Monday 13, July 2026
एक अनुभव ने मुझे भगवान से मिला दिया। Ek Anubhav Ne Mujhe Bhagwan Se Mila Diya अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- आपको जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को कैसे बदलना चाहिए ?
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! शांतिकुंज दर्शन 13 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अपनेपन का दायरा जितना बढ़ता है, जीवन उतना ही आनंदमय बनता जाता है। अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- आपको जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को कैसे बदलना चाहिए ?
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
संसार में पापों की अनेक किस्में हैं। चोरी, ठगी, लूट, ढोंग, हिंसा, हत्या, शोषण, व्यभिचार, असत्य, मद्यपान, छल, विश्वास घात, कृतघ्नता आदि अनेकों पातक गिनाये जा सकते हैं। इन सब प्रकार के पापों के हेतु शास्त्रकारों ने से दो बताये हैं (1) अभिमान (2) अवमान। अभिमान- का फलितार्थ क्रोध और अवमान का फलितार्थ लोभ विशेष रूप से प्रकट होते हैं। लोभ और क्रोध में अधिक पाप बनते हैं तो भी अभिमान और अवमान की सीमा अधिक विस्तृत है।
यह दोनों अध्यात्मिक पाप हैं, जिनके कारण अनेकों प्रकार के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक पाप उपज खड़े होते हैं। अभिमान, एक प्रकार का नशा है, जिसमें मदहोश होकर मनुष्य अपने को दूसरों से बड़ा और दूसरों को अपने से छोटा समझता है। वह इस बात को पसंद करता है कि दूसरे लोग उसकी खुशामद करें, उसे बड़ा समझे, उसकी बात मानें, जब इसमें कुछ कमी आती है तो वह अपना अपमान समझता है और क्रोध से साँप की तरह फुसकारने लगता है। वह नहीं चाहता कि कोई मुझसे धन में, विद्या में, बल में, प्रतिष्ठा में, बड़ा या बराबर का हो, इसलिए जिस किसी को वह थोड़ा सुखी सम्पन्न देखता है उसी से ईर्ष्या, द्वेष करने लगता है। अहंकार की पूर्ति के लिए अपनी सम्पन्नता बढ़ाना चाहता है। सम्पन्नता सद्गुणों से, श्रम से, लगातार परिश्रम करने से मिलती है। पर अभिमान के नशे में चूर व्यक्ति इस सीधे साधे मार्ग पर चलने में समर्थ नहीं होता वह अनीति और बेईमानी पर उतर आता है।
अवमान का अर्थ है- आत्मा की गिरावट। अपने को दीन, तुच्छ, अयोग्य, असमर्थ, समझने वाले लोग संसार में दीन हीन बन कर रहते हैं। उनकी प्रतिभा कुँठित हो जाती है, कोई साहसिक कार्य उनसे बन नहीं पड़ता। सम्पन्नता प्राप्त करने और अपने ऊपर होने वाले अन्याय को हटाने के लिए जिस शौर्य की आवश्यकता है वह अवमान ग्रस्त मनुष्य में नहीं होता। फलस्वरूप वह न तो समृद्ध बन पाता है और न अन्याय के चंगुल से छूट पाता है। उसे गरीबी घेरे रहती है और कोई न कोई सताने वाला, आये दिन अपनी तीर कमान ताने रहता है। इन कठिनाइयों से बचने के लिए उसे निर्बलता परक अनीतियों का आश्रय लेना पड़ता है। चोरी, ठगी, छल-कपट, दंभ, असत्य, पाखंड, व्यभिचार, खुशामद जैसे दीनता सूचक अपराधों को करना पड़ता है। मोह, ममता, भय, आशंका, चिन्ता, कातरता, शोक, पश्चाताप, निराशा, कुढ़न, सरीखे मनोविकार उसे घेरे रहते हैं।
