Tuesday 28, April 2026
अमृत सन्देश:- परिवार से शुरू होती हैं आध्यात्मिकता। Root of Spirituality.
अमृतवाणी:- समयदान का महत्त्व | Amritvanni:- Samay Daan Ka Mahtav | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 28 April 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
सच्चा शिष्य वही, जो आदेश निभाए
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आध्यात्मिकता ने एक बहुत बड़ा नुकसान हमारा किया है मित्रों पिछले हजार वर्ष की आध्यात्मिकता ने पुराने जमाने की आध्यात्मिकता मनुष्यों के भीतर हिम्मतें भरा करती थी हर आदमी के साथ परख किया करती थी मखोल किया करती थी मुसीबतों की चिंता नहीं करती थी हमारा शिष्य मुसीबत में फंस जाएगा कि नहीं महर्षि धौम्य अपने शिष्य आरुणि के साथ बैठे हुए थे उन्होंने कहा बच्चे रात में खेत से पानी खेत से पानी निकल रहा है खेत में से पानी निकल रहा है सब पानी निकल जाएगा तो मुसीबत आएगी और हम लोगों के खेतों में अनाज पैदा ना होगा पानी को रोका जाना चाहिए रात का अंधियारा भादों की अंधियारी रात सब चिल्लाये बिजलियाँ चिल्ला रही थी दूसरे जानवर चिल्ला रहे थे दियावान रात्रि के समय में गुरु का आदेश और शिष्य का अनुदान दोनों ही बढ़ते हुए चले गए अंधियारी रात में छोटा वाला बालक 12 वर्ष का फावड़ा कंधे पर लिए हुए खोदता रहा खोदता रहा और यह कोशिश करता रहा मैं इनको बना दूं पानी को रोकूं बहुत परिश्रम किया बेचारे ने सफलता न मिल सकी आखिर क्या करना चाहिए कर्तव्य कर्तव्य का पालन किया जाना चाहिए बालक की समझ में आया यदि फावड़े की मिट्टी से पानी नहीं रुक सकता है तो शरीर की मिट्टी से तो रोका जा सकता है जहां से पानी प्रवाहित हो रहा था बच्चा वहां बैठ गया बैठने से पानी नहीं रुका लेट गया रात भर अंधियारी रात पानी बरसता रहा धौम्य सवेरे उठे उन्होंने कहा जिस बच्चे को हमने पानी बंद करने के लिए भेजा था वह कहां है उन्होंने कहा नहीं आया धौम्य तुरंत खेत के ऊपर गए देखा बालक पानी को रोके हुए बैठा था बच्चे को छाती से उठाया और लगा लिया कलेजे से और कहा ब्रह्मवर्चस में प्रदान करता हूं तुझे मेरे सबसे प्यारे से तू है अधिकारी इस बात का इस बात का कि तू ब्रह्म विद्या का ज्ञान प्राप्त कर सके
अखण्ड-ज्योति से
जहाँ सच्ची सहानुभूति होगी वहाँ ‘फुरसत न मिलने’ का बहाना न किया जायगा। सूरज की तरह स्पष्ट है कि जिन कार्यों को मन से निरर्थक महत्व हीन माना होगा उन्हीं के लिए फुरसत न मिलेगी। जो कार्य ‘आवश्यक’ समझे जाते हैं उन्हें तो रोटी खाना छोड़कर भी पूरा किया जाता है और कार्यक्रमों में उन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। जिसने युग धर्म के निर्वाह में कुछ योगदान करने की आवश्यकता सच्चे मन से अनुभव की होगी वह फुरसत न मिलने जैसे उपहासास्पद शब्द होठों पर ला ही नहीं सकेगा। इस बहाने से कोई अपना मन बहला सकता है पर ईश्वर की- आत्मा को यहाँ तक कि हमें भी उस कथन से तनिक भी समाधान नहीं मिलेगा।
इस बार हम अपने प्रत्येक परिजन को यह समझाना चाहते हैं कि भगवत् भजन के समतुल्य ही युग साधना के लिए लगाया गया समय पवित्र एवं पुण्य फलदायक है। उसमें आत्म कल्याण, लोक-मंगल और भगवत् प्रसन्नता के तीनों ही तथ्य मिले हैं। इसलिए यह त्रिवेणी सर्वोत्कृष्ट परमार्थ प्रयोजनों में प्राथमिकता पाने योग्य है। इसके लिए एक घण्टा समय लगाना किसी को भारी नहीं पड़ना चाहिए। इसे समय का अपव्यय नहीं माना जाना चाहिए। वरन् जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए आज की स्थिति में किए जा सकने वाले विवेकपूर्ण कार्यों में सर्वोपरि समझा जाना चाहिए।
हमें देव शक्तियों की संघटना खड़ी करनी है। भावभरी जागृत आत्माओं को एक सूत्र में पिरोकर युग देवता के चरणों पर चढ़ाने योग्य पुष्पहार बनाना है। संगठन के बिना युग परिवर्तन जैसे महान लक्ष्य की दिशा में एक इंच भी बढ़ सकना सम्भव न होगा, कार्य तो अनेकों करने पड़े है। बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति का विशाल कार्य क्षेत्र सुनसान पड़ा है। उसे उर्वर बनाने के लिए जिन प्रचारात्मक रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यों का अभियान खड़ा किया जाना है उनका सुविस्तृत उल्लेख शत सूत्री युग निर्माण योजना के रूप में अनेकों बार किया जा चुका है।
युगान्तरकारी कार्यक्रमों की रूपरेखा अनेकों बार प्रकाशित कर चुके है; उन क्रिया-कलापों का छकड़ा ज्यों-त्यों करके चलता, रेंगता भी देखा जा सकता है। पाक्षिक युग-निर्माण योजना में छपते रहने वाले समाचारों को पढ़कर यह आभास प्राप्त किया जा सकता है कि अभियान के अंतर्गत क्या हो चुका- क्या हो रहा है और क्या होने वाला है।
प्रश्न मूल पूँजी का है। संघ शक्ति के अभाव में जो बन पड़ रहा है उसे दूसरों की दृष्टि में कितना ही महत्व क्यों ने मिल रहा हो अपनी दृष्टि में नगण्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के एक लाख परिजनों में से मात्र कुछ हजार की ही वै हलचलें है। यदि पूरा परिवार अपना एक एक बूँद सहयोग लेकर खड़ा हो जाय तो जो कुछ हो रहा है उसकी प्रगति सौ गुनी तीव्रगति पकड़ सकती है और जिसे आज आश्चर्य मात्र समझा जा रहा है वह कल चमत्कार बनकर सामने खड़ा हो सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1975
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