प्रतिबोध (कविता)
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(श्री हरिशंकरलाल शास्त्री “कामारि”) कौन रे! मुझको बनाया, विकल जग का अधम प्राणी।
मौन, एकाकी हृदय को, फिर सुनाई बिरह-वाणी॥ मैं नहीं सोया, जगा था, सिर्फ तन्द्रा थी दृगों पर।
विश्व हलचल से जुदा था, आह! अपना ‘अहम्’ खोकर॥ शान्त-जीवन का बना क्या? एक उपक्रम था मनोहर।
दिग्वधू के मलय संचित, प्रेम में, आबद्ध होकर॥ स्वर्ण रक्तिम, पड़ चुकी थी, रेख, अवनी, में पता था।
विहँग, कलरव से निनादित, हो चुका बन, जानता था॥ इसलिये रे अधम! हठकर, फिर न अपना राग रोना।
मैं न बे सुध, बे खबर हूँ, देखना, मत आप सोना॥
मौन, एकाकी हृदय को, फिर सुनाई बिरह-वाणी॥ मैं नहीं सोया, जगा था, सिर्फ तन्द्रा थी दृगों पर।
विश्व हलचल से जुदा था, आह! अपना ‘अहम्’ खोकर॥ शान्त-जीवन का बना क्या? एक उपक्रम था मनोहर।
दिग्वधू के मलय संचित, प्रेम में, आबद्ध होकर॥ स्वर्ण रक्तिम, पड़ चुकी थी, रेख, अवनी, में पता था।
विहँग, कलरव से निनादित, हो चुका बन, जानता था॥ इसलिये रे अधम! हठकर, फिर न अपना राग रोना।
मैं न बे सुध, बे खबर हूँ, देखना, मत आप सोना॥

