Wednesday 22, April 2026
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अखण्ड-ज्योति से
किशोरों के निर्माण में शिक्षा दीक्षा का अपरिहार्य महत्व है! सभ्य और सुशील होने पर भी बालक मृगछौने जैसे भोले होने पर भी अबोध पशु ही रह जायेंगे। अशिक्षित विनम्र भी पूरी तरह सभ्य नहीं कहा जा सकता! शिक्षा सभ्यता तथा नागरिकता की आधारशिला है। इसलिए बच्चों का पढ़ाया जाना भी बहुत आवश्यक है। विद्याध्ययन के विषय में किशोरावस्था में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस अवस्था में यदि उन्हें विद्या के प्रति उदासीनता से पारित कर शिक्षा की ओर विशेष तौर पर उन्मुख कर दिया जाता है तो वे स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद भी अध्ययनशील बने रहते हैं। बाल्यकाल से लेकर किशोरावस्था ही शिक्षा के संस्कार डालने के लिये सबसे उपयुक्त आयु है। इस समय बालकों की बुद्धि बड़ी ही कोमल तथा ग्रहणशील होती है। इस समय के थोड़े से ही अभ्यास से वे बहुत कुछ ग्रहण कर लेते हैं। आगे चल कर उनकी बुद्धि विकसित होने के साथ-साथ प्रौढ़ भी हो जाती है जिससे जल्दी पाठ ग्रहण नहीं कर पाती! सयाने हो जाने पर उन्हें पढ़ने में कुछ शर्म भी आती है और उन का उद्दण्ड मन पढ़ने में लगता भी नहीं! इसलिये बाल्यकाल से लेकर किशोरावस्था तक बच्चों की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।
प्रचुर सम्पत्ति का स्वामी होने पर भी शिक्षा शून्य मनुष्य समाज में अधिक आदर नहीं पाता, उसका क्षेत्र अपने जैसे अशिक्षित व्यक्तियों तक ही सीमित हो जाता है। वह समाज के बुद्धिमानी लोगों के बीच घुल-मिल नहीं सकता। उसका परिचय संसार की गतिविधियों से नहीं हो पाता। वह अपने व्यापार व्यवसाय तक ही कूपमंडूक बना रहता है। कूप मंडूकता से स्वार्थ एवं संकीर्णता का प्रादुर्भाव होता है। तब ऐसी दशा में किसी से अच्छे नागरिक बनने की आशा करना उचित नहीं कहा जा सकता।
अशिक्षित धनवान अपने धन का उचित उपयोग नहीं कर पाता। या तो वह बहुधा कृपण हो जाता है अथवा अपव्ययी। यह दोनों अवस्थायें किसी अच्छे नागरिक के उपयुक्त नहीं कही जा सकतीं! अच्छा नागरिक बनकर अपने अधिकार तथा कर्तव्यों को ठीक से समझने तथा उपयोग करने के लिये शिक्षा की बहुत बड़ी आवश्यकता है। किसी भी अभिभावक को अपने बालकों को अशिक्षित नहीं रखना चाहिये। उन्हें हर अवस्था हर दशा तथा हर परिस्थिति में शिक्षा दिलानी ही चाहिए।
धार्मिक शिक्षा के अंतर्गत बालकों को शिष्टता, उदारता, श्रमशीलता, सदयता, स्वच्छता आदि के नियमों का अभ्यास करा देना तथा सत्य, शिष्ट, विनय, मधुर एवं प्रसन्न व्यवहार का अभ्यस्त बना देना ही आवश्यक होगा! प्रातः जागरण, भ्रमण, व्यायाम, शुद्ध सात्विक भोजन, स्नान, संयम, निवास, वास तथा वसनों की सादगी स्वच्छता तथा मनोयोग से अध्ययन की प्रवृत्ति पैदा कर देना बच्चों को धार्मिक शिक्षा दिया जाना है। प्रवृत्ति से प्रेम और ईश्वर पर आस्था उनके लिये ब्रह्मविद्या की तरह ही लाभकारी होगा। माता पिता भाई बहनों, गुरुजनों, साथियों संपर्कों तथा अन्य सर्व साधारण से उन्हें किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये इसका ज्ञान करा देने का अर्थ होगा कि आपने उन्हें मानो योग साधना की शिक्षा दे दी।
किशोरों के लिये घर का वातावरण, शिक्षा तथा धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करने वाले अभिभावक अवश्य ही समाज को सभ्य एवं सुशील नागरिक प्रदान करके श्रेष्ठ सौभाग्य के भागी बनेंगे।
समाप्त
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1966
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