• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • सफलता की कुँजी
    • अखण्ड ज्योति के नियम
    • प्रसन्न रहो
    • ज्ञान-दीप (कविता)
    • क्या तुम यही हो?
    • अस्वाद
    • Quotation
    • ईश्वर की प्राप्ति के लिए
    • ब्राह्मणों से श्रेष्ठ
    • हिन्दुओं की जातीय भावना
    • Quotation
    • भोगे बिना छुटकारा नहीं
    • फूल-काँटे
    • Quotation
    • गीता का कर्मयोग
    • सौदागर ! (कविता)
    • मनुष्य की पहचान
    • तुम (कविता)
    • गंगा का महात्म्य
    • मैस्मरेज्म का प्रयोग
    • अहंभाव का प्रसार करो !
    • Quotation
    • साधकों का पृष्ठ
    • मैं परलोकवादी कैसे बना
    • Quotation
    • शक्ति-वर्द्धक धनुरासन
    • तत्र विद्या की उपयोगिता
    • उसने कुछ नहीं खोया
    • आत्म-चिन्तन (कविता)
    • अतृप्त तृष्णा
    • उषाःपान की सरल विधि
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1940 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


गीता का कर्मयोग

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 16 18 Last
(श्री सुदर्शनजी ‘चक्र’ संपादक ‘संकीर्तन’, मेरठ)

(गताँक से आगे)

‘माते संगोस्त्वकर्मणि’ यह चौथा और अन्तिम सूत्र है कि तुम्हारा अकर्म से संग न हो ! आलसी बनकर बैठे मत रहो! ‘फल में अपना अधिकार ही नहीं, उद्योग करने पर भी फल होगा यह निश्चित नहीं, फल हो भी तो वह प्रारब्ध से होता है, उद्योग उसका कारण नहीं ऐसा समझकर उद्योग करना ही मत छोड़ दो!’ कर्म करना तुम्हारा कर्तव्य है, अतः तुम्हें कर्म तो करना ही चाहिए। क्योंकि तुम कर्म को छोड़ नहीं सकते। कर्म करने के लिए विवश हो।

“न कश्चिक्षणमपि आतु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते हावशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुर्णेः॥”

कोई उत्पन्न हुआ प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों से विवश होकर गुणों द्वारा उससे कर्म कराया ही जाता है। सभी इस प्रकार प्रतिक्षण कर्म करते ही रहते हैं। चाहे हमें इन्द्रियों को रोककर कर्म करने से विरत भी रख सकें, पर मनीराम तो मानने से रहे। उनकी उधेड़बुन तो चला ही करेगी। फिर इस प्रकार इन्द्रियों से कर्म न करना कोई अच्छा तो है नहीं।

“कर्म्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसास्यरन्।

इन्द्रियार्थान विसूढात्मा मिथ्याचारः स उच्चयते॥”

जो मूर्ख बुद्धि पुरुष कर्मेंद्रियों को कर्मों से रोक कर मन के द्वारा विषयों का चिन्तन करता है, वह पाखण्डी कहा जाता है। इस प्रकार के पाखण्ड से कोई भी लाभ नहीं है। इस बाह्य त्याग के द्वारा कोई भी नैष्कर्म्यावस्था को नहीं पाता।

‘न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोश्नुते।

न च सन्यसनादेव सिद्धिं समाधिमच्छति॥

कर्म को आरंभ न करने मात्र से पुरुष निष्कर्मावस्था का आनन्द नहीं प्राप्त करता और न तो करते हुए कर्मों को छोड़ देने (कर्म संन्यास) मात्र से नैष्कर्म्य सिद्धि कर पाता है। निष्कर्मता तो मन का धर्म है। शरीर के द्वारा निष्क्रिय हो भी गये तो क्या लाभ ? क्योंकि बंधन और मोक्ष का कारण तो है मन। इस मन को निष्क्रिय बनाना है। मन की निष्क्रियता है कर्म और कर्मफल से अनासक्त रहना। इस के अतिरिक्त शरीर से कर्म छोड़ देने में हानि भी है। सभी जानते हैं कि सत्वगुण का धर्म आनंद, रजोगुण का धर्म क्रिया तथा तमोगुण का धर्म निद्रा एवं आलस्य है। कोई भी निरंतर सत्वगुण में स्थिति रहे, यह नितांत कठिन है। सत्वगुण में स्थिति न रहने पर यदि हम बलात् कर्म को त्याग दें और इस प्रकार रजोगुण में न रहने का दुराग्रह करें तो निश्चय है कि हमें तमोगुण में रहना होगा। हमारे द्वारा निद्रा एवं आलस्य का पोषण होगा। यह स्थिति किसी भी अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए भयंकर है।

