प्रार्थना किसे कहते हैं?
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(महात्मा गाँधी)
एक डाक्टरी डिग्री प्राप्त किये हुए महाशय मुझसे प्रश्न करते हैं:-
“प्रार्थना का सबसे उत्तम प्रकार क्या हो सकता है ? उसमें कितना समय लगाना चाहिये? मेरी राय में तो न्याय करना ही उत्तम प्रकार की प्रार्थना है और जो मनुष्य सबके साथ न्याय करने के लिये सच्चे दिल से तैयार होता है उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ लोग तो संध्या करने में बहुत सा समय लगा देते हैं परन्तु बहुत से मनुष्य तो उस समय जो कुछ बोलते हैं उसका अर्थ भी नहीं समझते। मेरी राय में तो मातृभाषा से ही प्रार्थना करनी चाहिये। उसका ही आत्मा पर असर पड़ सकता है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि सच्ची प्रार्थना यदि एक मिनट के लिये भी की गई हो तो वह भी काफी होगी। ईश्वर को पाप न करने का अभिवचन देना ही काफी है।”
प्रार्थना के माने हैं धर्म भावना और आदर पूर्वक ईश्वर से कुछ माँगना। परन्तु किसी भक्ति-युक्त भाव को व्यक्त करने के लिये भी शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेखक के मन में जो बात है उसके लिये भक्ति शब्द का प्रयोग करना ही अधिक अच्छा है। परन्तु इसकी व्याख्या का विचार छोड़कर हम इसी का ही विचार करें कि करोड़ों हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी और दूसरे लोग रोजाना अपने स्रष्टा की भक्ति करने के लिये निश्चित किये हुए समय में क्या करते हैं। मुझे तो यह मालूम होता है कि वह स्रष्टा के साथ एक होने की, हृदय की उत्कट इच्छा का प्रकट करना है और उसके आशीर्वाद के लिये याचना करना है। इसमें मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। अक्सर पुराने जमाने से जो शब्द रचना चली आती है उसका भी असर होता है। जो मातृ भाषा में उसका अनुवाद करने पर सर्वथा नष्ट हो जाता है गुजराती में गायत्री का अनुवाद कर उसका पाठ करने पर उसका वह असर न होगा जो असल गायत्री में होता है। ‘राम’ शब्द के उच्चार से लाखों करोड़ों हिन्दुओं पर फौरन असर होगा और ‘गौड’ शब्द का अर्थ समझने पर भी उसका कोई असर न होगा। चिरकाल के प्रयोग से और उनके उपयोग के साथ संयोजक पवित्रता में शब्दों को शक्ति प्राप्त होती है। इसलिये एक से अधिक प्रचलित मंत्र और श्लोकों को संस्कृत भाषा में रखने के लिये बहुत सी दलीलें की जा सकती हैं। परन्तु उनका अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। ऐसी भक्ति युक्त क्रियायें किस समय करनी चाहियें इसका कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता है। इसका आधार जुदी जुदी व्यक्तियों के स्वभाव पर होता है। मनुष्य के जीवन में ये क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। ये क्रियायें हमें नम्र और शान्त बनाने के लिये होती हैं। और उससे हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता है और हम तो “उस प्रजापति के हाथ में मिट्टी के पिंड हैं।” ये पल ऐसे हैं कि इससे मनुष्य अपने भूतकाल का निरीक्षण करता है और अपनी दुर्बलता को स्वीकार करता है तथा क्षमा याचना करते हुये अच्छा कार्य करने की शक्ति के लिये प्रार्थना करता है कुछ लोगों को इसके लिये एक मिनट भी बस होता है तो कुछ लोगों को 24 घण्टे भी काफी नहीं हो सकते हैं। उन लोगों के लिये जो ईश्वर के अस्तित्व को अपने में अनुभव करते हैं केवल मेहनत और मजूरी करना भी प्रार्थना हो सकती है। उनका जीवन ही सतत प्रार्थना और भक्ति के कार्यों से बना होता है। परन्तु वह लोग जो केवल पाप कर्म ही करते हैं प्रार्थना में जितना भी समय लगावेंगे उतना ही कम होगा। यदि उसमें धैर्य और श्रद्धा होगी और पवित्र बनने की इच्छा होगी तो वे तब तक प्रार्थना करेंगे जब तक कि उन्हें अपने में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति का निर्णयात्मक अनुभव न होगा। हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिये तो इन दो सिरे के भागों के मध्य का एक और भी मार्ग होना चाहिये। हम ऐसे उन्नत नहीं हो गये हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण ही हैं और शायद इतने गिरे हुए भी नहीं हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं इसलिये सभी धर्मों ने समान भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिये अलग समय मुकर्रर किया है दुर्भाग्य से इन दिनों यह प्रार्थनाएं जहाँ दाँभिक नहीं होती हैं वहाँ यान्त्रिक और औपचारिक हो गई हैं इसलिये यह आवश्यक है कि इन प्रार्थनाओं के साथ वृत्ति भी शुद्ध और सच्ची हो।
निश्चयात्मक वैयक्तिक प्रार्थना जो ईश्वर से कुछ माँगने के लिये की गई हो वह तो अपनी ही भाषा में होनी चाहिये। इस प्रार्थना से कि ईश्वर हर एक जीव के प्रति हमें न्याय पूर्वक व्यवहार रखने की शक्ति दे और कोई भी बढ़कर नहीं हो सकती है।

