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Saturday 30, May 2026

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सच्चे साधक का जीवन कैसा हो? Sacche saadhak ka jeevan kaisa ho? अमृत सन्देश:-  पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

सच्चे साधक का जीवन कैसा हो? Sacche saadhak ka jeevan kaisa ho? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 30 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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आत्मीयता सिर्फ परिवार में ही क्यों मिलती है। अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



परिवार के अलावा ना आप प्यार दे पाते हैं ना आप प्यार ले पाते हैं आपके सारे के सारे आप बाजार में जाइए औरतों के बीच में जाइए सब आर्टिफिशियल सब जाइए आर्टिफिशियल सब जाइए शिष्टाचार सब दुनिया में शिष्टाचार के अलावा आपको कहां क्या मिलेगा आत्मीयता आत्मा जिसके सामने नंगी हो जाती है आत्मा जिसको खोल करके अपने मन की बात कह सकती है यह कहां मिलती है आप बताइए ना मुझे यह सिर्फ एक ही एक ही फैक्ट्री में मिलती है एक ही कारखाने में मिलती है एक ही उद्यान में मिलती है और एक ही बगीचे में मिलती है उस बगीचे का नाम है कुटुंब इस कुटुंब में आपने इस कुटुंब ने सब कुछ दिया इस कुटुंब के लिए आपने जिंदगी खर्च कर डाली जानता हूं इसके लिए आपने लड़की लड़कों के शादी के लिए क्या नहीं किया मैं जानता हूं और आपने सारी जिंदगी भर अपने आपको हड्डियों को निचोड़ करके अपने ईमान को निचोड़ करके अपने भविष्य को निचोड़ करके सब कुछ जो भी कमाया उसमें क्या किया सिवाय इन्हीं के लिए तो दे गए इतना त्याग कर सकते हैं इतना तप कर सकते हैं इतना आप योगी हो सकते हैं इतने महात्मा हो सकते हैं इतने उदार हो सकते हैं इतने दानी हो सकते हैं और कौन-कौन से नाम लूं आपके लिए आपके लिए अभी मुझे और नाम लेना चाहिए था मैं क्या करूं मुझे ना मिला ही नहीं 1 दिन मेरा मन आया प्यार आया कि मैं राजा कर्ण कहूं आपको राजा कर्ण कहूं राजा कर्ण क्यों कह रहे थे राजा कर्ण जो कुछ भी कमाता था सब धर्म के लिए दान कर देता था आप बिल्कुल राजा कर्ण हैं जो कुछ भी जिंदगी भर कमाया है आपने आपने खाया क्या अरे साहब हम तो सूखी रोटी खा रहे हैं सब आपने उन्हीं के लिए उन्हीं के लिए खर्च कर दिया ना जिनको आप कुटुंबी कहते हैं साहब कुटुंबियों से नाराज हैं कुटुंबियों से नाराज क्यों होने लगा मैं तो कुटुंबियों को प्यार करता हूं मैं मैं मुझे तो कुटुंब कुटुंब शब्द प्राणों से प्यारा है यहां भी मैंने कुटुंब बसा दिया जंगल में आते थे वहां भी कुटुंब बसा दिया आप ने हमारी एक पुस्तक देखी नहीं है कौन सी हमारी एक पुस्तक है सुनसान के सहचर जब मुझे हिमालय पर जाना पड़ा जहां मुझे ऐसे स्थान पर रखा गया जहां की सब ओर एकांत सब ओर एकांत सब ओर एकांत शिवाय पहाड़ के अलावा और सिवाय मेरे अलावा सिवाय हवा के अलावा सिवाय घास पात के अलावा दूसरा कोई था ही नहीं चारों और सुनसान चारों और सुनसान मैंने कहा सुनसान की जिंदगी किस तरीके से जी जा सकेगी सुनसान में कैसे रहा जा सकेगा सुनसान में आदमी का गुजारा कैसे हो सकता है सुनसान में सुनसान में आदमी नहीं रह सकता आदमी नहीं रह सकता आदमी सुनसान का हिमायती नहीं है आदमी की बनावट सुनसान में रहने की नहीं है तो फिर मैं कैसे जिऊंगा सुनसान मैं मित्रों मैंने अपने आप को कितने लोगों को साथी बना लिया कैसा एक कुटुंब खड़ा कर लिया ख्वाबों का कुटुंब ख्यालातों का कुटुंब मित्रों का कुटुंब प्राणियों का कुटुंब आप उसको पढ़ना जरा किताब को बड़ी मजेदार किताब है

