Wednesday 19, August 2026
ध्यान:- उगते हुए सूर्य के प्रकाश का ध्यान | Ugte Huye Surya Ka Dhyan | Shraddheya Dr. Pranav Pandya
क्या अलग-अलग देवताओं की पूजा ज़रूरी है? Kya Alag-Alag Devataon Ki Pooja Zaroori Hai? अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 19 August 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृत सन्देश:-दूसरों को सुधारो, खुद मत बिगड़ो
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप ईमानदारी से रहिए आप अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन कीजिए समाजनिष्ठ हो कर रहिए ऐसा व्यवहार कीजिए जिसकी परंपराएं जिसकी परंपराओं से दूसरे आदमियों को गलत रास्ते पर चलने का मौका ना मिले बल्कि आपको इस तरीके से जिंदगी जीनी चाहिए जिससे कि आपके पीछे वाले लोग आपके जमाने वाले लोग कुछ प्रेरणा ग्रहण कर सकें तो आप के रास्ते पर चलने वाले कदम बढ़ा सकें यह आपके कर्तव्य हैं फर्ज हैं आप चारों ओर से अपने कर्तव्य से घिरे हुए हैं कर्तव्यों को आप समझिए समझिए बच्चा अपने गैर कर्तव्य बच्चा छोटेपन में अपनी जिम्मेदारियों को समझता नहीं है इसलिए बच्चा कहते हैं बड़े आदमियों को हर मामले में जिम्मेदारी समझ नहीं पड़ती है बच्चा नंगा भी फिर सकता है पर जवान आदमी कैसे नंगा फिरेगा जवान आदमी को तो कपड़े पहनने चाहिए क्यों क्योंकि वह अपने आप को जिम्मेदार समझता है बालक अगर आप हैं बौद्धिक दृष्टि से और भावना की दृष्टि से तब तब तो मैं क्या कहूं आपसे लेकिन अगर आप समझदार हो गए हैं और जिम्मेदार हो गए हैं तो जिम्मेदारी और समझदारी यह यह कहती है आपसे आप हर मामले में ईमानदार रहें अपनी जिम्मेदारियों के बारे में आप पूरी ईमानदारी से काम करें दूसरे आदमी दूसरे आदमियों को सुधारिये दूसरे आदमियों से झगड़िए दूसरे आदमियों के लिए जो कुछ हो सकता है कीजिए पर दूसरे आदमियों की गलती का आप अपने आप को सजा मत दीजिए कि आप भी बेईमानी करें दूसरे आदमी ने आपसे बेईमानी की तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको भी बेईमानी करनी चाहिए आप उसके साथ में लड़ाई कीजिए सुधारने के जो कोई और कानूनी तरीके हैं वह कीजिए लेकिन इस तरीके को मत अख्तियार कीजिए जिससे आपका व्यक्तित्व और आपका चरित्र भी उसी सामने वाले घटिया आदमी की बराबरी के तरीके का हो जाता हो ऐसे ऐसे बहुत से और कर्तव्य और फर्ज है इन्हीं का नाम कर्म योग है कर्मयोग को कीजिए आध्यात्मिक क्षेत्र में ज्ञान योग कि आप अपने बारे को जानिए और समझिए और मैं आपसे कर्तव्यों की पालन की प्रार्थना करता हूं कर्म योग उसी का नाम है जिसका नाम पूरा नाम कर्तव्य योग है फर्ज कर्तव्य ड्यूटी आप इस चीज को पूरी करके जागरूक होकर के रहे तो मैं आपको धर्मात्मा कहूंगा और धर्म प्राण कहने वाला व्यक्ति आप ऐसे ही कीजिए यदि इतना कर सकेंगे तो आप धन्य हो करके रहेंगे समाप्त
अखण्ड-ज्योति से
ईश्वर के दो रूप हैं, साकार और निराकार। जो कुछ इस संसार में इन भौतिक आँखों से दिखाई देता है, यह सब ईश्वर का साकार रूप है। किसी न किसी रूप में हमें ईश्वर के दर्शन होते ही रहते हैं। यह जो कुछ दिखाई पढ़ रहा है, ईश्वर का ही साकार दर्शन समझना चाहिए।
हमें चाहिए कि इसी साकार ईश्वर की पूजा में जनता जनार्दन की सेवा में, इस भौतिक शरीर को अर्पण कर दें। यही साकार ईश्वर की सच्ची पूजा है। यह भौतिक शरीर इसी साकार ईश्वर की अमानत है। हमारा कर्त्तव्य है कि ईश्वर की अमानत ईश्वर को सौंप दें, अन्यथा हम ईश्वर के चोर होंगे। हमें चाहिए कि इस पंच भौतिक शरीर को जनता जनार्दन की सेवा में मिटा दें, तभी हम सच्चे ईश्वर भक्त बन सकेंगे।
इस समस्त संसार में एक ही चैतन्य शक्ति व्याप्त रूप से समाई हुई है, जिसके द्वारा यह सारा संसार चेतन दिखाई देता है, प्रकृति का अणु-अणु उससे प्रेरित होकर कम्पायमान हो रहा है। हमारे अंदर भी वही आत्मा काम कर रही है जो समस्त संसार में। इस आत्मा को जान लेना ही आत्म दर्शन है। आत्म दर्शन ही निराकार ईश्वर की सच्ची पूजा है।
यदि हम निराकार प्रभु के सच्चे भक्त बनना चाहते हैं तो हमें समस्त विश्व में व्याप्त रूप से समाये हुए घट-घट वासी उस प्रभु परमात्मा को सर्वत्र व्यापक ओर सर्वशक्तिमान के रूप में सदैव देखना चाहिए। यदि साकार की उपासना करना रुचिकर हो तो संसार के प्रत्येक प्राणी एवं पदार्थ को सुँदर सुव्यवस्थित एवं सतोगुणी बनाने के लिए आत्म त्याग के साथ सेवापरायण होना चाहिए। ईश्वर को सर्वव्यापी सर्व शक्तिमान समझकर पापों से बचना और लोकहित के लिए अधिक आत्म-त्याग करना यह साकार ओर निराकार की उभय पक्षीय पूजा का संमिश्रण है।
इस प्रकार अपने विचारों और कार्यों को विशुद्ध, सेवामय, ईश्वरमय बना लेने वाला मनुष्य अपने आप को ईश्वर में स्थित समझता है और अपने अंदर ईश्वर की झाँकी करता है। ईश्वर भक्ति केवल ध्यान या जप मात्र से ही नहीं हो सकती, उसके लिए आचरण का समन्वय भी होना चाहिए। जिसका जीवन ईश्वरमय है। वही सच्चा ईश्वर भक्त है और उसे ही अपनी अन्तरात्मा में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के महातत्व का दर्शन होता है। सेवा सदाचार, प्रेम, श्रद्धा और संयम की पाँच विभूतियाँ जिसके अन्तःकरण में मौजूद हैं वह ईश्वर प्राप्ति से किसी भी प्रकार वंचित नहीं रह सकता।
अखण्ड ज्योति अगस्त 1949
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