फूल-काँटे
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(भगवती प्रसाद चित्रकार)
कुँज में गुलाब के एक पेड़ को देखा.....अत्यंत सघन और फैला हुआ............।
उसके फूल भी बड़े-बड़े होते। बहुत ही खूबसूरत जिनकी हल्की गुलाबी रेशमी पंखड़ियों को देखकर याद आ जाती किसी अपरूप सुन्दरी के अंधर बिंब की।
और उनमें से ऐसी मीठी मीठी खुशबू आती कि सारा कुँज सुगंध से भर उठता।
जो उस रास्ते गुजरता, एक बार ललचाई हुई नजरों से उसके सौंदर्य और सौरभ का पान कर ही लेता।
कोई-कोई तो खड़े के खड़े ही रह जाते और एक टक उसे निरखते, उनका हृदय आनंद से पुलकित हो उठता।
हाँ गुलाम के पास ही एक कटैले का पौधा था। छोटा सा छरहरा सा।
वह बदसूरत था। बद शक्ल था। उसमें भी फूल लगते-पीले पीले, अन्न कष्ट से द्रवित दरिद्र के पीले चेहरे की तरह।
और कोई भी उसके फूलों को ललचाई हुई नजरों से नहीं देखता, जिनसे गुलाब को।
सभी जानते इसके फूलों में सुगंध नहीं होती। लावण्य नहीं।
उस दिन गुलाब का वही प्रेमी आया। वह नित्य प्रति गुलाब के फूलों से अपनी नजर सेकता और सम्मान के साथ उनको निरखता। खुशामद से उसका जी भर देता।
उस दिन उसने चुन-चुन कर कुछ अच्छे खिले फूल लेने चाहे।
पेड़ के सिर पर जहाँ हाथों की मामूली पहुँच नहीं थी, दस-पाँच अच्छे फूल ये-बड़े-बड़े पूरे खिले।
वह उचक कर तोड़ने लगा।
गुलाब के काँटों ने उसे रोकने की कोशिश की।
काँटे उसके कपड़े में घुस गये, हाथ पैर और चेहरे में खरोंचें लगा दिये।
लेकिन उसने उन सुन्दर फूलों को तोड़ा ही। सफलता प्राप्ति के आनंद से वह इतना विभोर हुआ कि उसे कतई पता ही नहीं चला कि गुलाब ने ही यह शरारत की है।
खुशी में झूमते हुए बाहर आया तो धोती कहीं उलझी और पैर के नीचे गढ़ा एक काँटा।
मुड़ कर देखा-कटैले का पौधा सिर नीचे किये खड़ा है।
चिल्ला पड़ा-इस कमबख्त की यहाँ क्या जरूरत है ?
आवाज दी-अबे माली, बड़ा बेवकूफ है। फूलों की क्यारी में काँटे क्यों लगा रखे हैं ?
माली ने भिन्ना कर अपनी हंसिया कटैले के जड़ में भिड़ाई।
बेचारा रो पड़ा-क्यों मुझे मार डालते हो, मैंने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। जहाँ हूँ, सिर नीचा किये।
माली उसका भाषा को क्या समझता ? हाँ गुलाब ने समझा।
हंस कर कहा-तू ने मेरे पास उगने की बेअदबी की है। मेरा नौकर तुझे उसी की सजा दे रहा है।
कटैला चिल्ला पड़ा-क्यों मद में भूले हो सरकार, याद नहीं, सृष्टि के आरंभ में केवल एक ही वनस्पति थी और उसी से हम, सबों का विकास हुआ।
गुलाब हंसा-क्या अनाप-शनाप बक रहा है। मैं बड़ा हूँ जीने के लिए-तू छोटा है मरने के लिए...... अब मर।
तब तक माली कटैले की जड़ काट चुका था।
बेचारा एक आह भी न ले सका।
- कहानी

