Wednesday 21, January 2026
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अमृत सन्देश:- युग निर्माण के लिए आगे बढ़िए | Yug Nirman Ke Liye Aage Badhiye
वसंत जब जीवन में उतरता है | Vasant Jab Jeevan Me Utarta Hai | Shraddheya Shailbala Jiji
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
लोगों को यह गलतफहमी हो गई है, की गुरुजी का जो काम है, यह हम नौकरों से करा सकते हैं, नौकरों से नहीं करा सकते, आप से ही करा सकते हैं देखिए, 24 घंटे का आपके पास समय है, आप अगर मान लीजिए मेहनत मजदूरी से गुजारा करते हैं तो, 8 घंटे आपके गुजारे के लिए काफी होने चाहिए 7 घंटे सोने के लिए काफी होने चाहिए, 5 घंटे में नित्य कर्म और इधर-उधर के काम कर लेने चाहिए आप चाहे तो 4 घंटे बचा सकते हैं, आप घर गृहस्थी का पूरा काम करते हुए भी, निश्चित रूप से बचा सकते हैं आप मान लीजिए बीमार हो जाए तब, तब समय बचेगा कि नहीं बचेगा आप यही समझ लेना हम रोज 4 घंटे रोज बीमार हो जाते हैं आप 4 घंटे रोज समय निकाल पाए तो मेरे उन हीरो में आप शुमार हो जाएं जिनको मैं बहुत संभाल-संभाल के रखूँ, डिब्बी में बंद करके रखूँ, छाती से चिपका कर के रखूँ, गले में माला पहना कर रखूँ, समय दीजिए आप हमें, किस काम के लिए समय जन जागृति के लिए और काहे के लिए समय चाहिए। गुरुजी आपके पैर दबाया करें, पंखा झला करें, ना भाई साहब, हमें पैर दबाने की जरूरत है, ना पंखा झलने की जरूरत है, नहीं आप कमजोर बुड्ढे हो गए हैं, आपकी मालिश कर दिया करें, ना भाई साहब, हमें मालिश कराने की जरूरत है, ना कुछ जरूरत है, हमें तो सिर्फ एक ही काम की जरूरत है कि जो समय है, वह समय की पुकार और समय की मांग इतनी तेज होती जाती है, कि हमारे कान फटे जाते हैं। उसको हम अकेला जिस सीमा तक करते हैं, वह कम पड़ता है इसीलिए, आपके सहयोग की बहुत जरूरत है। आप 4 घंटे रोज, 4 घंटे में सही 3 घंटे दीजिए, 3 घंटे नहीं सही, नहीं सही 2 घंटे से कम मे तो, किसी तरह काम चले 2 घंटे से कम समय देना तो फिर बिल्कुल बेकार है। उसमें तो कुछ काम ही नहीं बनता, फिर तो आप उन्ही में से रहिए 24 लाखों में, जो जब बसंत पंचमी होती है तो हवन करने आ जाते हैं और जब कुछ और होता है गायत्री जयंती तो जूलूस में शामिल हो जाते हैं, फिर आप उन्हीं में रहिए
अखण्ड-ज्योति से
पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मसाधना के २४ वर्ष
सन् १९९० से सन् २०१४ का वसंत सचमुच देखो तो २४ वर्ष पूर्ण हुए। उन्होंने कहा था- "इन चौबीस वर्षों में चौबीस पुरश्चरण तो नहीं किए जाने, फिर भी बहुत कुछ विशेष किया जाना शेष है। इन चौबीस वर्षों के बाद एक नए क्रम का आरंभ होगा।" जहाँ तक बात इस चौबीस साल की अवधि की है तो यह अवधि तोड़-फोड़ की थी। इस कार्य के लिए बात जहाँ तक प्रत्यक्ष और परोक्ष जगत की है, तो प्रत्यक्ष जगत में इसका माध्यम बनी-प्रकृति व जनता और परोक्ष जगत में इसका माध्यम बनी- अपशक्तियाँ या नकारात्मक शक्तियाँ और रुद्रगण।
