Wednesday 15, July 2026
आखिर हर किसी को ज्ञान क्यों नहीं दिया जाता? Aakhir Har Kisi Ko Gyaan Kyon Nahin Diya Jaata? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
आओ जाने युग ऋषि को | Aao Jane Yug Rishi Ko |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 15 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
मोह और प्रेम में फर्क क्या है? Moh Aur Prem Mein Fark Kya Hai? अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
प्यार का अर्थ जैसा कि आमतौर से लोगों ने लगा रखा है वह प्यार प्यार नहीं हो सकता खूबसूरत चीजों से प्यार है और बिना खूबसूरत चीजों से प्यार प्यार नहीं है यह क्या मतलब हुआ खूबसूरत है तो क्या बिना खूबसूरत है तो क्या संसार का बगीचा है इसमें सभी तरह की चीजें हैं तो हमारा सीमित प्यार क्यों हो हम मोह के बंधन में क्यों बंधें मोह और बंधन एक ही तरह से होते हैं जिनको हमको फायदा होता हुआ दिखाई पड़ता है उनके साथ में हमारी मोहब्बत होती है लेकिन जिन लोगों के साथ में हमारा फायदा नहीं है उनके साथ में आमतौर से हमारी मोहब्बत नहीं होती ना ऐसा मत कीजिए शंकर भगवान के साथ साथ में भूत पलीत भी रहते थे भूत पलीतों की भी मदद करते थे सेवा करते थे भक्ति है तो हमसे गए बीते लोगों की बिछड़े हुए लोगों की गए गुजरे लोगों की हमको सेवा करनी चाहिए बच्चों को हम गोदी में लिए फिरते हैं ना जो हमसे छोटे बच्चे हैं इनकी समझदारी कम है इनकी क्षमता एक कम है जो उठने में समर्थ हैं इनको क्यों उनकी सेवा नहीं करनी चाहिए सेवा करना सेवा और भक्ति तो दोनों एक ही चीज हैं भज सेवायाम संस्कृत में भजन शब्द जो बना है इससे भजन भी बना है और भक्ति भी बनी है भक्ति का अर्थ क्या होता है भक्ति का अर्थ सेवा होता है सेवा कौन करेगा किसकी करेगा वह करेगा उसकी करेगा जिसके साथ में उसका मोहब्बत हो तो आप अपनी मोहब्बत को बढ़ा लीजिए मोहब्बत का दायरा बढ़ाइए बस यही भक्ति भक्ति का अभ्यास हम करते हैं भगवान से यह व्यायामशाला है व्यायामशाला में अखाड़ा लड़ना जाते हैं कुश्ती लड़ना सीखते हैं दौड़ लगाना सीखते हैं तो दंगल जब होता है प्रतियोगिताएं जब होती हैं तो फिर वह कमाल दिखाते हैं आप भगवान की कोठरी में बैठकर के भक्ति कीजिए सिद्धांतों के तईं भक्ति आदर्श के तईं भक्ति
अखण्ड-ज्योति से
एक सभा में भाषण देते हुए लोकमान्य तिलक ने कहा, ‘हिन्दू वह है जो विश्वास करता है कि वेद स्वतः प्रमाण हैं और उनमें ध्रुव सत्य है।’ हिन्दू महासभा ने हिन्दू की एक परिभाषा की है- ‘भारत में जिस धर्म का विकास हुआ है, उसमें विश्वास करने वाला हिन्दू है।’ कुछ महानुभावों का कहना है कि जो ब्राह्मण और गौ की रक्षा करते हैं, सब हिन्दू हैं। कुछ कहते हैं कि भारत को अपनी मातृभूमि और पुण्य भूमि मानने वाले हिन्दू हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जो अपने आपको हिन्दु समझे और कहे, वह हिन्दू है, जो वेदों, स्मृतियों, पुराणों तन्त्रों और धर्मों का मूल सदाचार के नियम को मानते है एवं परब्रह्म में विश्वास रखते हैं और कर्म न्याय तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं, वे हिन्दू हैं। सनातन और वैदिक धर्म एवं संस्कृति में विश्वास रखने वाले हिन्दू कहलाते हैं।
हिन्दू केवल नाम ही नहीं, आदि काल से ही हमारे राष्ट्र का संपूर्ण इतिहास हिन्दू नाम के साथ जुड़ा हुआ है। हमारे आदर्श और सिद्धान्त हिन्दू शब्द में इस प्रकार निहित हैं कि हिन्दुत्व की साधारण शब्दों में परिभाषा होना कठिन है। कवि, महापुरुष और अवतारी विभूतियों ने हिन्दुत्व की महत्ता और गौरवगान गाने के लिए विश्व में पदार्पण किया है। महर्षि, महात्मा और साधुजन हिन्दू शास्त्र और दर्शन बनाने के लिए अवतरित हुए हैं! वीर पुरुषों और योद्धाओं ने हिन्दुत्व के लिए युद्ध किए और उनके लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये हैं।
दया, सद्भाव, उदारता, अहिंसा, सत्य, पवित्रता आदि सभी दैवी गुण हिन्दू शब्द से संयुक्त हैं।
मेरे मित्रो! अमृत पुत्रों! गौरव और गर्व के साथ अपने आपको हिन्दू कहो।
अखण्ड ज्योति अगस्त 1947
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