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Magazine - Year 1940 - Version 2

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मैं परलोकवादी कैसे बना

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(लेखक-श्री वी डी ऋषि, बम्बई)

(1)

(श्री वी.डी. ऋषि, भारतवर्ष के एक अद्वितीय परलोकवादी हैं आपने अपना सारा जीवन इस तत्व की खोज में लगाया है और अपनी खोजों के संबंध में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। आपने कृपा पूर्वक परलोक वाद के संबंध में ‘अखंड ज्योति’ में एक लेख माला देने का वचन दिया, जो इस लेख के साथ आरंभ हो रही है। )

अंग्रेजी में एक कहावत है, कि बुराई से कभी-कभी भलाई हो जाती है। इस कहावत का अनुभव अनेक प्रकार से हुआ करता है। कुछ वर्ष पहिले मेरे जीवन में एक ऐसी अद्भुत घटना घटी, जिससे मेरे विचारों में एक विलक्षण परिवर्तन हो गया।

यदि इस संसार में देखा जाय तो प्रति क्षण यहाँ अनेक देहधारी मरा करते हैं। कवि कालीदास के कथनानुसार ‘मृत्यु शरीर धारियों के लिए प्रकृति है और जीवन विकृति है।” इस कथन की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट होना चाहिए किन्तु उनका ध्यान आकृष्ट नहीं होता, यही शोचनीय बात है।

कई वर्ष हुए कि मेरी पूर्व पत्नी सुभद्रा बाई के पेट में एक भयंकर रोग उत्पन्न हुआ। इस रोग को दूर करने के लिए सारे उपाय कर लिये गये, किन्तु कोई फल नहीं हुआ। अन्त में यह रोग प्राणघातक सिद्ध हुआ। उसकी मृत्यु के समय जो डॉक्टर आया था, उससे मैंने पूछा- ‘क्यों, डॉक्टर साहब! क्या यह जा रही है ? मुझे पूछना तो वह था क्या यह मर रही है, किन्तु मैंने यह न पूछ कर केवल यही पूछा कि क्या यह जा रही है। ऐसे अवसरों पर लोग पूछा करते है-क्या यह मर रहा है या मर रही है ? उस समय मुझे यह आशा अथवा विश्वास नहीं था, कि मेरे यह शब्द इतने महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे। परंतु इस घटना के बाद जो अनुभव प्राप्त हुए, उनसे यह सिद्ध हो गया कि मेरी प्रिय पत्नी मरने के समय यह सब बातें सुन रही थी और उन्हें समझ भी रही थी। उसने मुझ से कहा-आप मरने के बाद भी मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे और मैं जहाँ जाऊंगी, वहाँ मुझे सुख से नहीं रहने दोगे।’ वास्तव में उसके यह वाक्य सत्य निकले। उसकी मृत्यु इतनी जल्दी हो जायेगी, इसकी मुझे स्वप्न में भी कल्पना नहीं थी। किन्तु ईश्वर के नियम गहन है। मेरी प्रिय पत्नी ईश्वरीय नियम के अनुसार आपरेशन करने के बाद परलोकगत हुई।

इस दर्शन को पढ़कर संभव है, कुछ पाठक कहें कि क्या केवल आपकी ही पत्नी ऐसे मरी है ? दूसरे लोग जिनके कि पत्नियाँ आज इस संसार में नहीं है, क्या उन्हें अपनी पत्नी से प्रेम न था ? प्रिय पाठक वृन्द ! आपका यह कहना बिल्कुल ठीक है। मेरी भाँति अन्य कितने ही लोगों को भी अपनी पत्नी के मरने का दारुण दुख सहना करना पड़ा होगा। इस अनन्त ब्रह्माण्ड में न मालूम कितनी स्त्रियाँ मर गई होंगी और उनके पति का उनके प्रति अवश्य ही प्रेम रहा होगा। परन्तु मैंने ऊपर जिस घटना का वर्णन किया है। उसमें एक विशेषता है, यह बात आगे के लेखों में स्पष्ट हो जाएगी। परलोक जाने के बाद शायद ही किसी स्त्री ने अपनी स्थिति का परलोक का तथा अन्य उपयोगी बातों का वर्णन किया हो। मृत्यु के बाद शायद ही किसी स्त्री ने अपना अस्तित्व सिद्ध कर अपने पति को सान्त्वना दी हो। जो बात पहले कल्पनातीत समझी जाती थी और जो उस स्त्री की मृत्यु से सिद्ध हो गई है, उसके जीवन की अन्तिम घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जिसकी मृत्यु के बाद मानवी जीवन की अविच्छिन्न शृंखला स्थापित हो गई है और जिसके कारण से मृत्यु के बाद भी जीवन है, यह आँदोलन दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है, जिसे परलोक गमन से मानवी विचारधारा में एक युगान्तर उपस्थित हो गया है, उसके परलोक गमन के पूर्व का वृत्तांत जान लेना आवश्यक है। इसलिए यह ऊपर बताया गया है।

