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Monday 04, May 2026

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन






परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान की मोहब्बत गिलहरियों के लिए सुरक्षित है भगवान की मोहब्बत जब समुद्र पाटा जा रहा था तब गिलहरी आई और अपने बालों में मिट्टी भर ले जा रही थी समुद्र को भर रही थी बंदरों ने कहा गिलहरी तू क्या कर रही है तो उसने कहा तुम क्या कर रहे हो उन्होंने कहा हम समुद्र पर पुल बना रहे हैं क्यों सीता जी को वापस लाएंगे और रावण को मारेंगे तो फिर मैं गिलहरी कुछ भी नहीं कर सकती मैं गिलहरी अपने बालों में मिट्टी भर ले जाती हूं और समुद्र में डाल देती हूं ताकि समुद्र पटता हुआ और ऊंचा होता हुआ चला जाए और तुम्हारा रास्ता सरल होता हुआ चला जाए गिलहरी की हिम्मत गिलहरी की हिम्मत को लेकर चले गए गिलहरी को पकड़ ले गए बंदर और रामचंद्र जी की हथेली पर रखा उन्होंने कहा भगवान ने देखा छोटा सा जानवर उन्होंने कहा यह कौन है यह गिलहरी यह क्या करती है उन्होंने कहा यह अपने बालों में मिट्टी भर ले जाती है और समुद्र में पटक देती है क्यों इसीलिए कि हमारा समुद्र का समुद्र का पुल बनाने का मार्ग सरल होता हुआ चला जाए भगवान राम ने कलेजे से लगा लिया छाती से लगा लिया गिलहरी को और प्यार से उसके ऊपर हाथ फिराने लगे अंगुलियां फिराने लगे काली उंगलियां थी भगवान राम की कहते हैं कि वह काली अंगुलियों के निशान गिलहरी की पीठ पर अभी तक बने हुए हैं गिलहरियां जो दिखाई पड़ती हैं उन पर काली धारियां पाई जाती हैं सुनने में आया कि वह भगवान रामचंद्र जी के उंगलियों के निशान हैं क्या है क्या नहीं है मैं नहीं जानता लेकिन मैं जानता हूं भगवान का स्वरूप यही है भगवान की आदत यही है भगवान की परख यही है

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अखण्ड-ज्योति से




अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य निश्चित रूप से चुने हुए मणि-मुक्ता हैं। वर्षों के परिश्रम से हमने बहुत खोज-बीन के बाद इन आध्यात्मिक संचित पूँजी के धनी मानियों को एकत्रित किया और एक माला में पिरोया है। वे आज राख से ढके हुए अंगार की तरह निष्क्रिय भले ही दिखाई पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके भीतर एक चिनगारी मौजूद है, जो अवसर मिलते ही अपनी उष्णता एवं प्रकाश ज्योति का परिचय देगी। ऐसे लोगों की अन्तरात्माएं इस शुभ अवसर पर उल्लासित न हों, ऐसा संभव नहीं। अजान की आवाज सुनते ही हर दीनदार मुसलमान नमाज पढ़ने को उठ खड़ा होता है। मन्दिर में होने वाली शंख-ध्वनि सुन कर हर भावनाशील हिन्दू उपासना के लिए प्रस्तुत होता है।* बिगुल बजते ही सैनिक दौड़ कर मैदान में पंक्ति बद्ध हो जाते हैं। घण्टी बजते ही सर्कस का खेल आरम्भ हो जाता है। इस वर्ष का बसन्तोत्सव कुछ ऐसी ही नवीन प्रेरणा लेकर उपस्थित हुआ है।* जिसका उद्देश्य हम में से हर किसी की उदासीनता, उपेक्षा एवं अकर्मण्यता का निराकरण करके रख देना है।

कहना न होगा कि यह ऐतिहासिक अवसर है। हजारों वर्षों बाद युगान्तर का पुण्य पर्व आता है। जब आता है तब जागृत आत्माओं के कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारी डालता है। आग लगने पर फायर ब्रिगेड वाले पुकारे जाते हैं और उन्हें तत्परतापूर्वक अपना काम पूरा करना होता है। उपद्रव होने पर पुलिस को पुकारा जाता है, सीमा आक्रमण का मुकाबला करने के लिए सैनिकों को तुरन्त मोर्चा सम्भालना पड़ता है, दुर्घटना में घायलों की मरहम पट्टी करने के लिए डाक्टरी दस्ता सब काम छोड़कर उसी में जुट जाता है, बाढ़, भूकम्प, अग्निकाण्ड, महामारी आदि आकस्मिक विपत्तियों में पीड़ितों की सेवा सहायता के लिए हर सहृदय व्यक्ति को तुरन्त दौड़ना पड़ता है। आज की स्थिति ठीक ऐसी ही है।

युगान्तर, प्रसव पीड़ा की तरह इस संसार के लिए मानव-जाति के लिए विषम विभीषिकाओं जैसी अगणित समस्यायें लेकर आँधी-तूफान की तरह बढ़ता चला आ रहा है। ऐसे आपत्तिकाल में कोई जागृत आत्मा “निर्वाह में व्यस्त होने” का बहाना लेकर अपने महान आध्यात्मिक उत्तरदायित्व की उपेक्षा नहीं कर सकती। ऐसे अवसरों पर आत्मा की, परमात्मा की, भाव भरी पुकार को अनसुना कर सकना किसी पाषाण हृदय के मूढ़ मानव के लिए ही सम्भव हो सकता है।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
अखण्ड ज्योति 1968 फरवरी

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