आत्म ज्ञान एवं आत्म सम्मान, को प्राप्त करना और उनकी रक्षा करने के लिए मनुष्योचित मार्ग अपनाना यह जीवन का सतोगुणी स्वाभाविक क्रम है। यह शृंखला जब शृंखलित हो जाती है, आत्मिक सन्तुलन बिगड़ जाता तो पाप करने का सिलसिला चल पड़ता है। आत्मज्ञान को प्राप्त करने वाले और आत्म सम्मान की रक्षा करने वाले ही पाप से बचते हैं और वे ही जीवनोद्देश्य पूरा करते हैं। पाठको! अभिमान तथा अवमान से बचो और आत्मिक संतुलन कायम रखो।
अखण्ड ज्योति अगस्त 1947
अपनेपन के दायरे को बढ़ा दीजिए अभी तो अपनेपन का दायरा आपके शरीर तक है इसीलिए शरीर में सुख है तो सुख ही है और शरीर में दुख है तो आप दुखी हैं अभी तो आप का दायरा अभी तो आपने दायरा कुटुंब तक सीमित रखा है कुटुंबियों को नौकरी अच्छी मिल गई खाना अच्छा मिल गया कि इज्जत मिल गई तो तो आप खुश कुटुंबियों को नफा नुकसान हो गया तब तब आप नाखुश कृपा कीजिए इस छोटे से दायरे को बढ़ा दीजिए आप अपने आप को सारे विश्व तक फैला दीजिए सब चीजें सब चीजें आपकी राम बादशाह स्वामी रामतीर्थ अपने आपको राम बादशाह कहते थे और यह कहते थे मैं मैं बादशाह हूं किसके बादशाह हैं बादलों का बादशाह बादलों को मैं जब तक चाहूं देखता रह सकता हूं नदियों का बादशाह पहाड़ों का बादशाह मैं जिस पहाड़ पर चाहूं उसी के साथ में उसके ऊपर जा सकता हूं उसे देख सकता हूं यह सब उनका ख्याल था तो इसीलिए वह समझते थे सारी दुनिया मेरी है मैं दुनिया का मालिक हूं अपने आप को राम बादशाह कहते थे कोई रुकावट थी रुकावट भी नहीं थी रुकावट की क्या रुकावट थी बताइए गंगा जी का पानी पीना चाहिए कौन रोकता है उनको सड़क पर चलना चाहे तो कौन रोकता है बादलों को निहारना चाहे तो कौन निहारता कौन रोकता है किसी चिड़िया के सामने दाने फेंक दें तो कौन रोकता है किसी की साफ सेवा करने लगे तो कौन रोकता है केवल बुराइयों के बारे में तो रोकथाम हो भी सकती है अगर आप किसी के साथ में चोरी का व्यवहार करें लड़ाई झगड़े का व्यवहार करें तो कानून आपको रोकथाम भी कर सकता है लेकिन आप किसी से मीठे वचन बोलें किसी की मदद कर दें किसी के काम आए तब तब कौन रोकने वाला है इसीलिए भक्ति का न केवल भाव संवेदनाों से ताल्लुक है बल्कि व्यक्ति के बहिरंग जीवन से भी ताल्लुक है भक्ति मोहब्बत यह सिखाती है कि हमको दूसरों की मदद करनी चाहिए
अखण्ड-ज्योति से
मानव का आदि वंश पाश्चात्य वैज्ञानिक पिथेकेण्ट्रोपस, सिनैण्ट्रोपस और निएन्टर पाल मानते है। इनकी आकृति से आज के मानव से तुलना करने से बड़ा अन्तर दिखाई देता है। क्रोमग्नन की तुलना में तो अब का मनुष्य पहचाना भी नहीं जा सकता। पाश्चात्यों की बात पाश्चात्य जानें पर हम अपने आपको जिस अपौरुषेय पूर्ण विकसित मनुष्य से वंश उत्पत्ति की बात मानते है, उनकी शक्ति शारीरिक रचना और सामर्थ्य की दृष्टि से आज के मनुष्य को तौलने है तो वह बिलकुल भिन्न और दीन-दुर्बल दिखाई देता है। इसका कारण उसकी अपनी भूलें है, जो उसने बिना बेचारे ही है, कर रहा है।
