आत्म-चिन्तन (कविता)
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(रचयिता-श्री हरिशंकरलाल “कामारि” शास्त्री) नित्य, मुक्त हूँ, स्वच्छ सुघर हूँ, चेतन हूँ, अविचल रहता। बन्दे ! ले पहचान मुझे क्या अलख जगाता है फिरता॥ अस्त-व्यस्त सुख स्वनिल रम्भा, सम्मुख आ जब हुई खड़ी। पशुबल से सुखमय हो जीवन, प्रथम भावना जाग पड़ी॥ निर्ममता के साथ विश्व में फिर तो जन संहार हुआ- नीरवजा से बहा मूक पर दृग ने दी जलधार बड़ी॥ शेषामर्ष, विषाद, हर्ष में, कहाँ शाँति शुचि पा सकता। बन्दे ! ले पहचान मुझे क्या अलख जगाता है फिरता॥ तज दर्द भरी, निःश्वास एक, जब जग का नाता छोड़ दिया। आच्छादित हिम गिरि गुह्य, बन-बन का कोना छाना लिया॥ उदासीन सब तरह बना कस जटाजूट, कोपीन पहन किन्तु कामना, जाग उठी, कर कलुषित सर को, भान लिया॥ लवण-सिन्धु में, सुधा-बिन्धु, किस को फिर पीने का मिलता। बन्दे! ले पहचान मुझे क्या अलख जगाता है फिरता॥ रे! नैश करो विश्वास सुदृढ़, सुख धाम, दुख का नाम नहीं। जगती का व्यापार, क्षणिक, चल सकता संग, अविराम नहीं॥ अजर, अमर हूँ, युग अनादि से, सिद्धि, शक्तियों का भंडार- मुझे आत्मा अविनश्वर, जानो अनात्मा, कभी नहीं॥ हानि, लाभ, जयविजय, पराजय, का न द्वंद्व दुख दल खलता। बन्दे ! ले पहचान मुझे क्या अलख जगाता है फिरता॥ मरना, जीना, अखिल विश्व में, जिसे बताते अधम सदा संचित प्रकृति कर विभूति, श्रम सुख हित करते जिसे सदा। जीवनमुक्ति अरे ! वह मैं हूँ, सूक्ष्म बुद्धि से देखो तो- मिथ्या पाश, चतुर्दिक् डाली, तेरे माया की प्रमदा॥ उर मन्दिर में, ज्ञान-दीप, बन, जीवन, में निशि दिन जलता। बन्दे! ले पहचान मुझे क्या अलख जगाता है फिरता॥ *समाप्त*

