Wednesday 12, August 2026
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 12 August 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
ईश्वर एक है, फिर इतने देवता क्यों? Ishwar Ek Hai, Phir Itne Devata Kyon? अमृत सन्देश:- परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
स्वाधीन मनुष्य को बनाया गया है और स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए मनुष्य कोशिश भी करता रहता है अब बात चलती है एक और आगे की कि यह स्वाधीनता पराधीनताओं से भरी हुई है स्वाधीनता तो है लेकिन पराधीन पराधीनता तो उससे भी ज्यादा है आदमी को सेनापति को यह स्वाधीनता तो है चाहे जिस तरीके से मौका ले वह सेना को पैदल चलाएगा हुकुम देने की पूरी छूट है यहां बंदूक चलानी चाहिए खाई खोदनी चाहिए बैठ जाना चाहिए पूरी तरीके से उसको स्वाधीनता दी हुई है की अपनी मिलिट्री में चाहे जिस तरीके से उपयोग करें गोला बारूद जो है जिसके सुपुर्द कर दे जिसको जहां चाहे वहां भगा दे जो भी इंतजाम करना चाहे अपनी आजादी से कर सके आजादी तो है ना लेकिन पराधीनता पराधीनता उससे भी उससे भी ज्यादा है कोई दूसरा सिपाही झपकी ले भी सकता है लेकिन झपकी लेने की उसको छूट नहीं है सेनापति को ड्यूटी पर जिस समय झपकी लेने लगा तब तब सैकड़ों हजारों सिपाहियों का सफाया हो जाएगा कौन जिम्मेदार होगा बंधन है जो जितना ज्यादा जिम्मेदार है उसके ऊपर उतना ही बंधन भी बंधन भी बंधा हुआ है सिपाही चाहे तो छुट्टी की बात भी कह सकता है चपरासी चाहे तो बिना कहे घर बैठ भी सकता है दो पाँच रुपये जुर्माना हो जाएगा लेकिन सेनापति गड़बड़ी कर दे तब तब सारे का सारा राज्य की स्वाधीनता ही संकट में जा पड़ेगी इसीलिए वह अनेक बंधनों से बंधा हुआ है घर से बीमारी की चिट्ठी आई है नहीं साहब बीमारी को मर जाने दीजिए जब सैकड़ों सिपाही यहां गोली के शिकार रोज होते हैं तो हमारी मां बीमार है और मां बीमार रहेगी तो क्या दिक्कत की बात है मर जाने दीजिए इतने आदमी मर गए एक मां भी मर गई नहीं साहब सामान्य आदमी के लिए हमारी जिंदगी में साहब मां मां कब मिलेगी ब्रह्म दर्शन कब करेंगे और अबकी बार तो जाना ही पड़ेगा कोई जरूरी काम है तो ही हम जाएंगे माताजी के दर्शन तो करेंगे तो उनके लिए तो बात समझ में आती है पर सेनापति के लिए कहां बात समझ में आती है सेनापति के लिए यह बात समझ में नहीं आती घर में शादी है ब्याह शादी है अरे ब्याह शादी है तो क्या करें होती रहती हैं दुनिया भर में बाजार में रोज सैकड़ों शादियां होती हैं नहीं साहब शादी में जाना पड़ेगा जो आदमी कमजोर तबीयत के हैं छोटे आदमी हैं उनके ऊपर तो यह बातें लागू होती हैं लेकिन किसी समर्थ और जिम्मेदार व्यक्तियों के ऊपर यह बातें लागू नहीं होती घर के ऊपर घर के ऊपर बहुत बंधन बंधे हुए हैं जो समाज की जिम्मेदारियां समझते हैं उनके ऊपर हजार बंधन बंधे हुए हैं वह अपने घर की और कुटुंब की परिवार की जिम्मेदारियां कभी-कभी छोड़ने पड़ते हैं तो वह छोड़ भी सकते हैं