इन चौबीस वर्षों में प्रकृति किस कदर कहर ढाती रही है और जनसामान्य ने संपूर्ण विश्व में कैसे उलट फेर किए हैं, ये सब हम सबने देखा है। ये सब अनियंत्रित न होने पाए तथा इसका उद्देश्य सकारात्मक बना रहे, अब तक की गई गुरुदेव की साधना इसीलिए थी। अब इस वसंत पर्व से स्थिति में परिवर्तन आने वाला है। हम सबको भली प्रकार याद है कि वसंत, १९९० में गुरुदेव ने एकांत वास लिया था। साथ ही एक पत्रक भी लिखा था, 'वसंत पर्व पर महाकाल का संदेश'। इसी वर्ष गायत्री जयंती को यानी कि २ जूम, १९९० को उन्होंने अपने स्थूलशरीर का परित्याग किया था। इस वर्ष यानी कि २०१४ की गायत्री जयंती को इसके भी चौबीस वर्ष पूरे हो जाएँगे। जहाँ तक इस वर्ष नए आरंभ का सवाल है तो इसके लिए उन्होंने कहा था- "सन् २०१४ की वसंत पंचमी से धरती की कक्षा से नकारात्मक शक्तियों के विदा होने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी।"
जो अंधकार की परत अपनी संपूर्ण धरती की कक्षा पर छाई हुई है, उसके हटने का क्रम प्रारंभ हो जाएगा, फिर भी यह कार्य एक दिन या एक वर्ष में नहीं हो पाएगा। इसमें दो से तीन वर्ष तक का समय लग सकता है। इसलिए इसमें नकारात्मक घटनाएँ, प्राकृतिक आपदाएँ तो अवश्य घटेंगी, परंतु उनकी तीव्रता में कमी होगी, साथ ही उन्हें नियंत्रित भी किया जा सकेगा। धरती की कक्षा से अंधकार की संपूर्ण परत को हटा देना एक दुष्कर, दुःसाध्य कार्य है। तमस् के इस महाआवरण को तोड़ने के लिए पूज्य गुरुदेव ने सौरशक्तियों के प्रयोग व सूर्य-साधना की बात कही थी। उनके अनुसार इन तीन वर्षों की अवधि में उन्हें कुछ इसी तरह के पुरुषार्थ करने पड़ेंगे, जैसे कि उनके शरीर रहते सूक्ष्मीकरण साधना में किए गए थे। ये तीन वर्ष, अर्थात २०१४, २०१५ 'एवं २०१६ कठिन तो हैं, परंतु ये 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का, अर्थात तमस् के अँधियारे से प्रकाश के उजियारे की ओर बढ़ चलने का संदेश भी देते हैं, जो कि शुभ और सुखद है।
उन्होंने कहा था कि योगशास्त्र में महर्षि पतंजलि ने योग अंतराल की चर्चा की है। इस अंतराल में साधक की साधना अवरुद्ध हो जाती है। वह बस, अपने कर्म, भोग व प्रारब्ध को काटता रहता है। उसका तप इसी हेतु खपता है। इस अंतराल की अवधि में उसके जीवन में कुछ भी शुभ व सुखद नहीं हो पाता। साथ ही उसकी साधना भी अवरुद्ध होती रहती है। बस, ठीक कुछ ऐसी ही स्थिति' धरती की कक्षा के लिए इन चौबीस वर्षों में बनी रही। बस, महाकाल के महातप के प्रभाव से सब कुछ नियंत्रित बना रहा। सर्वनाशी प्राकृतिक आपदाएँ आईं और नियंत्रित नुकसान करके चली गईं। युद्ध की विभीषिकाएँ उमड़ीं अवश्य, पर व्यापक विश्वव्यापी युद्ध का रूप नहीं लेने पाईं। आतंकी अलगाव के षड्यंत्र हुए अवश्य, पर देश की अखंडता सुरक्षित रही।
क्रमश: जारी.......
अखण्ड ज्योति 2014 फरवरी, पृष्ठ 5
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