गंगा का महात्म्य
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(श्री नारायणप्रसाद तिवारी ‘उज्ज्वल’ कान्हीवाडा)
कैलाश के उच्च शिखर भगवान शंकर और गिरिसुता पार्वती बैठे हुए कुछ मनो विनोद कर रहे थे। इधर-उधर की बातों का प्रसंग चल रहा था। स्त्रियों को दूसरों के मामले में दिलचस्पी होने की विशेष रुचि होती है। पार्वती जी के मस्तिष्क में भी अनेक प्रकार के प्रसंग आ रहे थे और एक-एक करके वे योगिराज से पूछती जा रही थी।
अचानक उनकी दृष्टि, भगवती गंगा पर जा पड़ी। पार्वती ने पूछा-भगवन्! इस गंगा को लोग क्यों इतने आदर की दृष्टि से देखते हैं ? शंकरजी ने सहज ही पतित पावनी गंगा का महात्म्य उन्हें सुना दिया। उसे सुनकर पार्वतीजी को बड़ा कौतूहल हुआ इसमें स्नान करने से लोग पवित्र हो जाते हैं, स्वर्ग जाते हैं, मुक्ति पाते हैं यह बात उनके गले न उतर सकी।
संयोग से उसी दिन कोई पर्व था। पार्वती ने दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि गंगा जी से ले सिन्धु तक लाखों नर-नारी गंगा स्नान कर रहे हैं। क्या यह सब पवित्र हो जायेंगे? इन सबको स्वर्ग मिलेगा? उनके मस्तिष्क में शंका और प्रश्नों की झड़ी लग गई।
अंतर्यामी भूतनाथ ने उनकी चिन्ता जान ली। और हल्की हँसी हँसते हुए कहा- प्रिय, मेरे वचनों पर संदेह मत करो। मैं तुमसे अन्यथा नहीं कहता। उद्विग्न मन से पार्वती ने उनके चरण रज मस्तक पर चढ़ाते हुए कहा- नाथ! तब तो स्वर्ग बड़ा सस्ता हो जायेगा, मुक्ति टके सेर मारी मारी फिरेगी। केवल स्नान मात्र से...........
“हाँ, स्नान मात्र से” भगवान् शंकर ने कहा- लेकिन कोई सच्चे हृदय से स्नान करने भी तो जाय! यह जो लाखों मेंढ़कों की भीड़ गंगा तट पर खड़ी हुई है, इनमें कुछ उंगलियों पर गिनने लायक मनुष्य ही वास्तविक गंगा स्नान के लिए आये हैं। शेष तो अपने विभिन्न प्रकार के स्वार्थ साधन एवं मनोरंजनों के लिए पहुँचे हैं।
पार्वती चकरा गई। वे खिन्न होकर झुझलाने लगीं। भगवन्, आपकी एक भी बात मेरी समझ में नहीं आती। आप स्नान से मुक्ति बताते हैं और स्नान करने वालों को मेंढक बताते हैं। इसका क्या तात्पर्य? आप ऐसा उलझन में डालने वाला ज्ञान मुझे क्यों सिखाते हैं? कुछ असंतुष्ट सी होती हुई पार्वती वहाँ से उठ कर नदी के पास चली गई और उसके सींग खुजाने लगीं।
आखिर स्त्री स्वभाव ही जो ठहरा। भगवान् बम भोला उन्हें मनाने के लिए उठे और पास जाकर हँसते हुए बोले- प्रिये! तुम तो रुष्ट हो गई। धर्म का मार्ग कुछ ऐसा गहन है ही। यह उतनी आसानी से समझ में नहीं आता जिस प्रकार की तुम समझना चाहती हो। अच्छा, आओ! मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें प्रत्यक्ष सब बातें दिखा दूँगा। पार्वती जी की इच्छा पूर्ण हो गई। और वे प्रसन्न होती हुई उनके साथ चल दीं। रास्ते में एक सलाह पक्की कर ली गई।
*****
गंगा तट से कुछ दूर एक बड़े राज मार्ग के किनारे शंकर जी कोढ़ी का रूप बनाकर पड़े रहे। पार्वती ने अपना स्वरूप अत्यन्त ही सुन्दर षोडशी का बना लिया।
उस रास्ते गंगा स्नान के लिए जाने वाली भीड़ मुड़ मुड़ कर उन्हें देखती जाती। एक ने कहा- सुन्दरी! इस कोढ़ी के साथ क्यों कष्ट सह रही हो चलो मेरे घर! तुम्हें स्वर्ग का आनन्द मिलेगा। दूसरे ने कहा- मेरे यहाँ किसी बात का घाटा नहीं है फूलों की सेज पर बैठी रहना। सुन्दरी सबकी बातें सुनती रहीं पर उत्तर किसी को कुछ न दिया, सवेरे से शाम हो गई हजारों यात्री उस रास्ते से निकले होंगे। सभी ने तरुणी को मूर्ख बताया कि वह क्यों एक कोढ़ी के साथ रह रही है। बहुतों के मन ललचाये कि यह रमणी हमें मिल जाय। कई ने तो अपनी लालसा शब्दों द्वारा भी प्रकट कर दी।
एक प्रचलित प्रथा के अनुसार किसी किसी ने कोढ़ी के निकट कुछ पाइयाँ फेंक दी। पर पार्वती को फूलों की सेज पर बिठाने के इच्छुकों में से एक ने भी ऐसी सहायता देने का प्रयत्न न किया कि वह अपने उसी पीड़ित पति के साथ सुगमता से रह सके।
अन्त में केवल एक व्यक्ति ऐसा आया जिसने तरुणी के पवित्र धर्म को सराहा। प्रदक्षिणा की उसकी चरणरज मस्तक पर लगाई और कहा- माता! तुम धन्य हो, जो ऐसे संकट के समय में भी अपने धर्म पर दृढ़ हो। जो कुछ वह कर सकता था धन, भोजन आदि की सहायता करके आगे चला गया।
अब सारा काम समाप्त हो चुका था। पार्वती जी काफी अनुभव पा चुकी थी। महादेव जी अपने उस नकली रूप को छोड़ कर उठ बैठे। उन्होंने कहा- अब मेरा कथन तुम्हारी समझ में आया? इतनी बड़ी भीड़ में एक ही व्यक्ति वास्तव में गंगा स्नान को आय था। औरों का उद्देश्य तो मेला देखना, मनोरंजन करना, पर नारियों को कुदृष्टि से देखना, लोगों की निगाह में अपने को धर्मात्मा सिद्ध करना, पापों से मुक्त होने का झूठा आत्म संतोष करना, मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए गंगा को स्नान की रिश्वत देना एवं एक अन्ध परिपाटी का अनुकरण करना होता है।
पार्वती! इन लोगों को गंगा स्नान का कुछ भी फल नहीं मिल सकता। स्वर्ग तो वही पावेगा जिसने अपनी आत्मा को पवित्र कर लिया है।
पार्वती ने परम संतुष्ट होकर कहा- नाथ! आप सत्य कहते हैं। अब मेरी समझ में गंगा का सच्चा महात्म्य आ गया।

