Monday 27, April 2026
अमृतवाणी:- बीज की तरह गलें : भाग 01 | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya
आध्यात्मिक का एक ही नियम आत्मनियंत्रण । Adhyatmikta Ka Ek hi Niyam Aatmaniyantran. अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 27April 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
संघर्ष के बाद ही शिखर मिलता है
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
ब्रूसो बैठा हुआ था एक गुफा में तेरह बार परास्त हो गया था जब भी लड़ाई लड़ी जब भी लड़ाई लड़ी परास्त हो गया जब भी लड़ाई लड़ी डिफीट होती चली गई भाग करके बेचारा अपनी जान बचाने के लिए एक कुएं में छिपा हुआ बैठा था क्या करना चाहिए विचार मन में आ रहा था विचार मन में आ रहा था सामने की तरफ दीवार पर उसकी निगाह पड़ी हुई थी मकड़ी एक आई जाला बुना जाला टूट गया मकड़ी आई जाला त ना जाला ना बना सके मकड़ी आई फिर दोबारा कोशिश की लेकिन जाला पूरा ना हो सका तेरह बार उसने मकड़ी नहीं जाला त ना असफल होती चली गई चौदहवीं मकड़ी ने फिर हिम्मत की और फिर हिम्मत के साथ उसने सारे जाला बुनना शुरू किया और चौदहवीं बाहर जाला तैयार हो गया ब्रूसो ने कहा मकड़ी गंदी वाली मकड़ी 13 बार मैं हिम्मत नहीं हार सकती तो तब मुझे इंसान होकर राजा होकर अधीर हो करके क्यों हिम्मत हारनी चाहिए फिर दोबारा खड़ा हो गया 14वीं बार फिर उसने हिम्मत की और वह जीत गया इतिहास साक्षी है हिम्मतें हिम्मतें मनुष्य को आगे बढ़ाती हुई चली जाती है जीवन के लक्ष्य हम को निर्धारित करने होंगे जो भी आपका जीवन का लक्ष्य हो जो भी आप की दिशा हो उसमें आप बढ़ते हुए चले जाइए और बढ़ते हुए सफलताएं आपका स्वागत करने के लिए आरती उतारने के लिए खड़ी है
अखण्ड-ज्योति से
अपने आप में केन्द्रीभूत होकर हम उन समस्त सम्पदाओं से वंचित हो जाते हैं जो इस संसार के प्रत्येक कण में भरी पड़ी है। आहार-विहार के समस्त साधन बाहर ही उत्पन्न होते हैं और उन्हें उपार्जित करके उपभोग के द्वारा शरीर की गतिविधियाँ चलाते हैं। अपने हाथ पैर खाकर तो पेट नहीं भरते। शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, विवाह, विनोद आदि उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए भी दूसरों का द्वार खटखटाते हैं और जो जितने मात्रा में मिल जाता है उससे उतनी ही मात्रा में प्रसन्न होते हैं। वे एकान्त में बैठकर मनमोदक खाते रहने से हर्षोल्लास के अवसर प्राप्त नहीं ही होते। विविध विधि पदार्थों का सहारा लेना पड़ता है, जो अपने भीतर नहीं बाहर ही मिलते हैं।
दूर दर्शिता इस बात में है कि अपने को संकीर्ण संकुचित न बनाये वरन् संसार के साथ घुल मिलकर समुद्र के विशद क्षेत्र में विचरण करने वाली और जीवनोपयोगी समस्त साधन उपलब्ध करने वाली मछली की नीति अपनाये। बुद्धिमत्ता इस बात में है कि सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को अपनाकर आकर्षण के ऐसे केन्द्र बने जिस पर हर दिशा में अनवरत स्नेह सहयोग की वर्षा होने लगे कुशलता इस बात में है कि अपने उन दोष-दुर्गुणों को सुधारे जो प्रगति के प्रत्येक पग पर अवरोध बन कर खड़े होते हैं। प्रवीणता इस बात में है कि उदात्त चिन्तन का अभ्यास करे सद्व्यवहार की रीति-नीति अपनाये, अपने को दूसरों के साथ और दूसरों को अपने साथ घुला मिला कर देखे। आत्म विस्तार का यही रास्ता है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1975
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