संशयात्मा विनश्यति
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योगीराज कृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है संशयात्मा लोग नष्ट हो जाते हैं। इस युग में तर्क की प्रधानता है बात बात में तर्क उपस्थिति है कोई भी कार्य सामने आने पर संशय का ज्वार भाटा मन में उठने लगता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होते ही कितने प्रश्नों की झड़ी लग जाती है। हमारे अन्दर ईश्वर और आत्मा पर संदेह की मात्रा प्रचुर परिमात्रा में होती है यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से हम उसे जान नहीं पाते तो भी वह भीतर ही भीतर काम करता रहता है। सत्संग में जाने की अपेक्षा मेला देखना पूजा करने की अपेक्षा सिनेमा जाना, दान करने की अपेक्षा संग्रह करना, त्याग की अपेक्षा भोगों में मस्त रहना, और धर्म कार्यों में अरुचि प्रकट करना यह लक्षण बतलाते हैं कि मन के भीतरी कोने में परमार्थ के प्रति संदेह बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद है। थोड़े से लाभ के लिये लोग एड़ी से चोटी तक पसीना बहाते हैं मन की सारी शक्तियों को एकत्रित कर देते हैं, सारा बुद्धिबल खर्च करते हैं, और भूख, प्यास, नींद, थकान किसी बात की भी परवाह न करके जुटे रहते हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि इस परिश्रम से लाभ होगा परन्तु जीवन के सच्चे लाभ जिसके आगे संसार की सारी विभूतियाँ धूलि के समान हैं। उस परमार्थ-पथ पर अरुचि और उपेक्षा बनी रहती है। मन बार बार उचटता है और भजन में अनेक विघ्न आ जाते हैं। यह अरुचि, उपेक्षा, मन न लगना, विघ्न आदि वास्तव में संशय की छाया मात्र हैं। भीतर ही भीतर यह संशय चलता रहता है कि परलोक और परमात्मा का अस्तित्व यदि न हुआ तो? पूजा पाठ व्यर्थ हुए तो? हमारी उपासना निष्फल हुई तो? आदि आदि। यद्यपि मुँह से इन बातों का कहना बुरा मालूम होता है। तथापि भीतर इसका बीज बहुत कुछ बढ़ा हुआ होता है इसके अतिरिक्त धर्म विमुख होने का और कोई कारण दिखाई नहीं देता।
तर्क की एक मर्यादा है। वह आवश्यक वस्तु है। बहुत बातों में उससे मदद मिलती है और साँसारिक व्यवहार चलाने में उसके बिना काम नहीं चल सकता। फिर भी वह एक उपकरण मात्र है। न कि मूल तत्व। मानव जीवन की मूल भित्ति तर्क नहीं वरन् श्रद्धा के ऊपर अवलंबित है। छोटा बालक माता पिता के शब्द सुनता है। भोजन के लिये ‘रोटी’ शब्द व्यवहार होता है इस बात को वह श्रद्धा करके मान लेता है और भोजन की आवश्यकता होने पर ‘रोटी’ माँगता है। उसी प्रकार वस्तुओं के नाम सुन कर उन्हें श्रद्धा पूर्वक स्वीकार कर लेता है। अन्य सामाजिक रीति, नीति, और विचारधारा को भी वह चुपचाप ग्रहण कर लेता है। यह बातें तर्क के आधार पर नहीं हो सकती थीं तर्क तो यह भी प्रमाणित नहीं कर सकती कि वही व्यक्ति वास्तव में पिता है जिसे हम ‘पिता जी’ कह कर संबोधन करते हैं।
मनोविज्ञान के आधार पर यदि हम अपने विश्वासों, मान्यताओं, आदतों तथा विचारों का परीक्षण करें तो मालूम होगा कि जीवन के तीन चौथाई विश्वासों का आधार श्रद्धा पर अवलम्बित है। तर्क तो केवल किसी नयी साँसारिक समस्या के सामने आने पर उसे सुलझाने में कुछ थोड़ी सी मदद करती है। यदि स्वजनों की ईमानदारी पर संदेह किया जाय, उनके हर काम को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाय, माता, पत्नी, संतान, मित्र आदि का भरोसा न किया जाय तो मनुष्य, पिशाच की तरह उद्विग्न और अनिश्चित हो जाय उसका दैनिक जीवन आशंका एवं अनिष्ट की भट्टी में जल उठे, सुख और शान्ति के दर्शन दुर्लभ हो जायें। यदि अपने भविष्य तथा स्वास्थ्य पर से श्रद्धा खो दे तो निश्चय ही बहुत शीघ्र वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आत्म हत्या कर लेगा।
हमारा तात्पर्य यह नहीं है कि कोई बिना समझे बूझे चाहे जिस बात को मान ले और उसी भ्रम के ऊपर अपने जीवन रस को डाल दे। नहीं, हर बात में खूब सोचने समझने, गहरा मनन करने पूर्ण अनुसंधान करने के पश्चात् ही कोई बात माननी चाहिए किन्तु तर्क का अवलंब श्रद्धा हो। श्रद्धा की आधार शिला पर बैठ कर ही तर्क सफल होगा अन्यथा वह हलके बादल की तरह क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान को उड़ जायेगा। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पक्ष से लगा कर बुरी से बुरी बात तक के पक्ष में बड़ी लच्छेदार दलीलें हो सकती हैं और हमारा अपूर्ण मस्तिष्क उनके आगे परास्त हो सकता है ऐसी दशा में भला हम कहीं खड़े हो सकते हैं? तर्क बेचारा अंधा और लंगड़ा है वह मनुष्य जीवन की आधार भित्ति का निर्माण नहीं कर सकता और न ईश्वर और धर्म का मार्ग दिखा सकता है तर्क की अन्तिम गति नास्तिकता तक है।
यदि तुम्हारा मन धर्म मार्ग की ओर प्रवृत्त न होता हो, साँसारिक लालचों की ओर बार बार इच्छा होती हो तो समझो कि यह कार्य शंकाशील तर्क का है और वह तुम्हें नास्तिकता की ओर पकड़ कर घसीटे लिये जा रही है। ऐसी दशा में तुम तर्क से तर्क का निवारण नहीं कर सकते। आग से आग नहीं बुझ सकती। अपना पथ प्रदर्शक चुनो, आप्त पुरुषों के पद चिन्हों की ओर देखो। ईश्वरीय ज्ञान की धर्म पुस्तकों से मदद माँगो। महापुरुष जिस मार्ग पर गये हों उसका अनुसरण करो। सोई हुई श्रद्धा की जागृति करो वह तुम्हें परम तत्व के उस दरवाजे पर ले जाकर खड़ा कर देगी जहाँ से प्रकाश दिखाई पड़ता है और उस प्रकाश के सहारे आत्मा अपने आप अपना मार्ग खोज लेता है। जैसे जैसे आगे बढ़ता जाता है वैसे ही वैसे सत्य का दर्शन होने लगता है। फिर हजारों तर्क मिल कर भी वहाँ अविश्वास नहीं कर सकते।
‘अखंड ज्योति’ के पाठक अपनी आध्यात्मिक भूमिका में छिप कर बैठे हुए इस संदेह को चिराग ले कर ढूंढ़ें और जहाँ कहीं उसे पावें निकाल कर बाहर करें। तभी वे अपने जीवन का सच्चा लक्ष और मार्ग देख सकेंगे। अन्यथा विभिन्न दलीलों और शंकाओं की आँधी में इधर से उधर उड़ते रह कर भगवान् कृष्ण के शब्दों में वे संशयात्मा विनाश की ओर चले जायेंगे।