एक महापुरुष का कहना है ‘चोर एवं डाकू तो अच्छे है, उन्हें भगवान मिल सकते है; लेकिन निरंतर आलस्य में पड़े रहने वाले अच्छे नहीं। उन्हें कभी भी प्रभु के दर्शन न होंगे।’ मतलब यह है कि रजोगुण से सतोगुण में पहुंचना ही शक्य है, लेकिन तमोगुण से सतोगुण में नहीं पहुँचा जा सकता। इसलिए वीर कर्म करने वाले डाकू प्रभृति भी राजसिक होने के कारण नींद एवं आलस्य में पड़े रहने वाले लोगों से श्रेष्ठ तथा भगवान के निकट हैं। कुछ भी न करके आलस्य में पड़े रहने की अपेक्षा कुछ भी करना, बुरे से बुरा काम भी करना अच्छा है। क्योंकि क्रिया में मनुष्य तामसिकता से उठकर कुछ तो रजोगुण में आता ही है।

स्पष्ट है कि बल पूर्वक कर्म का त्याग किसी भी साधक के लिए हितकर नहीं हो सकता। इससे उसकी हानि ही होगी। कर्म त्याग करके वह अपने पतन का मार्ग बना लेगा। अतएव भगवान साधक को सावधान करते हैं ‘माते संगोसत्वकर्मणि’ अकर्म से तुम्हारा संगों न हो ! तुम कहीं आलसी न बन जाओ। इन चार सूत्रों द्वारा गीता के एक ही श्लोक में पार्थ-सारथि ने संपूर्ण कर्मयोग बतला दिया है। कर्म करने में तुम स्वतंत्र हो, परन्तु फल तुम्हारे आधीन नहीं। कर्म का फल हो भी तो उस फल का कारण अपने को मत समझो। साथ ही कर्म करना छोड़ भी मत दो! यही संपूर्ण कर्मयोग है।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जहोषि ददासियत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदपर्णम॥

जो कुछ करते हो, जो भोजन करते हो, जो हवन करते हो, जो दान करते हो और जो तपस्या करते हो वह सब मेरे अर्पण कर दो! कर्म करते रहो, छोड़ो मत! पर उसे कर्तव्य समझकर और उसके फल को भगवदार्पण करते हुए।

First 16 18 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • सफलता की कुँजी
  • अखण्ड ज्योति के नियम
  • प्रसन्न रहो
  • ज्ञान-दीप (कविता)
  • क्या तुम यही हो?
  • अस्वाद
  • Quotation
  • ईश्वर की प्राप्ति के लिए
  • ब्राह्मणों से श्रेष्ठ
  • हिन्दुओं की जातीय भावना
  • Quotation
  • भोगे बिना छुटकारा नहीं
  • फूल-काँटे
  • Quotation
  • गीता का कर्मयोग
  • सौदागर ! (कविता)
  • मनुष्य की पहचान
  • तुम (कविता)
  • गंगा का महात्म्य
  • मैस्मरेज्म का प्रयोग
  • अहंभाव का प्रसार करो !
  • Quotation
  • साधकों का पृष्ठ
  • मैं परलोकवादी कैसे बना
  • Quotation
  • शक्ति-वर्द्धक धनुरासन
  • तत्र विद्या की उपयोगिता
  • उसने कुछ नहीं खोया
  • आत्म-चिन्तन (कविता)
  • अतृप्त तृष्णा
  • उषाःपान की सरल विधि
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj