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Thursday 14, May 2026

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अमृतवाणी:- करिष्ये वचनं तव भाग 02 | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

अमृतवाणी:- करिष्ये वचनं तव भाग 02 | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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अमृत सन्देश:- प्रेम से दुनिया बदलती है । Power of Love

अमृत सन्देश:- प्रेम से दुनिया बदलती है । Power of Love

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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लेख
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार14 May 2026!

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!! शांतिकुंज दर्शन 14 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार14 May 2026!

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भगवान को क्या चाहिए? Bhagwan ko kya chahiye? अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान से हमने बातचीत की थी 1 दिन और हमने यह पूछा उनसे क्यों साहब आपका क्या ख्याल है दुनिया वालों का यह ख्याल है कि पूजा करने वालों से आप प्रसन्न हो जाते हैं और आप सुपारी खिलाने वालों पर आप खुश हो जाते हैं आप नारियल चलाने वालों पर आप खुश हो जाते हैं आप आरती उतारने वालों पर आप खुश हो जाते हैं आप स्रोत पाठ करने वालों पर खुश हो जाते हैं मैंने एक बार भगवान जी से पूछा भगवान जी बहुत नाराज हुए और झल्ला पड़े आप तो आप तो गुरु जी पढ़े लिखे आदमी हम हम तो पढ़े लिखे आदमी आप तो पढ़े लिखे आदमी हैं तो आप ऐसी बेहूदा बातों पर यकीन करते हैं हम ऐसे जलील हो सकते हैं हम ऐसे कमीने हो सकते हैं हम ऐसे घटिया हो सकते हैं छोटी-छोटी चीजों का उपहार लेकर के और छोटी-छोटी प्रशंसा करा कर के लोगों के उल्लू सीधा करेंगे हमें ऐसे आप कमीने मानते हैं नहीं नहीं हम तो नहीं मानते तो कौन मानते हैं चेले हमारे मानते हैं चेलों की पिटाई करो मारो चेलों को जो भगवान के ऊपर ऐसे लांछन और इल्जाम लगाते हैं कैसे वाले कि आप स्रोत पाठ कर लीजिए चावल चढ़ा दीजिए धूपबत्ती चढ़ा दीजिए नारियल चढ़ा दीजिए आरती उतार दीजिए और हम आपकी मनोकामना पूरी कर देंगे इतना जलील समझते हैं भगवान को खबरदार भगवान के सामने ऐसी बेहूदी बातें की तो आपकी बेहूदगी आपको मुबारक हो और आपका कमीनापन आपको मुबारक हो और आपकी छोटी दृष्टि आपको मुबारक हो लेकिन अध्यात्म का इन सिद्धांतों से कतई कोई ताल्लुक नहीं है

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अखण्ड-ज्योति से



चलते समय काफिला इतना लम्बा, किन्तु मंजिल तक पहुँचने का समय आने तक साथ में उँगलियों पर गिनने जितने। इसे असफलता कहा जाय? दुर्भाग्य? विधि की विडम्बना? अथवा उस मिट्टी को दोष दिया जाय जिससे यात्रियों की कतार तो गढ़ी थी, पर इतनी अनपढ़ की उसकी संरचना दो कदम चलते−चलते यातावरों की तरह भटकी और मृग तृष्णा की आकुलता में दिग्भ्रान्त होकर कहीं से कहीं चली गयी।

आत्म−सत्ता का वजन भारी, जिम्मेदारी बड़ी, सृष्टा की अपेक्षा ऊँची−समय की गरिमा अनुपम, इतना सब होते हुए भी यह क्षुद्रता कैसी जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर भव−बन्धन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है? या मकड़ी का जाला? कुछ ठीक से समझ में नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है, इस विषम बेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे हैं? उनके मुख क्यों सूख रहे हैं? पसीने क्यों छूट रहे हैं? सिद्धान्तवाद क्या कथा गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी कोई अवसर ही न आये? कृष्ण झुँझला पड़े थे। कथनी और करनी के मध्य इतना असाधारण व्यतिरेक उन्हें सहन नहीं हुआ और भौंहें तरेरते हुये बोले–”कुतस्त्वा कश्मलमिंद विषमे समुपस्थितम्” अभागे! इस विषम बेला में यह कृपणता तेरे मन−मस्तक पर किस प्रकार चढ़ बैठी? अन्तरिक्ष से आज का महाकाल युग के गाण्डीवधारियों से लगभग उसी भाषा में प्रश्न पूछता और उत्तर माँगता है।

मनुष्यों में एक श्रेणी नर पशुओं की है। उन्हें इन्द्रिय विलास, शरीर सज्जा और अहंता का परिपोषण करने वाली सुविधा सम्पदा चाहिए। दिखने में तो उनकी संरचना मनुष्य जैसी लगती है, पर वस्तुतः होते हैं वे जड़ कलेवर। “चलते−फिरते पेड़−पौधे इन्हीं को कहा जाता है। इन्हें सड़न, शीलन और घुटन चाहिए। जान−बूझकर या अनजाने वे इसी को चाहते और इसी को खरीदते हैं। विलास, संचय और अहंकार की खाई पाटने में जीवन भर अथक श्रम करते हैं, किन्तु हाथ में छाले, कमर में दर्द और मन में असन्तोष के अतिरिक्त इन्हें मिले भी क्या? कोल्हू के बैलों के भाग्य में जो लिखा है वही तो सामने रहेगा। मनुष्यों में से अधिकाँश को इसी बिरादरी का समझा जाना चाहिए। अन्धी भेड़ों का अनुकरण करते हुये वे एक के पीछे एक चलते हुये गहरे गर्त में गिरते और जिस−तिस पर दोषारोपण करते हुये खीजते−कलपते दिन बिताते हैं।

पीड़ा और पतन के गर्त में गिरी हुई या गिरने के लिए आतुर यह नर पामरों की मंडली निश्चय ही दया की पात्र है। इन्हें सान्त्वना मिलनी चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो राहत के साधन भी जुटने चाहिए। मानवी करुणा का यह तकाजा है कि दुखिहारा भले ही अपने पतनोन्मुख दृष्टिकोण और गर्हित क्रिया−कलाप को अपनाने से विपत्ति के जाल में जा घुसा हो। फिर भी भ्रमित तो भ्रमित ही है। उसे दुष्ट या भ्रष्ट कहना व्यर्थ है। ‘भटके हुये बालक’ शब्द का प्रयोग करना ही पर्याप्त है। इसी में चिन्तन की शालीनता है और पीड़ित के प्रति ममता। वह सेवा और सहायता का पात्र है उसे वह मिलनी भी चाहिए। मिलती भी है। जब तक वरिष्ठों में अन्तरात्मा जीवित रहेगी तब तक यह क्रम चलता भी रहेगा।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति 1982 अप्रैल

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