परलोक द्वारा वार्तालाप करने वाले तथा नास्तिकों के विचार में परिवर्तन करने वाले सर ओलीवर लाज के पुत्र रेमण्ड एक सामान्य इंजीनियर थे, उसी भाँति मेरी पत्नी भी अंग्रेजी पढ़ी-लिखी न थी। किंतु उसने एक अपूर्व ज्ञान का परिचय दिया, इसलिए उसका परिचय देना अत्यंत आवश्यक है। उसकी गुण राशि और धर्मपरायणता आदर्श थी। किन्तु उसके गुणों का यहाँ वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है। केवल यहाँ इतना ही लिख देना पर्याप्त है कि उसकी मृत्यु अल्पावस्था में ही हो गई थी। यह बात एक अंग्रेजी कहावत को सिद्ध करती है-’ईश्वर जिस पर अधिक प्रेम करता है, उसे अपने पास शीघ्र बुला लेता है।’

इस लेख माला के लेख पढ़ने के बाद पाठक बंधु शायद यह प्रश्न करेंगे, कि क्या हमें भी इस सत्य का अनुसंधान करने में लग जाए। ऐसे प्रश्न करने वालों से मेरा केवल इतना ही कथन है, कि मेरा यह मतलब नहीं है, कि आप अपना काम-धाम छोड़कर केवल इसी की खोज में लग जायें। परन्तु इतना तो मैं अवश्य ही कहूँगा कि जिस प्रकार आप अन्य वैज्ञानिक बातों पर विश्वास करते हैं, उस भाँति मरने के बाद भी जीवन है इस सिद्धाँत को भी सत्य मानें। विज्ञान के सब सिद्धाँतों के प्रयोग कोई स्वयं करके विश्वास नहीं करता अथवा आकाश के जितने नक्षत्र हैं, उन्हें सब लोग दूरबीन से देखकर ही विश्वास नहीं करते। अन्य लोगों ने इनका अनुभव किया है, उन्हीं के अनुभव पर आस्था रखकर हम विश्वास करते हैं। इसी प्रकार इस विषय में भी लोगों को पूर्ण विश्वास करना चाहिए। भारतवर्ष के लिए परलोक का विचार कोई नई बात नहीं है। किन्तु यह कहा जा सकता है कि भारतवर्ष ही इस सिद्धाँत का जन्म देने वाला है।

पत्नी के परलोक बास के बाद जिस भाँति अन्य लोगों को दूसरे लोग आकर आश्वासन दिया करते हैं, उसी भाँति मुझे भी लोगों ने आकर आश्वासन देना आरंभ किया। ऐसे अवसरों पर यह कहा जाता है। ‘यह संसार अनित्य है, इसमें कोई अमर होकर नहीं आया है समय व्यतीत हो जाने पर मृत्यु अवश्य आती है, इसलिए मरे हुए व्यक्ति के लिए शोक करना अथवा उसे बारबार स्मरण करना अनावश्यक है। संसार की गति को देखकर अब अपना काम करना चाहिए और जो मर गये वह अब क्या वापिस तो नहीं आ जायेंगे।’ रघुवंश में इन्दुमती की मृत्यु हो जाने के बाद कवि कालीदास लिखते हैं- ‘राजन्! भवतानानु मृर्तोपि सा सभ्यते’ अर्थात् यदि कोई आदमी स्वयं भी कर जाय तो मरे हुए आदमी से उसकी भेंट नहीं हो सकती। पुंडरीक की अकस्मात मृत्यु के बाद महाश्वेता ने देह त्याग करने का निश्चय किया था, उस समय कवि बाणभट्ट ने लिखा है, यह मार्ग अज्ञानता का द्योतक तथा मूर्खतापूर्ण है। कारण कि प्राणी अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न लोगों में भ्रमण करता है, उसके साथ फिर मिल सकना असंभव है। वेदान्तियों का कथन है कि जिस भाँति सागर का जल बिन्दु सागर में पुनः मिल जाता है, और बाद में उसका पता नहीं लगता, उसी भाँति मनुष्य के विशिष्ट गुण अस्तित्व में नहीं रहते, अर्थात् वह ब्रह्मांड सागर में जल बिन्दु के समान लीन हो जाता है। उसका पुनः दर्शन नहीं होता।

साराँश यह है कि इस प्रकार के उपदेशों से मेरा मन शाँत न हो सका। मेरे हृदय में यह उत्कट इच्छा उत्पन्न हुई, कि जिसके साथ जीवन के इतने दिन सुख-दुख में व्यतीत किये, जो मेरे सुख-दुख की साथी थी, जिसने कितने ही वर्षों तक शरीर व्याधि सहा। जिसने आपरेशन कराने का स्वयं आग्रह किया था जिसे परलोक जाने की अत्यन्त अभिलाषा थी उस व्यक्ति के पास क्या पुनः वार्तालाप कर सकना असंभव है ? आरंभ में इतना ही जानने की मेरी इच्छा थी, कि वह सुख में है या दुख में ? कारण कि उसका जीवन अत्यंत कष्ट में व्यतीत हुआ था। उसके गुण का विकास होने का अवसर ही नहीं मिला। इसलिए वह लुप्त हो गये। यह समझ लिया गया था कि उसमें कोई गुण ही नहीं थे, किन्तु यह बड़ी भूल थी। इस गुण के विकास की स्वल्प इच्छा की पूर्ति का भी कोई साधन नहीं था। किन्तु जिन लोगों ने इसे सुना वह हंसने लगे। और मेरी इच्छा को मूर्खतापूर्ण बताने लगे।-क्रमशः

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