जीव वैज्ञानिक के अनुसार इस प्रक्रिया सृष्टि से सब जीव प्रभावित होते है। उदाहरणार्थ आज का जो आरंभ में लोमड़ी की शकल का था। तब सम्भवतः उसकी प्रकृति भी माँसाहारी थी। वह जंगलों में छिपा पड़ा रहता था। धीरे-धीरे उसने स्वभाव बदला घास खाने लगा। हिंसक प्रकृति के कारण पहले उसमें स्वाभाविक भय रहता था उसे छोड़ कर निर्भय मैदानों में रहने लगा। चिन्तायें छोड़ देने से जिस प्रकार दुर्बल लोगों के स्वास्थ्य भी बुलन्द हो जाते है, उसी प्रकार वह भी अपने डील–डौल को सुडौल बनाता चला आया। धीरे-धीरे मनुष्य उसे प्यार करने लगा और उससे अस्तबल की शोभा बढ़ने लगी। आज उसी लोमड़ी जैसे घोड़े की सुन्दरता साधारण व्यक्तियों से लेकर राजाओं महाराजाओं को भी आकर्षित करती है, उसकी शक्ति की तुलना मशीनों से की जाती है।
इसके विपरीत लुप्त जन्तु-शास्त्र (मिसिंग लिंक) के अध्ययन से पता चलता है कि पहले किसी समय पृथ्वी पर कई सुडौल और चरम सीमा तक विकसित जीव पाये जाते थे। किन्तु इन जन्तुओं ने अपने रहने सहने में हद दर्जे की कृत्रिमता उत्पन्न की और अद्यावधि ही नष्ट हो गये। आज मनुष्य जो उत्तरोत्तर विलासी जीवन की ओर अग्रसर होता जा रहा है तथा जनसंख्या अनियन्त्रित रूप से बढ़ता जा रहा है, उसे देखकर कुछ जीव-शास्त्रियों का यह भी मत है कि मनुष्य को सम्भवतः कार्टून युग तक पहुँचने का अवसर ही न मिले अर्थात् वह बीच में ही समाप्त हो जाय।
एक ओर जहाँ परिश्रम के अभाव और प्राकृतिक दबाव के कारण मनुष्य बिलकुल क्षीणकाय हो जायेगा, यहाँ मानवीय शरीर और स्वभाव के विपरीत माँसाहार, मद्यपान आदि के कारण कुछ लोग ऐसा दैत्याकार भी हो सकते है, जिस तरह एक समय भूमध्य सागर टापू और चीन में भीमकाय मानव पैदा हो चुके है। यह लोग बड़े स्वेच्छाचारी और निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले थे। पशु-पक्षियों को मार कर कच्चा ही खा जाते थे। कालान्तर में इन दैत्यों की चर्बी और मोटापे की बीमारी अनियन्त्रित हो गई और वे कुछ ही दिनों में अपने आप नष्ट हो गये। इस प्रकार की दैत्याकृतियाँ भी सामने आ सकती है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969
निश्चय रखिये कि आप जो कुछ देखते है, वस्तुतः वह ही नहीं है। यदि वास्तव में वही होते तो अपने को पूर्ण और संतुष्ट अनुभव करते, आनन्दित और उल्लसित बातें मनुष्य अपने तन मन और क्रियाओं द्वारा अपने जिस रूप को व्यक्त करता है, वह उसका वह आदिरूप नहीं है जिसकी शोध वाँछनीय है। वह शरीर और उसके उपादान ही होता, तब तो वह अपने को हर समय जाने ही रहता, कुछ और जानने की आवश्यकता ही न होती। किन्तु आवश्यकता है, उसका अनुभव भी होता है और पूर्ति इच्छा थी। यही आवश्यकता इस बात की साक्षी है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप कुछ और है, जिसको जानना ही चाहिये। क्योंकि उसके बिना न तो पूर्णता प्राप्त हो सकती है और न अक्षय सुख शाँति।
