ध्यान के समय
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(अनु. श्री सुदर्शनसिंह ‘चक्र’ मेरठ)
ऐसा समय आता है जब मनुष्य संसार को भूल कर ऐसे शान्तिमय प्रदेशों में पहुँचता है, जहाँ आत्मा स्वरूप स्थित रहती है, परमात्मा के सन्निकट रहती है।
तब अन्तःकरण की समस्त वासनायें विलीन हो जाती हैं, इंद्रियों की चेष्टायें शान्त हो जाती हैं, केवल ईश्वर रहता है।
एक शुद्ध मन जो परमात्मा में स्थित है, उससे पवित्र कोई मन्दिर नहीं है। उस पवित्र देश में, जिस में परमात्मा में स्थिर हुआ मन प्रवेश करता है, दूसरा कोई पवित्र स्थान नहीं है। परमात्मा में उठते हुए विचार की माप नहीं की जा सकती। पवित्रता, शान्ति, आनन्द, इन्हीं से ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है। इसी एकान्त और पवित्र समय में धार्मिक विचारों का उदय होता है। आत्मा का उद्गम स्थान के अत्यन्त समीप रहती है। इसी व्यक्तित्व का स्रोत विकसित होकर एक महान् शीघ्रगामी नद का स्वरूप धारण कर, उस सत्य सनातन कैवल्य पद की ओर प्रवाहित होता है जो परमात्मा का समुद्रवत् चित्त है। वह केवल एक है।
ध्यान के समय जीवात्मा महान् (परमात्मा) से उन दैवी गुणों को आकर्षित करती है, जो उसके स्वाभाविक हैं। जैसे निर्भयता, सत्यता, अमरत्व, आदि।
ओ आत्मन्! अपने अन्दर उनको आकर्षित कर!
सत्य के साथ उस शान्त समय को ढूँढ़!!
अपने को सत्य का तत्व तथा ईश्वर रहता है!!