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अखण्ड-ज्योति से




श्रावस्ती नगरी में सर्वत्र तपस्वी सुधारक की ही चर्चा थी। लोभ और मोह, वासना और तृष्णा पर उन्होंने विजय पा ली थी। तत्वदर्शियों ने साधना से सिद्धि के तीन सोपान बताये हैं–’मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु’। साधु−सुधारक रूपी आरम्भिक दो सोपानों पर चढ़ चुके थे। उनके तप और त्याग से–निस्पृह जीवन चर्या से हर कोई प्रभावित था। लोगों की श्रद्धा एवं सम्मान के सुमन उन पर चढ़ रहे थे। उग्र साधन के ताप में इन्द्रियों की वासना विगलित हो चुकी थी। संयम और तितिक्षा की अग्नि में तपने के बाद मन ने वित्तेषणा की निस्सारता सिद्ध कर दी थी, पर अभी भी लोकेषणा मन के एक कोने में अपना अड्डा मजबूती से जमाये हुई थी। जिसके कारण साधना की अहम्यता पोषण पा रही थी। शास्त्रकारों ने लोकेषणा को सबसे सूक्ष्म और प्रबलतम शत्रु माना है जिस पर विजय पाना प्रायः कठिन पड़ता है। यही तपस्वी सुधारक के साथ हुआ। सम्मान और श्रेय प्राप्त कर सुधारक का अहंकार बढ़ता ही गया।

निरासक्त तपस्वी के प्रति उमड़ने वाली श्रद्धा ने वन, सम्पत्ति, वस्त्र आदि उपादानों के अम्बार लगा दिए। यह देखकर सुधारक के मन में वितर्क उठा कि–अब मेरी तपस्या सफल हो गयी। योग सिद्ध हो गया, जीवन मुक्ति का अधिकारी बन गया। अहंकार साधक के पतन का कारण बनता है। अनेकों स्थानों पर परिव्रज्या के निर्मित परिभ्रमण करने के उपरान्त जब वे आश्रम में वापिस लौटे तो वृद्ध गुरु की तीक्ष्ण दृष्टि से उनका अहंभाव छुपा न रह सका। एक दिन गुरु ने उन्हें पास बुलाया और कहा “वत्स! आश्रम में समिधाएँ समाप्त हो चुकी है। जाओ जंगल से समिधाएँ ले आओ। प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी करनी है। सुधारक ने उपेक्षा दर्शाते हुए कहा–”मुझे अब कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।” तत्वदर्शी गुरु भावी आशंका से चिन्तित हो उठे। उन्होंने स्नेह मिश्रित स्वर में कहा–”तात! तुम यह काम रहने दो, पर एक काम अवश्य करो। भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगरी में पधारे है। उनसे एक बार अवश्य मिल आओ।” सुधारक ने बुद्ध की ख्याति सुन रखी थी। मन में उत्कण्ठा भी थी मिलने की। गुरु के प्रस्ताव को स्वीकार करके वह महाप्राज्ञ से मिलने चल पड़े।

जैतवन बौद्ध बिहार में बौद्ध भिक्षुकों की मण्डली ठहरी थी। वहाँ पहुँचने पर सुधारक को मालूम हुआ कि बुद्ध भिक्षाटन कि लिए गये है। इतने भिक्षुओं के रहते हुए भी बुद्ध को भिक्षाटन के लिए जाना पड़ता है, यह बात सुधारक की समझ में न आ सकी। खोजते−खोजते एक गृहस्थ के यहाँ भीख मांगते बुद्ध से उनकी भेंट हो गयी। अपना परिचय सुधारक न स्वयं एक तपस्वी के रूप में दिया तथा बन्धन मुक्ति का उपदेश देने का आग्रह किया। महाप्राज्ञ मौन रहे और सुधारक के साथ जैतवन वापिस लौटे। रात्रि विश्राम करने का आदेश देने तथा प्रातः− कान सम्बन्धित विषय पर चर्चा करने के साथ संक्षेप में वार्ता समाप्त की।

दूसरे दिन भगवान बुद्ध के सामने अपनी जिज्ञासा लिए सुधाकर बैठे थे। अंतर्दृष्टा महाप्राज्ञ से सुधारक की स्थिति दर्पण की भाँति स्पष्ट थी। तपस्वी और त्यागी होते हुए भी सुधारक अहंकारी है, यह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से, वे देख चुके थे। उनकी मर्मभेदी वाणी फूट पड़ी–”वत्स! जीवन मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक है–अहंकार। यह लोकेषणा की कामना से बढ़त है, पर निरासक्त कर्मयोग–सेवा भावना से भावना से घटता है। लोकसेवा में निरत होकर ही अहंकार पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की उच्चस्तरीय अनुभूति इस सेवा साधना से ही सम्भव है।”

सुधारक को अपनी भूल ज्ञान हुई। भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर उन्होंने क्षमा माँगी और लोकसेवा में प्रवृत्त होकर अपनी अवरुद्ध आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में लग गये।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मई 1982 

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