Monday 18, May 2026
अमृतवाणी:- भावी महाभारत | Bhavi Mahabharat | Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan
मोह और प्रेम में फर्क क्या है? Moh Aur Prem Mein Fark Kya Hai? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 18 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
कमाओ, पर अकेले मत खाओ। Kamao, Par Akele Mat Khao. अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो आप अपने कुटुंब में छोटे से दायरे में इस्तेमाल करते हैं वह बातें वही बातें आपको बड़े दायरे में इस्तेमाल करनी पड़ेगी छोटे दायरे में इस्तेमाल करते हैं ना आपको साढ़े साढ़े आठ सौ रुपये तनख्वाह मिलती है ना तो आप क्या करते हैं आपका कुछ बीवी का खर्च चलता है कुछ बच्चों की पढ़ाई में खर्च होता है कुछ बुड्ढे बाप बीमार है तो उसमें खर्च होता है कुछ छोटा भाई स्कूल में जाता है उसको स्कूल में खर्च होता है कुछ हमारी बहन का शादी में खर्च हो गया था उसका कर्जा झुकाते हैं तो अपने लिए तो खर्च नहीं करते हैं अरे साहब इतना बड़ा अपने लिए क्या खर्च करेंगे साढ़े आठ सौ रुपया अपने लिए खर्च करते हैं नहीं साहब अपने लिए हम कैसे खर्च करेंगे सारे का सारा कुटुंब लिए बैठे हैं हमारी बहन विधवा हो गई है उसको पैसा भेजना पड़ता है और हमारे साले की लड़की का ब्याह है हमारी बीवी कह रही थी इस साले की लड़की में कुछ देना ही पड़ेगा तो उसके लिए एक अंगूठी बनवाने का एक साड़ी साड़ी खरीदने के लिए हमने बचत करना शुरू कर दी है तो आप अकेले नहीं खाते साढ़े आठ सौ अरे हम क्या खाएंगे साढ़े आठ सौ आप कमाते तो हैं आप कमाते हैं तो मुबारक लेकिन खर्च कैसे करेंगे आप खर्च कैसे करेंगे आप अपने लिए कैसे खर्च करेंगे जो आप कुटुंब में जिन सिद्धांतों को लागू करते हैं वही सिद्धांत आपको सारे समाज में लागू करने पड़ेंगे जो आदमी समर्थ हैं जो आदमी योग्य हैं जो आदमी प्रतिभाशाली हैं जो आदमी संपन्न है ठीक है उनकी संपन्नता उनको मुबारक संपन्नता से उनको श्रेय मिलेगा संपन्नता से उनको यश मिलेगा संपन्नता से उनको कीर्ति मिलेगी लेकिन संपन्नता का मतलब कोई यह थोड़ी हो जाएगा कौन सा वाला आप संपन्नता से जो कम आएंगे आप स्वयं खाते रहेंगे आप ऐसे करेंगे क्या आप ऐसे करेंगे जो संपन्नता से कमाते हैं वह स्वयं खाएंगे आपका गला दबोच कर के उल्टी करा ली जाएगी नहीं साहब हम खा जाएंगे अच्छा खा कर दिखा दीजिए अभी तो हम कुछ नहीं कहते आपसे लेकिन अध्यात्म युग आएगा तो उसी तरह का आएगा और साम्यवाद का युग आएगा तभी वही आएगा कैसा आएगा कि आपकी गर्दन दबोच ली जाएगी गर्दन दबोच जाएगी जो अनावश्यक काम में खाया है उसको उलटिए उलटिए उलटिए खाते चले जा रहे हैं पेट में भरते चले जा रहे हैं पेट भरने के लिए जितनी गुंजाइश है उतना भरिए बाकी निकाल दीजिए
अखण्ड-ज्योति से
युगान्तरीय चेतना से परिचित, प्रभावित, प्रशंसक, समर्थक, प्रज्ञा-परिवार को एक कदम आगे बढ़कर अब सघन सहयोग की भूमिका में प्रवेश करना होगा। उन्हें अपना एक विशिष्ट स्तर एवं स्वरूप विनिर्मित करना होगा। समय के परिवर्तन में उनकी भावभरी भूमिका होनी चाहिए। ऐसे भाव-भरी जो उन्हें महामानवों की-युग पुरुषों की-पंक्ति में खड़ा कर दे। ऐसी भावभरी जिसमें त्याग, बलिदान और सेवा साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे जिससे समूचे संपर्क क्षेत्र को नव जीवन मिले। ऐसा नव जीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वन्दन करते रहें।
बात दूसरे स्तर के साहस भर की है। मानव जीवन दुस्साहसियों से भरा है। इसमें पग-पग पर जोखिम है। त्याग और संयम की विवशता भी बनी ही रहती हैं। इच्छा से नहीं, अनिच्छा से प्रकृति प्रेरणा से करना तो वही पड़ता है। प्रश्न इतना भर है कि क्या वह सब ढर्रे से बाधित होकर करने की अपेक्षा विवेकपूर्वक, अन्तः प्रेरणा से, आदर्शों के निमित्त किया जा सकता है क्या? बाधित होकर या स्वेच्छा पूर्वक-व्यामोह के दबाव से या विवेक भरे उत्साह से चयन इन्हीं दो में से एक का काम करना पड़ता है। जोखिम दोनों में समान है। न चाहने पर भी जो करने के लिए प्रकृति बाधित करती है उसी को यदि अन्तः प्रेरणा से आपत्तिकालीन युग धर्म की पुकार पूरी करने के लिए किया जा सके तो एक शब्द में उसे विवेक भरी साहसिकता और मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली साहसिकता ही कहा जाएगा। समय आ गया कि इस परीक्षा की घड़ी में अपने चयन चुनाव में राजहंसों जैसी उत्कृष्टता का परिचय देना होगा। इस विषम बेला में उन्हें प्रेय का नहीं श्रेय का वरण करना चाहिए।
मनुष्य कमाता बहुत हैं, पर प्रकृति उसमें से थोड़ा-सा ही खाने की छूट देती है। चार रोटी ही पेट में प्रवेश कर पाती हैं। चाहने पर भी कोई अधिक उदरस्थ नहीं कर सकता। तन ढकने के वस्त्र, सोने का बिस्तर औसत लम्बाई से अधिक के प्रयुक्त नहीं हो सकते। जो खाया खर्चा उसके उपरान्त का बचत भाग किन्हीं दूसरों के लिए छोड़ना ही पड़ता है। मरने के बाद तो सिकन्दर कुछ न ले जा सका और ताबूत से बाहर खुले हाथ निकलवा कर ऐसे ही रोता-कलपता चला गया। प्रश्न इतना भर है कि उस बचत की अनावश्यक रूप से कुटुम्बियों पर ही लादा जाय या उस स्वाति-बूँद की तरह असंख्य प्यासों पर बरसा दिया जाय? चुना किसे गया इसी में अपनी सूझ-बूझ है। स्वयं के लिए तो सीमित उपयोग ही सम्भव है। यह समय साधना यह उदारता, अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही, या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्म प्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।
यह सोचना मात्र भ्रम है कि आदर्शवादी गतिविधियों में भाग लेने से-परमार्थ प्रयोजनों में सहयोग करने से घाटा पड़ता है और घर वालों की सुविधा में कमी पड़ती है। इस चिन्तन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धन्धे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट प्रजनन के कोल्हू में पिलने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती। दुनियादार कबीर, नानक दादू, रैदास, ज्ञानेश्वर, चैतन्य, वह न बन सके होते जो कृपणता का परित्याग करने के उपरान्त बन गये।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर
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