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Monday 25, May 2026

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विश्वास की परीक्षा संकट में होती है | Vishwas Ki Pariksha Sankat Me Hoti Hai | Dr Chinmay Pandya

विश्वास की परीक्षा संकट में होती है | Vishwas Ki Pariksha Sankat Me Hoti Hai | Dr Chinmay Pandya

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अमृत सन्देश:- तपस्वी बनो, शक्तिशाली बनो। Spiritual Warrior

अमृत सन्देश:- तपस्वी बनो, शक्तिशाली बनो। Spiritual Warrior

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माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते है, Mata Tere Charno Me Hum Shish Jhukate Hai॥

माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते है, Mata Tere Charno Me Hum Shish Jhukate Hai॥

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 25 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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घर के रिश्तों में छुपा है अध्यात्म का ज्ञान। Ghar ke Rishton Mein Chhupa Hai Adhyatmik Gyaan अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



आध्यात्मिक सिद्धांतों को आपको व्यवहार में उतारने के लिए जैसी सुंदर प्रयोगशाला जैसी सुंदर लेबोरेटरी ऐसी आप कहीं तलाश करना चाहे तो कहीं  मिल ही नहीं सकती जिनके एहसान आपके ऊपर हैं उन एहसानों को चुकाइये ना पिता आपके जिंदा हैं ना हां जिंदा हैं और आपकी मां जिंदा है हां जिंदा है आप एहसान नहीं चुकाते नहीं साहब हम तो अपेक्षा करते रहते हैं और हम तो बीवी पर ही ध्यान देते हैं और अपने बच्चों के लिए ही सामान लाते रहते हैं और बुढ़िया को तो दमे की शिकायत है और 1 दिन कह रही थी हमारे लिए दवाई का इंतजाम कर दीजिए हमने नहीं किया और आपको अपने बड़ों के ऊपर एहसान के ऊपर है एहसान जिनके ऊपर हैं उनका चुकाना आप नहीं सीखेंगे आप माता की सेवा नहीं करेंगे क्या आप यह उम्मीद रखेंगे कि आपके बच्चे आपकी सेवा करें आपको वह ध्यान नहीं है क्या इससे अच्छी प्रयोगशाला हम कहां से लाए आपके लिए जो श्रेष्ठ गुण श्रेष्ठ गुण जो आप को विकसित कर सकते हैं वह आप कहां से सीख पाएंगे तो हम कौन सी जगह जाएंगे कौन सा योगाभ्यास आप तलाश करेंगे किसका मार्गदर्शन करेंगे एक ऐसी शानदार लेबोरेटरी जो आपको पहले से बनी हुई रखी है परिवार के रूप में क्या आप उसको सही नहीं कर सकते आप वैसा परिचय नहीं दे सकते जैसा कि आपकी धर्मपत्नी ने दिया है त्याग का सेवा का परोपकार का आत्मसमर्पण का वह सिद्धांत जो गीता में बताए गए हैं एक महिला करती रही आपके घर में आप उन सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करेंगे आपकी धर्मपत्नी घर से आईना अपने बाप को और अपने भाई को और अपनी बहन को छोड़कर आईना आई आई और आने के बाद में आपके घर आ गई ना अपनी जवानी अपना रंग अपना रूप अपना पुरुषार्थ आपकी हथेली पर रखा ना हां साहब रखा घर से जो लाई थी मां बाप के यहां से यह जेवर लाई थी पैसा लाई थी कपड़े लाई थी अपने सास के हाथ पर रखा ना हां साहब सास के हाथ पर रखा और जब आपको जरूरत पड़ गई थी अपना जेवर बेच देने की या गिरवी रख देने की तो आपकी बीवी ने दे दिया ना हां दे दिया था और आपकी आपकी प्रसन्नता के लिए आपकी खुशहाली के लिए क्या नहीं कि आप की बीवी ने और चौकीदारिन की तरीके से चौकीदारिन की तरीके से आपकी सेवा में लगी लगी रही उसके शरीर में गुंजाइश थी कि नहीं थी लेकिन जब आपने बच्चों की डिमांड की तो आपकी प्रसन्नता के लिए अपने शरीर में से अपने शरीर में से मांस के लोथड़े काट काट के बच्चों के लिए बच्चों के रूप में आपके सामने रखी ना त्याग इससे ज्यादा होता है कोई और कैसा त्याग होता है इसमें अट्ठारह घंटे काम करने वाली है चार छह घंटे कैसे सो जाती है गरीब सो जाने के बाद में रूखी रोटियों के ऊपर आप फटे हुए कपड़ों के ऊपर ना जिसने अपना वेतन मांगा न कभी पैसा मांगा न प्रोविडेंट फंड मांगा न बोनस मांगा न ग्रेच्युटी मांगी इस तरीके से नौकरानी के तरीके से सारी जिंदगी खपा दी और और आप कैसा अध्यात्म चाहते हैं और कैसा अध्यात्म चाहते हैं आपको एक सिखाने वाला मास्टर नहीं मिला आपकी मां नहीं है आपके पास आपको जो अध्यात्म सिखा सके कलेजे का खून निकाल कर के सफेद दूध के रूप में किस तरीके से अपने बच्चों के लिए खर्च किया जा सकता है स्वयं सूखे सूखे में गीले में सो करके बच्चों में सूखे में कैसे सुखाया जा सकता है आपने देखा नहीं अध्यात्म का वातावरण अध्यात्म का वातावरण मैं कहां से लाऊंगा आपके लिए आप गुफा में जाएंगे आप आप आप उसमें जाएंगे आश्रम में जाएंगे आश्रम कहां से लाएंगे इससे बड़ा आश्रम कहां है आपके लिए कौन सा जिसमें आपकी बीवी रहती है जिसमें आपकी मां रहती है जिसमें आपकी बहन रहती है आपको संयम सिखाने के लिए भी कहां ले जाऊंगा आपको ब्रह्मचर्य के लिए कहां शिक्षा दूँ आप अपनी बहन से सीख लीजिए ना जवान लड़की को देख कर के आपकी आंखों में शैतान तो नहीं आता नहीं शैतान तो नहीं आता तो बहन सिखाती है आपको और आपकी बेटी सिखाती है आपको आंख में शैतान नहीं आना चाहिए जवान जवान औरत को देख कर के भी आंखों में शैतान नहीं आना चाहिए इसका व्यावहारिक शिक्षण देने के लिए आपकी लड़की जितनी ज्यादा आपकी अध्यापिका हो सकती है और कौन सी अध्यापिका लाऊं आपके लिए कौन सा महात्मा लाऊं आपके लिए संत कहां से लाऊं मैं आपके लिए विद्वान कहां से लाऊं मैं योगी कहां से लाऊं मैं आपको जो इस बात को सिखा नहीं सके आपको आपकी बीवी सिखा सकती है आपको बेटी अलग तरीके से नसीहत देती है और आपकी मां अलग तरीके की नसीहत देती है आपका छोटा बहन भाई अलग तरह की नसीहत देता रहा आपकी मां अलग तरीके की नसीहत देती है उन आध्यात्मिक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने के लिए आप पूरी तरीके से पूरी तरीके से इस लेबोरेटरी में इस प्रयोगशाला में शरीर में सब कुछ सीख सकते हैं

