर तीर्थयात्रा और ढपली पर युग गायन के लिए निकलने वाली दो-दो की टोलियाँ जो काम कर सकती हैं, उसका मूल्याँकन असाधारण या अद्भुत के रूप में ही कहा जा सकता है। जिनसे बाहर जाना न बन पड़े वे अपने समीपवर्ती क्षेत्र में ही नित्य दो घण्टे लगाकर प्रज्ञा अभियान के निर्धारित कार्यक्रमों में हाथ बँटाते रह सकते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर
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