अखण्ड-ज्योति से
बिना मनोयोग के कोई काम नहीं होता है। मन के साथ काम का सम्बन्ध होते ही चित्त पर संस्कार पड़ना आरंभ हो जाते हैं और ये संस्कार ही आदत का रूप ग्रहण कर लेते हैं। मन के साथ काम के सम्बन्ध में जितनी शिथिलता होती है, आदतों में भी उतनी ही शिथिलता पाई जाती है। यों शिथिलता स्वयं एक आदत है और मन की शिथिलता का परिचय देती है।
असल में मन चंचल है। इसलिए मानव की आदत में चंचलता का समावेश प्रकृति से ही मिला होता है। लेकिन दृढ़ता पूर्वक प्रयत्न करने पर उसकी चंचलता को स्थिरता में बदला जा सकता है। इसलिए कैसी भी आदत क्यों न डालनी हो, मन की चंचलता के रोक थाम की अत्यन्त आवश्यकता है और इसका मूलभूत उपाय है- निश्चय की दृढ़ता। निश्चय में जितनी दृढ़ता होगी, मन की चंचलता में उतनी ही कमी और यह दृढ़ता ही सफलता की जननी है।
जिस काम को आरम्भ करो, जब तक उसका अन्त न हो जाय उसे करते ही जाओ। कार्य करने की यह पद्धति चंचलता को भगाकर ही रहती है। कुछ समय तक न उकताने वाली पद्धति को अपना लेने पर फिर तो मनोयोग पूर्वक कार्य में लग जाने की आदत हो जाती है। तब मन अपनी आदत को छोड़ देता है अथवा बार बार भिन्न भिन्न चीजों पर वृत्तियाँ जाने की अपेक्षा एक पर ही उसकी प्राप्ति तक दृढ़ रहती है।
अमृतवाणी: ब्रह्म मुहूर्त का महत्व | Brahma Muhurta Ka Mahatva | https://youtu.be/MZv7gpk1pQc?si=vC7De3yYwr_z7YGu
मन निरन्तर नवीनता की खोज करता है। यह नवीनता प्रत्येक कार्य में पाई जाती है कार्य की गति जैसे जैसे सफलता की ओर होती है, उसमें से अनेक नवीनताओं के दर्शन होने आरंभ होते हैं। मन की स्थिति उस कार्य पर रहे-उसे छोड़कर दूसरे को ग्रहण करने के लिए नहीं-बल्कि उसी कार्य में अनेक नवीनताओं को देखने के लिए। मन की यह गति जितनी विशाल, जितनी सूक्ष्मदर्शिनी बनेगी, मन की एक काम छोड़कर दूसरे काम को अपनाने की वृत्ति में उतनी ही कमी आवेगी, दृढ़ता उतनी ही अधिक होगी।
आदत डालने के लिए निष्ठा एवं दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है। निष्ठा और दृढ़ संकल्प के लिए बुद्धि की तैयारी चाहिए। बुद्धि की मन पर अंकुश रखने की तैयारी हो तो संकल्प में भी दृढ़ता आती है और निष्ठा में भी। इसलिए ऐसे कार्यों को छोड़ने के लिए सतर्क रहना चाहिए जो बुद्धि को मन का दास बनाने वाले हों। बुद्धि का दासत्व स्थिरता का दुश्मन है, क्योंकि जब वह चंचल मन की आज्ञाकारिणी या वशवर्तिनि होगी तो निश्चित रूप से वह चंचल हो जायगी।
मन और बुद्धि पर अंकुश रखकर योग्य बनाने के लिए जीवन को प्रयोगावस्था में डालने की आवश्यकता है। इसके लिए मनुष्य को किसी भी निर्णित कार्यक्रम अनुसार चलने का निश्चय करना पड़ता है। कल जो करना है उसके लिए आज ही कार्यक्रम बना लेना चाहिए। साथ ही सोने के पूर्व उस कार्यक्रम पर दृढ़ रहने का निश्चय कर लेना चाहिए।
