अस्वाद
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महात्मा गाँधी
यह व्रत ब्रह्मचर्य से निकट सम्बन्ध रखने वाला है। मेरा अपना अनुभव तो यह है कि यदि इस व्रत का भली-भाँति पालन किया जाए तो ब्रह्मचर्य अर्थात् जननेन्द्रिय संयम बिलकुल आसान हो जाए। पर आमतौर से इसे कोई भिन्न व्रत नहीं मानता, क्योंकि स्वाद को बड़े-बड़े मुनिवर भी नहीं जीत सके हैं। इसी कारण इस व्रत को पृथक स्थान नहीं मिला। यह तो मैंने अपने अनुभव की बात कही। वस्तुतः बात ऐसी हो या न हो तो भी चूँकि हमने इस व्रत को पृथक माना है, इसलिए स्वतंत्र रीति से इसका विचार कर लेना उचित है।
अस्वाद के मानी हैं, स्वाद न करना। स्वाद अर्थात् रस-जायका। जिस तरह दवाई खाते समय इस बात का विचार नहीं करते कि आया वह जायकेदार है या नहीं, पर शरीर के लिए उसकी आवश्यकता समझ कर ही उसे योग्य मात्रा में खाते हैं, उसी तरह अन्न को भी समझना चाहिए। अन्न अर्थात् समस्त खाद्य पदार्थ अतः इनमें दूध-फल का भी समावेश होता है। जैसे कम मात्रा में ली हुई दवाई असर नहीं करती या थोड़ा असर करती है और ज्यादा लेने पर नुकसान पहुँचाती है, वैसे ही अन्न का भी है। इसलिए स्वाद की दृष्टि से किसी भी चीज को चखना व्रत भंग है। जायकेदार चीज को ज्यादा खाने से तो सहज ही व्रत भंग होता है। इससे यह जाहिर है कि किसी पदार्थ का स्वाद बढ़ाने, बदलने या उसके अस्वाद को मिटाने की गरज से उसमें नमक वगैरह खिलाना व्रत को भंग करना है। लेकिन यदि हम जानते हों कि अन्न में नमक की अमुक मात्रा में जरूरत है और इसलिए उससे नमक छोड़ें, तो इससे व्रत का भंग नहीं होता। शरीर-पोषण के लिए आवश्यक न होते हुए भी मन को धोखा देने के लिए आवश्यकता का आरोपण करके कोई चीज मिलाना स्पष्ट ही मिथ्याचार कहा जाएगा।
इस दृष्टि से विचार करने पर हमें पता चलेगा कि जो अनेक चीजें हम खाते हैं, वे शरीर रक्षा के लिए जरूरी न होने से त्याज्य ठहरती हैं और यों जो सहज ही असंख्य चीजों को छोड़ देता है, उसके समस्त विकारों का शमन हो जाता है। ‘पेट जो चाहे सो करावे’, ‘पेट चांडाल है’, ‘पेट कुई, मुँह सुई’, ‘पेट में पड़ा चारा तो कूदने लगा विचारा,’ ‘जब आदमी के पेट में आंत है रोटियाँ। फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँ।’, ये सब वचन बहुत सारगर्भित हैं। इस विषय पर इतना कम ध्यान दिया गया है कि व्रत की दृष्टि से खुराक की पसन्दगी लगभग नामुमकिन हो गयी है। इधर बचपन ही से माँ-बाप झूठा हेतु करके अनेक प्रकार की जायकेदार चीजें खिला-खिला कर बालकों के शरीर को निकम्मा और जीभ को कुत्ती बना देते हैं। फलतः बड़े होने पर उनकी जीवन-यात्रा शरीर से रोगी और स्वाद की दृष्टि से महा विकारी पायी जाती है। इसके कड़ुए फलों को हम पग-पग पर देखते हैं अनेक तरह के खर्च करते हैं, वैद्य और डाक्टरों को सेवा उठाते हैं और शरीर तथा इन्द्रियों को वश में रखने के बदले उनके गुलाम बनकर अपंग सा जीवन बिताते हैं। एक अनुभवी वैद्य का कथन है कि उसने दुनिया में एक भी नीरोग मनुष्य को नहीं देखा। थोड़ा भी स्वाद किया कि शरीर भ्रष्ट हुआ और तभी से उस शरीर के लिए उपवास को आवश्यकता पैदा हो गई।