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अखण्ड-ज्योति से



“मुझे इस सुनहरे रंग के मेमने की आवश्यकता है। तुम इसके बदले जितना धन चाहोगे मैं देने को तैयार हूँ।”
परशिया के राजा ने हंगरी के राजा मत्थियस के गड़रिये को प्रलोभन देते हुए कहा।

‘मैं राजसिंहासन के सम्मुख असत्य भाषण नहीं कर सकता। यह सब राजा की भेड़े है मैं उनकी आज्ञा के बिना किसी के स्पर्श पर देने को तैयार नहीं हूँ “गड़रिये ने उत्तर दिया।
गड़रिये बड़ा ईमानदार और सत्यवादी था। हुआ यह कि उस दिन परशिया के राजा अपनी अविवाहित युवा पुत्री के साथ मत्थियस के अतिथि बने। बातों ही बातों में गड़रिये की चर्चा निकल पड़ी। मत्थियस ने अतिथि को बताया −कि गड़रिया हमेशा सत्य भाषण करता करता हैं।

बड़े से बड़े प्रलोभन भी उसे विचलित नहीं कर पाते। यही कारण है कि पिछले कितने ही वर्षों से वह मेरे पास कार्य कर रहा है”
“असम्भव! ऐसा हो ही नहीं सकता।”
“यदि मैं उसने असत्य भाषण न करवा सका तो आधा राज्य हर जाऊँगा।”
“और यदि वह असत्य बोल गया तो मैं आधा राज्य हार जाऊँ गा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा आपके सामने करता हूँ।” मत्थियस ने जोशा में कहा।

रात्रि के भोजनोपरान्त परशिया का राजा अपने शयन कक्ष में आया और पलंग पर लेटे−लेटे काफी रात तक यही सोचता रहा कि इस गड़रिये से कैसे असत्यवादन करवाया जाये। फिर उसे ध्यान आया कि आज शाम को जब वह भेड़े चराकर वापस लाया था तब उनमें एक छोटा सा मेमना सुनहरे रंग का था। यदि अधिक से अधिक धन का प्रलोभन देकर उसे खरीद लिया जाये तो उस मेमने सुनहरे रंग का था। यदि अधिक से अधिक धन का प्रलोभन देकर उसे खरीद लिया जाये तो उसे मेमने के गायब होने की कोई कल्पित कहानी गढ़ कर राजा के सम्मुख कहनी होगी। जिससे मत्थियस का अहं चूर चूर हो जायेगा।

