Saturday 13, June 2026
निराश विद्यर्थियो के लिए गायत्री मंत्र एक औषधि | Nirash Vidyarthiyon Ke Liye Gayatri Mantra
आत्मसुधार ही असली तप क्यों है? Aatmasudhaar Hi Asli Tap Kyon Hai? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 13 June 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
भक्ति के साथ शिक्षा का प्रकाश भी होना चाहिए। अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भक्ति के साथ में शिक्षा का प्रकाश भी होना चाहिए
किसी आदमी को भूखा रहना पड़े तो कब तक जिंदा रहेगा कमजोर होता ही जाएगा दुबला होता ही जाएगा बीमार होता ही जाएगा बिना खुराक के बिना कब तक आदमी जिएगा और बिना खुराक के बिना हमारी भावनाएं और हमारा मस्तिष्क और हमारी विचारणाएं और हमारी अंतः करण कब तक जिएंगे स्वाध्याय हमारी जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता थी लेकिन भुला दिया लोगों ने उसकी कमी नहीं भर सकती इसी प्रकार से भगवान की भक्ति के भजन व कीर्तन आत्मा का पूरा कर देते लेकिन कैसा गंदा समय आ गया जब वो सारे की सारे चीजें सेवा की दूसरी संगीत की चीजों में छीन लिए गए जहां भगवान की भक्ति का भी नाम होता है वहां रूखे और नीरस कीर्तन भर होते हैं और उसमें केवल केवल मात्र भगवान के नाम को ही बार बार दोहराया जाता रहता है नाम भगवान का दोहराया जाना चाहिये लेकिन साथ साथ में शिक्षा का प्रेरणा का दिशा का प्रकाश का समावेश भी होना चाहिए
अखण्ड-ज्योति से
वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जो विद्या पढ़ने से जी चुराते हैं। भिखारी को दाता के सामने जैसे तुच्छ बनना पड़ता है वैसे ही तुच्छ यदि तुम्हें शिक्षकों के सामने बनना पड़े तो भी शिक्षा प्राप्त करना ही कर्तव्य है। मनुष्य जाति के सच्चे नेत्रों के नाम हैं (1) अंक (2) अक्षर। जो पढ़ा लिखा है वही नेत्रवान् है, जिसने विद्या नहीं पढ़ी वह तो अन्धा है। उसके माथे में तो दो गड्ढ़े मात्र है नेत्र नहीं।
विद्वान पुरुष सुगन्धित पुष्पों के समान हैं, वे जहाँ जाते हैं वही आनन्द साथ ले जाते हैं। उनका सभी जगह घर है और सभी जगह स्वदेश है। विद्या धन है। अन्य वस्तुएं तो उसकी समता में बहुत ही तुच्छ हैं। यह धन ऐसा है जो अगले जन्मों तक भी साथ रहता है। विद्या द्वारा संस्कारित की हुई बुद्धि आगामी जन्मों में क्रमशः उन्नति ही करती जाती है और उनके जीवन उच्चतम बनते हुए पूर्णता तक पहुँच जाते हैं।
कुँए को जितना गहरा खोदा जाए उसमें से उतना ही अधिक जल प्राप्त होता जाता है। जितना अधिक अध्ययन किया जाय, मनुष्य उतना ही ज्ञानवान बनता जाता है। विश्व क्या है? और इसमें कितनी आनन्दमयी शक्ति भरी हुई है इसे वही जान सकता है जिसने विद्या पढ़ी है। ऐसी अनुपम सम्पत्ति को उपार्जन करने में न जाने क्यों लोग आलस्य करते हैं। आयु का कोई प्रश्न नहीं हैं, चाहें मनुष्य बूढ़ा हो जाए या मरने के लिए चारपाई पड़ा हो तो भी विद्या प्राप्त करने में उसे उत्साहित होना चाहिए क्योंकि ज्ञान तो जन्म जन्मान्तरों तक साथ जाने वाली वस्तु है।
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1942
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