इस विचारधारा से कोई घबराये नहीं। अस्वाद व्रत की भयंकरता देख कर उसे छोड़ने की भी जरूरत नहीं। जब हम कोई व्रत लेते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि तभी से उसका संपूर्ण पालन करने लग जाते हैं। व्रत लेने का अर्थ है, उसका संपूर्ण पालन करने के लिए, मरते दम तक, मन, वचन और कर्म से प्रामाणिक तथा दृढ़ प्रयत्न करना। कोई व्रत कठिन है इसीलिए उसकी व्याख्या को शिथिल करके हम अपने आपको धोखा न दें। अपनी सुविधा के लिए आदर्श को नीचे गिराने में असत्य है, हमारा पतन है। स्वतन्त्र रीति से आदर्श को पहचान कर, उसके चाहे जितना कठिन होने पर भी, उसे पीने के लिए जी-तोड़ प्रयत्न करने का नाम ही परम अर्थ है, पुरुषार्थ है-( पुरुषार्थ का अर्थ हम केवल नर तक ही सीमित न रखें, मूलार्थ के अनुसार जो पुर यानी शरीर में रहता है, वह पुरुष है, इस अर्थ के अनुसार पुरुषार्थ शब्द का उपयोग नर-नारी दोनों के लिए हो सकता है।) जो तीन कालों में महाव्रतों का संपूर्ण पालन करने में समर्थ है, इसके लिए इस जगत में कुछ कार्य-कर्तव्य है नहीं, - वह भगवान है, मुक्त है। हम तो अल्प मुमुक्षु-सत्य का आग्रह रखने वाले, उसकी शोध करने वाले प्राणी हैं। इसलिए गीता की भाषा में धीरे-धीरे पर अतन्द्रित रह कर प्रयत्न करते चलें। ऐसा करने से किसी दिन प्रभु-प्रसादी के योग्य हो जाएंगे और तब हमारे तमाम विकार भी भस्म हो जाएंगे।
अस्वाद-व्रत के महत्व को समझ चुकने पर हमें उसके पालन का नये सिरे से प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए चौबीसों घंटे खाने की ही चिन्ता करना आवश्यक नहीं है। सिर्फ सावधानी की-जागृति की-बहुत ज्यादा जरूरत है। ऐसा करने से कुछ ही समय में हमें मालूम होने लगेगा कि हम कब और कहाँ स्वाद करते हैं। मालूम होने पर हमें चाहिए कि हम अपनी स्वाद वृत्ति को दृढ़ता के साथ कम करें। इस दृष्टि से संयुक्त पाक-यदि वह अस्वाद वृत्ति से किया जाय-बहुत मददगार है। उसमें हमें रोज-रोज इस बात का विचार नहीं करना पड़ता कि आज क्या पकायेंगे और क्या खावेंगे ? जो कुछ बना है और जो हमारे लिए, त्याज्य नहीं है, उसे ईश्वर की कृपा समझ कर, मन में भी उसको टोका न करते हुए, संतोषपूर्वक शरीर के लिए जितना आवश्यक हो, उतना ही खाकर हम उठ जाएं। ऐसा करने वाला सहज ही अस्वाद-व्रत का पालन करता है। संयुक्त रसोई बनाने वाले हमारा बोझ हलका करते हैं-हमारे व्रतों के रक्षक बनते हैं। वे स्वाद कराने की दृष्टि से कुछ भी न पकावें, केवल समाज के शरीर पोषण के लिए ही रसोई तैयार करें। वस्तुतः तो आदर्श स्थिति वह है, जिसमें अग्नि का खर्च कम से कम या बिल्कुल न हो। सूर्यरूपी महा अग्नि जो खाद्य पकाती है, उसी में से हमें अपने लिए खाद्य पदार्थ चुन लेने चाहिए। इस विचार-दृष्टि से यह साबित होता है कि मनुष्य प्राणी केवल फलाहारी है। लेकिन यहाँ इतना गहरा पैठने की जरूरत नहीं। यहाँ तो विचारना था कि अस्वाद-व्रत क्या है, उसके मार्ग में कौन-सी कठिनाइयाँ है और नहीं है तथा उसका ब्रह्मचर्य के साथ कितना अधिक निकट संबंध है। इतना ठीक-ठाक हृदयंगम हो जाने पर सब इस व्रत के पालन का शुभ प्रयत्न करें।