जिस प्रकार एक छोटी सी वस्तु के पीछे एक बृहत् भण्डार, बूँद के पीछे समुद्र, बीज के पीछे वृक्ष और वायु की छोटी सी लहर के पीछे पवनमान अवस्थित है, इसी प्रकार हमारी चेतना के पीछे एक विराट् चेतना छिपी है। जिस प्रकार कोई एक इकाई किसी अनन्तता की साक्षी है, उसी प्रकार हमारी लघु चेतना किसी अखण्ड एवं असीमित चेतना की साक्षी है। जो कुछ वर्तमान अथवा दृश्यमान है, उसका एक आदि स्त्रोत होना ही चाहिये और वह होता भी है। वह प्रच्छन्न आदि स्त्रोत ही किसी वस्तु का सच्चा स्वरूप होती।
बूँद वस्तुतः बूँद नहीं होती है, उसका वास्तविक स्वरूप वह समुद्र है, जिससे वह आई है और जिसमें उसे लय हो जाना ही बीज को उसके उसी रूप में बीज मानना भूल है। बीज वस्तुतः विशाल वनस्पति है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और एक दिन अपना यह माध्यमिक रूप मिटाकर तद्रूप हो जाता है। वायु का लघु प्रवाह एक श्वाँस मात्र नहीं है। वह, वह सर्वव्यापक वायुमण्डल है, जिसमें वह आती और जिसमें जाकर लीन हो जाती है। इसी प्रकार लघु चेतन सागर है, जिसे परमात्मा कहते है और जिससे वह उत्पन्न होता है और अन्ततः जिसमें मिल जाता है। निस्संदेह मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है। वह न शरीर है और न मन, बुद्धि, अहंकार आदि जो कि स्थूल रूप से प्रकट होता रहता है।
यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय तो आये दिन इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। यह सत्व तो सर्वथा मान्य ही है कि ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है।
संसार में जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर है, वह ईश्वर रूप है। जब मनुष्य किसी लहलहाती लता पर हँसते, झूमते किसी फूल को देखता है तो उसे उसके प्रति एक आत्मिक आकर्षण हो उठता है। वह उस सुविकसित एवं सुवासित पुष्प को देखकर केवल प्रसन्न ही नहीं होता बल्कि सोचने लगता है कि कितना अच्छा होता, यदि मैं भी इस पुष्प की तरह सुन्दर सुगंधित और विकसित होता। इसी की तरह संसार को आनन्द देता हुआ, हँसता खेलता और अपने ही आनन्द में मस्त होकर झूमता। हमारा रंग रूप भी इसी की तरह प्यारा प्यारा और आडम्बर रहित होता।
मनुष्य जब वर्षा ऋतु में बादलों की गरज से मत्त होकर नाचते मोर को देखता है तो ठगा सा खड़ा हो जाता है और सोचने लगता है- क्यों न मुझे इस मोर की तरह सुन्दर पंख मिले और क्यों न मैं भी इसकी ही तरह मस्ती पा सका। कितना सुख हो कि इसी की तरह मनमोहक कलेवर पाकर और इसी की तरह विभोरता पाकर मैं भी मदमस्त होकर नृत्य कर सकूँ। इसकी वाणी की तरह मुझे भी लोक रंजन बाह्य मिली होती तो मैं भी बोल बोल कर संसार को अपनी और आकर्षित कर लेता।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1969