जो लोग रात को अधिक देर तक जागते रहते है उनके शरीर में आलस्य भरा रहता है इसलिए शरीर का यह आलसीपन कार्यक्रम को पूरा करने में सहायक नहीं होता बल्कि बाधक होता है। इसलिए शरीर का निरालस रहना भी कार्य साधन का एक अंग है। रात में जल्दी सोना और सवेरे जल्दी उठना आलस्य को जमने नहीं देता। साथ ही बुद्धि को सूक्ष्म आहिणी बनाता है जिस बुद्धि पर कि जीवन का सारा दारोमदार है।
‘बेकार न बैठो’ एक ऐसा सबक है जो मनुष्य को आलसी बनने से रोकता है। आलसी बनना मन को चंचल बनाना है और काम करना मन को एकाग्र करने का साधन है। काम करने के दो प्रकार हैं। पहला प्रकार है नियमित काम करना। नियमित काम करने से मन की चंचलता घटती है पर अनियमित काम करने की ओर जाना ही चंचलता का चिह्न माना जाता है। इसलिए यह पहले ही लिखा जा चुका है कि हमें प्रतिदिन सोने के पूर्व दूसरे दिन कार्यक्रम को निश्चित कर लेना चाहिए। या ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि नियमित रूप तथा व्यवस्थित ढंग से काम करने के लिए कार्यक्रम की आवश्यकता है, लेकिन इसका अर्थ कार्यक्रम के वशवर्ती होकर काम करना नहीं है। किसी चीज का दास होना बुरा है, उस पर नियंत्रण करना ही लक्ष्य है। इसलिए कार्यक्रम नियंत्रण स्थापित करने का साधन है, न कि साध्य। कार्यक्रम बना लेने के अनन्तर अकस्मात दूसरे दिन किसी अन्य कार्य करने आवश्यकता हो जावे तो कार्यक्रम में रद्दोबदल कर देना बुरा नहीं है। लेकिन मन की चंचलता के कारण या अपने आलस्य अथवा प्रमाद के कारण कार्य को न करना एक प्रकार की भयानक आदत को जन्म देता है जो कि मनुष्य सफलता से दूर निराशा के खाई खंदकों में पटक देती है, इसलिए आरंभ से ही सावधान रहना चाहिए और बिना किसी आवश्यक प्रयोजन उपस्थित हुए निश्चित कार्यक्रम एवं निश्चित समय की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
जो कार्य जितने समय में सुचारु रूप से हो सके उसे उतने ही समय में पूरा करना नहीं है। जल्दी करके कार्य को बिगाड़ देने से कार्यक्रम की पूर्ति नहीं होती इसलिए कार्य की सुन्दरता की रक्षा करने की ओर भी ध्यान रखने की आवश्यकता है। जिसके सामने सौंदर्य का लक्ष्य रहता है वह जल्दीबाजी से बचा रहता है और काम को बिगड़ने नहीं देता।
प्रायः देखा जाता है कि जल्दीबाजी समय की बचत नहीं करती बल्कि कार्यसिद्धि के समय को और बढ़ा देती है। यह भी मन की चंचलता के कारण होता है। जिस समय मनोनिग्रह को अपना लिया जाता है उस समय जल्दीबाजी की वृत्ति स्वयं ही हट जाती है। इसके अतिरिक्त व्यवहार में शालीनता आती है, शिष्टता आती है, सौम्यता आती है जो कि मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से चमका देती है और उसका प्रभाव मनुष्य के अन्तःकरण पर ही नहीं होता बाहरी आचरण खान पान पहनाव उढ़ाव पर भी होता है। सफलता पाने की कुंजी आदतों का निर्माण है, इसलिए अपनी आदतों पर ठीक रूप से निगरानी रखने की आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1948
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