Thursday 06, August 2026
सफलता चाहिए तो पहले अपना लक्ष्य तय करें? Safalta Chahiye To Pehle Apna Lakshya Tay Karein. अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी
एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 06 August 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 August 2026
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 06 August 2026
हर पल का सदुपयोग कैसे करें
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप समय का संयम समय आप की संपत्ति है यह जीवन जो बना हुआ है यह समय से गुँथा हुआ है समय का अर्थ होता है जीवन,जीवन का अर्थ होता है समय आप समय को एक-एक लमहे को एक-एक मिनट को आप इस तरीके से खर्च कीजिए जिसमें एक भी लम्हा आपका बेकार और व्यर्थ खर्च ना होने पाए यह कैसे कैसे संभव है यह इसी तरह संभव है कैसे जैसे जैसे कि संसार की प्रत्येक महापुरुष ने अपने-अपने समय का ठीक तरीके से नियमन किया है विनोबा तेइस भाषाओं के विद्वान हैं कैसे कैसे उन्होंने भूदान की यात्राएं भी कर ली कन्याकुमारी से लेकर और वहां तक रामेश्वरम तक यह कैसे हुआ यह बराबर समय का विभाजन करते रहे अन्य भाषाओं को सीखते पढ़ते रहे अब्राहम लिंकन जब सड़क पर निकलते थे तो लोग अपने घड़ियों को सही करते थे उनके उठने का और सवेरे टहलने का जो समय था उनकी लंबी टांगों की आवाज से लोग समझ लेते थे लिंकन जा रहे हैं बिल्कुल समय पर जाते थे क्या मजाल समय का एक लम्हा भी खराब करें यह क्या है श्रम श्रम की शक्ति को और समय की शक्ति को आप मूल्य समझते हो तो आप न जाने क्या से क्या कर सकते हैं
अखण्ड-ज्योति से
हम हर समय चिन्ताशील व क्रियाशील नजर आते हैं। फिर भी हमारा लक्ष्य क्या है? इसका हमें पता तक नहीं, वही आश्चर्य का विषय है। सभी लोग धन बटोरते हैं पर उसका हेतु क्या है? उसका उत्तर विरले ही ठीक से दे सकेंगे। सभी करते हैं तो हम भी करें, सभी खाते हैं तो हम भी खाएं, सभी कमाते हैं तो हम भी कमाएं, इस प्रकार अन्धानुकरण वृत्ति ही हमारे विचारों और क्रियाओं की आधार शिला प्रतीत होती है। अन्यथा जिनके पास खाने को नहीं वे खाद्य-सामग्री संग्रह करें तो बुद्धिगम्य बात है पर जिनके घर लाखों रुपये पड़े हैं वे भी बिना पैसे-वाले जरूरतमंद व्यक्ति की भाँति पैसा पैदा करने में ही व्यस्त नजर आते हैं।
आखिर कमाई-संग्रह क्यों और कहाँ तक? इसका भी तो विचार होना चाहिये। पर हम चैतन्य शून्य लक्ष्य-विहीन एवं यन्त्रवत जड़ से हो रहे हैं। क्रिया कर रहे हैं पर हमें विचार का अवकाश कहाँ? जिस प्रकार कहाँ जाना है यह जाने बिना कोई चलता ही रहे तो इस चलते रहने का क्या अर्थ होगा? लक्ष्य का निर्णय किये बिना हमारी क्रिया निरर्थक होगी, जहाँ पहुँचना चाहिए वहाँ पहुंचने पर भी हमारी गति समाप्त नहीं होगी। कहीं के कही पहुँच जायेंगे परिश्रम पूरा करने पर भी फल तदनुरूप नहीं मिल सकेगा।
खाना, पीना, चलना, सोना यही तो जीवन का लक्ष्य नहीं है पर इनसे अतिरिक्त जो जीवन की गुत्थियाँ हैं उसको सुलझाने वाले बुद्धिशील व्यक्ति कितने मिलेंगे? जन्म लेते हैं, इधर उधर थोड़ी हलचल मचाते हैं और चले जाते हैं। यही क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है। पर आखिर यह जन्म धारण क्यों? और यह मृत्यु भी क्यों? क्या इनसे मुक्त होने का भी कोई उपाय है?
है तो कौन सा? और उसकी साधना कैसे की जाय? विचार करना परमावश्यक है। यह तो निश्चित है कि मरना अवश्यंभावी है, पर वह मृत्यु होगी कब? यह अनिश्चित है, इसीलिए लक्ष्य को निर्धारित कर उसी तक पहुँचने के लिये प्रगतिशील बना जाए, समय को व्यर्थ न खोकर प्राप्त साधनों को लाभ के अनुकूल बनाया जाए और लक्ष्य पर पहुँचकर ही विश्राम लिया जाय। यही हमारा परम कर्त्तव्य है।
अखण्ड ज्योति नवम्बर 1948
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