संसार में पापों की अनेक किस्में हैं। चोरी, ठगी, लूट, ढोंग, हिंसा, हत्या, शोषण, व्यभिचार, असत्य, मद्यपान, छल, विश्वास घात, कृतघ्नता आदि अनेकों पातक गिनाये जा सकते हैं। इन सब प्रकार के पापों के हेतु शास्त्रकारों ने से दो बताये हैं (1) अभिमान (2) अवमान। अभिमान- का फलितार्थ क्रोध और अवमान का फलितार्थ लोभ विशेष रूप से प्रकट होते हैं। लोभ और क्रोध में अधिक पाप बनते हैं तो भी अभिमान और अवमान की सीमा अधिक विस्तृत है।
यह दोनों अध्यात्मिक पाप हैं, जिनके कारण अनेकों प्रकार के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक पाप उपज खड़े होते हैं। अभिमान, एक प्रकार का नशा है, जिसमें मदहोश होकर मनुष्य अपने को दूसरों से बड़ा और दूसरों को अपने से छोटा समझता है। वह इस बात को पसंद करता है कि दूसरे लोग उसकी खुशामद करें, उसे बड़ा समझे, उसकी बात मानें, जब इसमें कुछ कमी आती है तो वह अपना अपमान समझता है और क्रोध से साँप की तरह फुसकारने लगता है। वह नहीं चाहता कि कोई मुझसे धन में, विद्या में, बल में, प्रतिष्ठा में, बड़ा या बराबर का हो, इसलिए जिस किसी को वह थोड़ा सुखी सम्पन्न देखता है उसी से ईर्ष्या, द्वेष करने लगता है। अहंकार की पूर्ति के लिए अपनी सम्पन्नता बढ़ाना चाहता है। सम्पन्नता सद्गुणों से, श्रम से, लगातार परिश्रम करने से मिलती है। पर अभिमान के नशे में चूर व्यक्ति इस सीधे साधे मार्ग पर चलने में समर्थ नहीं होता वह अनीति और बेईमानी पर उतर आता है।
अवमान का अर्थ है- आत्मा की गिरावट। अपने को दीन, तुच्छ, अयोग्य, असमर्थ, समझने वाले लोग संसार में दीन हीन बन कर रहते हैं। उनकी प्रतिभा कुँठित हो जाती है, कोई साहसिक कार्य उनसे बन नहीं पड़ता। सम्पन्नता प्राप्त करने और अपने ऊपर होने वाले अन्याय को हटाने के लिए जिस शौर्य की आवश्यकता है वह अवमान ग्रस्त मनुष्य में नहीं होता। फलस्वरूप वह न तो समृद्ध बन पाता है और न अन्याय के चंगुल से छूट पाता है। उसे गरीबी घेरे रहती है और कोई न कोई सताने वाला, आये दिन अपनी तीर कमान ताने रहता है। इन कठिनाइयों से बचने के लिए उसे निर्बलता परक अनीतियों का आश्रय लेना पड़ता है। चोरी, ठगी, छल-कपट, दंभ, असत्य, पाखंड, व्यभिचार, खुशामद जैसे दीनता सूचक अपराधों को करना पड़ता है। मोह, ममता, भय, आशंका, चिन्ता, कातरता, शोक, पश्चाताप, निराशा, कुढ़न, सरीखे मनोविकार उसे घेरे रहते हैं।
आत्म ज्ञान एवं आत्म सम्मान, को प्राप्त करना और उनकी रक्षा करने के लिए मनुष्योचित मार्ग अपनाना यह जीवन का सतोगुणी स्वाभाविक क्रम है। यह शृंखला जब शृंखलित हो जाती है, आत्मिक सन्तुलन बिगड़ जाता तो पाप करने का सिलसिला चल पड़ता है। आत्मज्ञान को प्राप्त करने वाले और आत्म सम्मान की रक्षा करने वाले ही पाप से बचते हैं और वे ही जीवनोद्देश्य पूरा करते हैं। पाठको! अभिमान तथा अवमान से बचो और आत्मिक संतुलन कायम रखो।
अखण्ड ज्योति अगस्त 1947
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