Tuesday 21, July 2026
आत्मशक्ति का विकास | Atma Shakti Ka Vikas | Awakening the Inner Strength | Gayatri Pariwar
क्या सिर्फ कर्मकांड से भगवान मिल सकते हैं? Kya Sirf karmkaand Se Bhagwan Mil Sakte Hain? अमृत सन्देश:- पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी
ऐ मेरे दिल के टुकड़ों, कुछ करके तुमको दिखाना | Ye Mere Dil Ke Tukado | Pragya Geet,
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 21 July 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृत सन्देश:- तप की महिमा क्या हैं : परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
पार्वती जी की तो आप जानते हैं पार्वती जी एक साधारण से साधारण से राजा की बेटी थी हिमाचल राजा की लेकिन जब उनको तीनों लोकों के स्वामी भगवान शंकर जी से ब्याह करने का मन हुआ तो एक ही तरीका था तपस्वी तपश्चर्या से आदमी को यह साबित करना होता है कि हम इस लायक हैं लायक आप किस तरीके से पहचानेंगे किसी आदमी को हम कैसे जान पाए कि यह अच्छा आदमी है कि नहीं प्रामाणिक है कि नहीं इसका एक ही सबूत है कि उनने ऊंचे सिद्धांतों के लिए मुसीबत उठाई है तो हम यह कह सकते हैं कि यह तपस्वी है ऊंचे सिद्धांतों के लिए जिसने मुसीबत नहीं उठाई है उसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रमाणित है इस तरीके से पार्वती जी ने अपनी तपश्चर्या के द्वारा शंकर भगवान के सामने यह साबित कर दिया कि वह इस लायक हैं कि उनकी अर्धांगिनी बने यह तपश्चर्या से संभव हुआ और आपने कितने के नाम सुने हैं ध्रुव का नाम सुना है न ध्रुव क्या-क्या हो गए थे वह बहुत तेज हो गए थे तीनो लोक के स्वामी हो गए थे आकाश में रहते थे भगवान के प्यारे हो गए थे यह कैसे संभव हुआ तपश्चर्या के द्वारा आपने परशुराम परशुराम जी की बाबत सुना है उनके पास एक ऐसा कुल्हाड़ा था उस कुल्हाड़े को लेकर के इक्कीस बार उन्होंने अन्यायी लोगों का सिर काट डाला और फिर उन्होंने सारे संसार में नई स्थापना करने के लिए के लिए संसार को हरा-भरा बना दिया यह कैसे बना सकता था एक छोटा सा आदमी इसमें तपश्चर्या की शक्ति थी अगर भगवान परशुराम तपस्वी नहीं रहे होते तब तब वह बिल्कुल मामूली जैसे बाबा जी और ब्राह्मण पंडित रहते और यहां वहां कथा वार्ता करते रहते परशुराम जी का ऐसा कुल्हाड़ा यह लोहार के यहां से नहीं खरीदा जाता यह तपश्चर्या तपश्चर्या की शक्ति से उनको प्राप्त हुआ था और भी कितने ऋषि हैं आपको कहां-कहां तक बताएं अच्छा अगस्त्य ऋषि को आप जानते हैं अगस्त्य ऋषि ने तीन चुल्लू में समुद्र का पानी पी लिया था अगस्त्य ऋषि में शक्ति कहां से आ गई थी यह अगस्त्य ऋषि की शक्ति तपश्चर्या की शक्ति है तपश्चर्या अगर आदमी कोई न करे तब शक्तिवान हो जाएगा नहीं तपश्चर्या जो नहीं कर सकता वह सामर्थ्यवान नहीं हो सकता शक्तिशाली नहीं हो सकता
अखण्ड-ज्योति से
हम देखते हैं कि अनात्मवान व्यक्तियों के हाथ में जाकर योग्यताएं, विपत्ति का कारण बन जाती हैं। डाकू के हाथ में जाकर बन्दूक कहर बरसाती है, चोरों का संगठन बन जाय तो वह आफत खड़ी कर देता हैं, बेईमान दुकानदार भली-बुरी चीजें बेचकर ग्राहकों को दुख देता है, कायर सेनापति जीती बाजी को हरा देता है, एक रूपवती वेश्या अनेकों को व्यभिचारी बना देती है। इसी प्रकार लेखनी की, वाणी की, विद्या-वृद्धि की योग्यताएं अवाँछनीय व्यक्तियों के हाथ में जाकर भयंकर परिणाम उपस्थित करती हैं। यदि यही शक्तियां, यही योग्यताएं चरित्रवान व्यक्तियों के हाथ में हों तो उससे व्यक्तिगत और सामूहिक सुख-शान्ति में वृद्धि होती है। इसलिए योग्यताओं की जितनी आवश्यकता हैं उससे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि उनके हाथ में योग्यता रूपी शस्त्र थमाया जाय, जो उसके अधिकारी हों। यदि पात्रता उत्पन्न किये बिना शक्तियों का, योग्यताओं का सम्पादन किया तो परिणाम बहुत बुरा होगा। परमाणु शक्ति जैसी महाशक्ति को प्राप्त करके मनुष्य ने उसका उपयोग नाश के लिए, विपत्ति के लिए ही किया है।
हमसे कहा जाता है कि युवकों को अध्यात्म की शिक्षा मत दीजिए। उन्हें व्यापार, युद्ध, चिकित्सा, शिल्प, विज्ञान, लेखन, भाषण, राजनीति आदि की शिक्षा दीजिए। इसके उत्तर में हमारा विनम्र निवेदन यही है कि इन सब शिक्षाओं की निश्चय ही आवश्यकता है और अनेक सरकारी, अर्धसरकारी तथा धनीमानी सज्जनों द्वारा संचालित शिक्षालय इस प्रकार की शिक्षा दे भी रहे हैं। जिनके पास साधन हो वे अधिक तेजी से उन शिक्षाओं को जारी रखें, यहाँ तक तो सब कुछ ठीक हैं पर यह कथन ठीक नहीं कि युवकों को अध्यात्म की शिक्षा मत दीजिए। बिना मानवोचित गुणों का विकास हुए सभी शिक्षाएं निरर्थक ही नहीं अपितु हानिकर भी साबित होंगी।
यदि प्रश्नकर्ता सज्जन अध्यात्म को पंडे, पुजारी, भिक्षुक, बाबा जी आदि तक सीमित रहने वाला कर्मकाण्ड समझते हैं तो उनके कथन के विरुद्ध हमारे पास कोई दलील नहीं हैं। पर सच्चा अध्यात्मवाद दूसरी वस्तु है वह जीवन का मेरुदंड है, उसके बिना कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में न तो उन्नतिशील बन सकता है और न सुख शान्ति प्राप्त कर सकता है। वह आत्मा का भोजन है। अध्यात्म-जीवन की सर्वांगीण उन्नति और सुख−शांति का वैज्ञानिक साधन है इस साधन को अपनाने की जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले युवकों को ही सबसे अधिक आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947
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