कंचन से अधिक प्रलोभन कामिनी का होता है। ऐसा सोचकर राजा ने अपनी अपूर्व सुन्दरी कन्या को गड़रिये के पास भेजा। उसे इस बार पूर्ण विश्वास था कि हमारा बार खाली न जायेगा। बड़े बड़े ईमानदार और संयमी व्यक्ति तक कंचन और कामिनी के प्रभाव में प्रभाव में आकर फिसलते देखे गये है। फिर वह तो एक साधारण−सा पशु−पालक है। राज कन्या गड़रिये के पास जाकर कहने लगी— “तुम्हारी भेड़ों में यह छोटा सा मेमना देखने में कितना सुन्दर लगता है। काश! यह प्यार मेमना मेरे पास होता तो मैं इस और लाड़−दुलार से रखती। इसके केश और मेरी केश राशि में कितना साम्य है। तुम यह मेमना मुझे दे दो। इसके बदले तुम जितना द्रव्य चाहोगे मैं तुम्हें अपने पिता से दिलवा दूँगी। और मैं सदा तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगी। भद्र, पुरुष मेरा प्रस्ताव स्वीकार लो। मैं तुम्हारे लिए एक शीतल पेय भी लायी हूँ। “

गड़रिये को उस पर समय प्यास लग रही थी। उसने राजकुमारी के हाथ से जल−पात्र लेते हुए कहा−”मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम प्रलोभन देकर इस मेमने को लेना चाहती हो। पर मैं किसी भी मूल्य पर अपनी ईमानदारी और जिम्मेदारी बेच नहीं सकूँगा।”

गड़रिये ने पात्र को ओठ से लगाया और उसे रिक्त करके राजकुमारी को वापस कर दिया। वह समझ गया कि यह मधुर जल नहीं वरन् तीखी मदिरा है। शनैःशनैः उसे मूर्छा आने लगी। मौका पाकर राजकुमारी ने उस मेमने को उठा लिया और राजभवन वापस आ गई। पिता ने जब पुत्री को गोदी में मेमना देखा तो वह खुशी से चीख पड़ा −”बेटी! तुमने आज मेरे मन की मुराद पूरी करदी अब मैं मत्थियस, परक्षिया के राजा, उनकी युवा पुत्री तथा अन्य कई मन्त्री भी बैठे चर्चा कर रहे थे। युवा पुत्री तथा अन्य कई मन्त्री भी बैठे चर्चा कर रहे थे। उसी समय गड़रिया आया। उसने सबको उचित अभिवादन कर बड़े शिष्टाचार के साथ कहा −”राजन! आज मैंने सुनहरे मेमने को उससे भी सुन्दर मेमने से बदल लिया है। मेरा विश्वास है कि अपने लिये यह घाटे का सौदा नहीं है,और वह सुन्दर मेमना यह रहा,गड़रिये ने राजपुत्री की ओर संकेत करते हुए।

सारी बातें सामने आई। परशिया के राजा का सारा प्रयास व्यर्थ गया। एक सामान्य से गड़रिये की ईमानदारी और सत्यवादिता पर सब मुग्ध थे। परशिया नरेश अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार आधा राज्य हार चुके थे। मत्थियस ने यह जीता हुआ राज्य गड़रिये को देते हुए कहा− “वत्स! तुम्हारी कर्त्तव्य निष्ठा से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।आज तुमने मेरे सम्मान की बहुत बड़ी रक्षा की है। मैं भी तुम्हें अपने राज्य का एक भाग पुरस्कार स्वरूप प्रदान करता हूँ। और तुम अब दोनों खण्डों के राजा हुए।”

परशिया का राजा खड़ा हो गया उसने कहा−”ईमानदारी और कर्त्तव्य मनुष्य का सबसे बड़ा गुण हैं। मैं ऐसे ही वर की तलाश अपनी लड़की के  लिए कर रहा था। मुझे ऐसा साहसी और सत्यव्रती युवक बहुत खोज के बाद पहली बार मिला है। अतः मैं अपनी कन्या क हाथ भी इसके हाथों में सौंप कर अपने भर को कम करना चाहता हूँ परशिया के राजा ने अपनी पुत्री का हाथ उस गड़रिये के हाथ में देकर बड़ी प्रसन्नता तथा सन्तोष का अनुभव किया। गड़रिये से राजा बनने वाले सम्राट इनो सेन्य की कथा−गाथा अभी भी मध्य एशिया के देशों में बड़े श्रद्धा भाव के साथ कही सुनी जाती है।

 अखण्ड ज्योति 1974 अप्रैल

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