Tuesday 28, July 2026
आध्यात्मिक जीवन की पहली शर्त क्या है ? Aadhyatmik Jeevan Ki Pehli Shart Kya Hai? अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी
आत्म- ज्ञान का तत्व- दर्शन | Aatmagyan Ka Tatwadarshan | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 28 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! शांतिकुंज दर्शन 28 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अनीति के सामने झुको मत। Aneeti ke Saamne Jhuko Mat परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
इंद्र से लेकर के जितने भी ऊंचे पदाधिकारी हुए हैं अपनी तपश्चर्या के बल पर ही इतना ऊंचा उठा सकने में संभव संभव हुए हैं तितीक्षा इसीलिए कराई जाती है उपवास करने से लेकर के धूप में खड़े होने और पानी में चलने से लेकर के कई तरह के आदमी तितीक्षायें करता रहता है यह अभ्यास है कि हम सिद्धांतों के लिए कठिनाई का सामना करेंगे सिद्धांतों के लिए आपको अनीति के सामने झुकने से इंकार कर देना चाहिए आपको अपने आप को तपाने से जो अपने मन का कच्चापन आता है उसको मानने से इंकार कर देना चाहिए और क्या करना चाहिए और यह करना चाहिए कि आपको पीड़ित और पद दलित मानवता के लिए हिमायत करने के लिए कमर कसकर आगे आना चाहिए आपको आपको अपनी मानसिक तप करना चाहिए असंयम मन कभी इधर घूमता है कभी उधर घूमता है कभी इधर घूमता है इस सब को रोक करके क्या करेंगे आप मन को रोकिए और रोकने के बाद में भगवान से लगा दीजिए यही तो योगाभ्यास है
अखण्ड-ज्योति से
वेद का एक सत्र है- ”शतहस्त समाहर सहस्र हस्त संकिरा” अर्थात् हे ज्ञान के पथिकों, हे कर्म मार्गियों तुम सौ हाथों से कमाओ, यथाशक्ति अर्थोपार्जन करो किन्तु उस माया के मोह में लिप्त न होओ, उस अर्जित धन को सत्कार्यों में दूसरों की भलाई, ज्ञान यज्ञों, भूखे पीड़ित मानव समाज के हितार्थ व्यय करो। जो रुपये के अभाव में आत्मविकास नहीं कर पा रहे हैं, जिन्हें तुमसे अधिक धन की आवश्यकता है उन सुपात्रों को हजार हाथों से बाँट दो। मुक्त हृदय से अपनी धर्म की कमाई में से दान दो।
दान एक ऐसा समर्पण है, जिससे धन सम्पत्ति घटते नहीं वरन् विद्युत वेग से विकसित होते हैं। निस्वार्थ दान एक ऐसी सेवा है जिसका फल न केवल इस संसार में वरन् परलोक में भी प्राप्त होता है।
धन की उपयोगिता उसे सत्कार्यों में व्यय करने पर ही है। आप स्वयं उसका उचित उपयोग करें। यदि आप सदुपयोग करना नहीं जानते, तो ऐसे व्यक्तियों को दान दीजिए, जो यह कार्य उत्तम रीति से कर सकते हैं।
धन का सदुपयोग अनेक प्रकार से हो सकता है। अपने धन के कुछ भाग को दान में व्यय कीजिए। ऐसी संस्थाओं को दान दीजिए जो समाज सेवा कार्य करती हैं। पुस्तकालयों में, औषधालयों तथा धर्मशालाओं में दान देकर आप पीड़ित मानवता की अच्छी सेवा कर सकते हैं। ज्ञान, भक्ति, कर्म का प्रचार करने वाली उच्चकोटि विश्वस्त संस्थाओं को सहायता प्रदान करना चाहिए। अनाथालयों में वस्त्र, अन्न इत्यादि उपयोगी वस्तुएं दीजिए। जहाँ तक बने पीड़ित जनता की सहायता कीजिए। यह स्मरण रखिये कि आपके दान से लोग निकम्मे, आलसी और मुफ्तखोर न बन जाए।
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1947
| Newer Post | Home | Older Post |
